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आमिर भाई, चैनलों के स्ट्रिंगर्स के लिए भी बना दो ‘सत्‍यमेव जयते’

आमिर खान साहब एक कार्यक्रम टीवी न्यूज़ चैनल्स के स्ट्रिंगर्स के लिए भी बना दो, उनका दुःख-हाल भी दुनिया के सामने ला दो.. सभी ने कहा कि आपने कमाल का कार्यक्रम बनाया सत्य मेव जयते। आमिर खान ने दिल को छूने वाला विषय उठाया, रुला भी दिया, आईबीएन7 में ऋचा अनिरुद्ध के कार्यक्रम जिंदगी लाइव जैसा था। इस कार्यक्रम सत्यमेव जयते शो से टीवी  मीडिया में स्ट्रिंगर दोस्‍तों की भी उम्‍मीदें बढ़ गई हैं।

आमिर खान साहब एक कार्यक्रम टीवी न्यूज़ चैनल्स के स्ट्रिंगर्स के लिए भी बना दो, उनका दुःख-हाल भी दुनिया के सामने ला दो.. सभी ने कहा कि आपने कमाल का कार्यक्रम बनाया सत्य मेव जयते। आमिर खान ने दिल को छूने वाला विषय उठाया, रुला भी दिया, आईबीएन7 में ऋचा अनिरुद्ध के कार्यक्रम जिंदगी लाइव जैसा था। इस कार्यक्रम सत्यमेव जयते शो से टीवी  मीडिया में स्ट्रिंगर दोस्‍तों की भी उम्‍मीदें बढ़ गई हैं।

जिन बड़े पत्रकारों ने स्टिंग आपरेशन के जरिये राजस्थान में भ्रूण हत्या मामलों का पर्दाफाश किया था, वो भी पूछे जाने लगे है. आमिर खान भाई एक प्रोग्राम आप मीडिया स्ट्रिंगर को समर्पित कर दो.. तो देश में जरा इनपर भी चर्चा शुरू हो जाएगी। हर चैनल बड़े बहसियों को बैठा कर बात करेंगे कि चिरकुट चैनल वालों ने स्ट्रिंगरों का कैसे खून चूसा, कैसे टीवी चैनल के कर्ताधर्ता स्ट्रिंगर बनाने के बदले या कहें आईडी के बदले बीस से पच्‍चीस हज़ार ऐंठ लेते थे, फिर पचीस हज़ार का कैमरा, उसके बाद भी खबर दिखाने के बदले पैसा? मुझे याद है दिल्ली कि एक महान पत्रकार-एंकर जो दूरदर्शन पर अपना समाचार शो देती थी, उनके कारिंदे कैसे स्ट्रिंगर का खून चूसते थे, पैसे आजतक किसी को नहीं दिए। ये आँखों देखी बात है कि जिसने वहां जाकर पैसा माँगा वो डरा दिया गया।

पिछले कुछ सालों में करीब एक सौ न्यूज़ चैनल आये होंगे, जिनमें से ज्यादातर ने अपने कस्‍बे स्ट्रिंगर को पैसा नहीं दिया। आज उन स्ट्रिंगर्स की आर्थिक हालत क्या है? ये बात जानने के लिए आमिर खान का स्वागत है। एक सत्यमेव जयते इनपर भी हो जाये। कुछ बड़े टीवी चैनलों को छोड़ दिया जाये, वैसे अब वो भी अपवाद नहीं रहे, तो सभी की हालत कमोवेश एक जैसी है। उत्‍तराखंड की राजधारी देहरादून में एक बड़े चैनल के रिपोर्टर को स्ट्रिंगर बना दिया गया। चैनल की पालिसी बदली कि हमें अब इस राजधानी में रिपोर्टर नहीं रखना। अंदरूनी हालात अच्छे नहीं है। बंधु रिपोर्टर से स्ट्रिंगर इस लिए बन गए कि शायद फिर से दिन बहुरेंगे। पांच हज़ार का कमरा था। दोनों बच्चे पब्लिक स्कूल में थे। खर्चा हर महीने का करीब बीस हज़ार रुपये का था.. पिछले महीने उन्हें चैनल से पैसा आया चार हज़ार रुपये। इस महीने अभी चैनल ने उनसे खबर नहीं ली है यानी बोहनी नहीं हुई। अब क्या करें बच्चों की फीस, किराया, खर्चा  कहाँ से लायें। आमिर खान इनका भी दर्द समझें ..वो आयें तो मैं उन्हें उनके पास ले जाना चाहता हूँ .. कैसे हमारा बन्धु डिप्रेशन में आ गया है? ४५ बरस की उमर में कौन अब दूसरी नौकरी देगा? और जो पत्रकार हो जाता है उसे कोई नौकरी नहीं देता।

आमिर खान साहब एक बात और बतानी थी आपको, पत्रकार या स्ट्रिंगर को कोई बैंक लोन भी नहीं देता। बैंकों ने अपनी गॉइड लाइन बना रखी है, पुलिस, पत्रकार, वकील को वो लोन नहीं देते, क्यूंकि इनसे पैसा वसूलना आसान नहीं होता। क्या सत्यमेव जयते बैंकों में पत्रकरों को लोन न देने की अघोषित पाबन्दी हटवा सकता है? यदि ऐसा हो जाये तो बड़ा उपकार होगा। कम से कम स्ट्रिंगर या पत्रकार भाई कोई काम करने के लिए, कोई टैक्सी खरीदने के लिए लोन तो ले सकेगा। बेकार होने जा रहे इन बंधुओं के घर का चूल्हा तो जल सकेगा.. ये कोई मसाला स्क्रिप्ट नहीं है आमिर भाई, हो सकता है ये दर्द भी उसी चैनल का दिया हुआ हो, जहाँ आपके सत्य मेव जयते को लेकर बड़े-बड़े बहसी बहस कर रहे हो… वो कभी सरकारें हिला दिया करते थे पर वो आज अंदर से खुद हिल गए है।

आको एक वाकया और बताता हूँ। ये प्रिंट से जुड़ा हुआ मामला है। ९० के दौर में एक समाचार संपादक ने मुझ पर भरोसा कर सहारा दिया। २००० में वो ऐसी अवस्था में थे कि मैं बयान नहीं कर सकता। कहने लगे कहीं काम दिलवा दें। मै भौंच्च्का रह गया। खैर मेरे एक मित्र संपादक ने उन्हें हरिद्वार में काम दिया। यकीन मानिये मैं उस दिन सो नहीं सका, इसलिए कि क्या यही मीडिया की दुनिया है? कल तक दर्जनों पत्रकारों को रोजी-रोटी देने वाला आज रोटी को मोहताज़ हो गया। आमिर साहब विषय अच्छा है, टीआरपी भी मिल जाएगी, पर क्या टीवी मीडिया के लोग इस सच का सामना कर पाएंगे? और ये काम भी, आप ही करा सकते हैं बशर्ते स्टार की आपकी टीम इस विषय को गंभीरता से ले ले। बहुत से दर्द है मीडिया की दुनिया में, आमिर भाई बना डालो एक

दिनेश मानसेरा

एपिसोड। बहस करने वाले बाद में मिल जायेंगे, सच तो सामने आएगा। महानगरों में, छोटे कस्बों में किन हालात में रह रहे हैं छोटे-बड़े पत्रकार, स्ट्रिंगर ..जरा पता तो करवाओ.. कोई मंच नहीं, कोई संस्था नहीं, कोई यूनियन नहीं। कहाँ आवाज़ दें जाकर.. आप का सत्य मेव जयते देखा, उम्मीद की किरण दिखी।

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

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