आम आदमी पार्टी (आप) ने अपनी पहली राजनीतिक धमक से ही भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को नया पाठ पढ़ा दिया है. राष्ट्रीय राजधानी की इस नवोदित पार्टी ने महज सवा साल के अंदर ही अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है. दिल्ली विधानसभा के चुनाव में इसने जोरदार जीत हासिल करके बडे-बड़े राजनीतिक ज्ञानियों को भी हैरानी में डाल दिया है.
इस पार्टी के नए खिलाड़ी उस्तादी के ऐसे दांव दिखा रहे हैं कि उनसे स्थापित पार्टियों के घाघ नेता भी हैरान हो रहे हैं. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में सरकार बनी है. इस सरकार ने अपने कार्यकाल के महज दो कार्य दिवसों में ही दो बड़े फैसले कर डाले. ये फैसले ‘आप’ के प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे हैं. मजबूत राजनीतिक संकल्प वाले नेतृत्व ने बगैर देरी के फैसले ले लिए, वो भी बड़ी विषम स्थितियों में. क्योंकि, मुख्यमंत्री केजरीवाल पिछले तीन दिनों से बीमार हैं. उन पर बुखार और डायरिया का प्रकोप जारी है. लेकिन, आम आदमी की सच्ची राजनीति करने वाले केजरीवाल ने अपनी बीमारी को भी ठेंगा दिखाने की कोशिश कर डाली.
दिल्ली चुनाव में इस पार्टी ने 70 में से 28 सीटें जीत ली हैं. यद्यपि यहां पर 32 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. लेकिन, वह बहुमत से चार सीटें पीछे रह गई, तो सत्ता उसके हाथ से फिसल गई. कांग्रेस यहां महज 8 सीटों तक ही सिमट गई है. सीटों के इस अंक गणित के चलते यहां कोई पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी. ऐसे में, आशंका बढ़ गई थी कि यहां दोबारा चुनाव की नौबत आ सकती है. इसकी खास वजह यह थी कि बहुत पहले ‘आप’ ने घोषित किया था कि वह न तो किसी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन देगी और न लेगी. इस सैद्धांतिक अड़चन के कारण कई दिनों तक सरकार गठन को लेकर दुविधा की स्थिति जारी रही थी. ऐसे में, कांग्रेस ने रणनीतिक कारणों से ‘आप’ को बगैर शर्त के समर्थन देने की पेशकश कर दी. इसी के बाद केजरीवाल के नेतृत्व में सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हुई. अंतत: 28 दिसंबर को केजरीवाल ने भारी जनसमूह के बीच मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
सरकार गठन के साथ ही इसके कार्यकाल को लेकर कयासबाजी तेज हो गई है. कोई नहीं जानता कि ये सरकार कितने समय तक चल पाएगी? केजरीवाल खुद स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी सरकार कभी भी गिर सकती है. वे इस खतरे को अच्छी तरह से समझ रहे हैं. लेकिन, इसको लेकर वे जरा भी चिंतित नहीं हैं. इस चिंता में वे जोड़-तोड़ की राजनीति तो सपने में भी नहीं करना चाहेंगे. लेकिन, उनका यह पक्का संकल्प है कि जब तक सरकार है, तब तक वे आम आदमी के हित वाले लगातार फैसले करते रहेंगे. वह भी बगैर किसी दबाव में आए. केजरीवाल की सरकार कांग्रेस के समर्थन पर जरूर टिकी है, लेकिन मुख्यमंत्री, कांग्रेस के किसी दबाव में नहीं दिखाई पड़ते. सत्ता में आने के बाद भी उन्होंने दोहरा दिया है कि जल्दी ही उनकी सरकार शीला दीक्षित के कार्यकाल के तमाम घोटालों की खबर लेगी. इन घोटालों की पड़ताल के लिए उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी. लक्ष्य यही रहेगा कि घोटालेबाजों को जल्द से जल्द तिहाड़ जेल भिजवाया जाए.
‘आप’ के नेताओं ने यह भी कहा है कि भाजपा नेतृत्व वाले नगर निगम के घोटालों की भी वे लोग पड़ताल कराएंगे. क्योंकि, नगर निगम में भी पिछले वर्षों के दौरान करोड़ों रुपए के घोटाले हुए हैं. नई सरकार के इस ऐलान से दिल्ली कांग्रेस के नेताओं में जबरदस्त गुस्सा रहा है. इसी गुस्से के चलते बीच-बीच में इस आशय की अटकलें बढ़ती जा रही हैं कि कांग्रेस के विधायक विश्वासमत के दौरान सरकार के पक्ष में वोट देंगे या नहीं? उल्लेखनीय है कि अगले दो दिनों में ही केजरीवाल सरकार को विधानसभा में अपना विश्वासमत लेना है. जाहिर है, कांग्रेस के सभी विधायकों ने यदि एकजुट होकर सरकार के पक्ष में वोट नहीं दिया, तो सरकार के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है. इस आशय की खबरें लगातार आ रहीं हैं कि कांग्रेस के कई विधायक दबाव बना रहे हैं कि पार्टी का नेतृत्व सरकार के समर्थन के लिए उन पर दबाव न डाले. ताकि,वे मनमानी खेल कर सकें.
दरअसल, ये विधायक सरकार की कार्यशैली से शुरू में ही खौफ खाते देखे जा रहे हैं. मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि क्षेत्रीय विकास के नाम पर हर साल दी जाने वाली विधायकों की निधि का प्रावधान वे खत्म कर देंगे. क्योंकि, सभी जानते हैं कि विकास की निधि के नाम पर जारी होने वाली इस मोटी रकम में भारी कमीशनखोरी होती है. ‘आप’ नेतृत्व ने तैयारी की है कि विधायकों के नाम आवंटित होने वाला करोड़ों का यह सालाना फंड मोहल्ला समितियों को सौंप दिया जाए, ताकि यही समितियां तय करें कि विकास निधि का उपयोग किस तरह से हो? सरकार के इस मंसूबे से कांग्रेस और भाजपा के विधायकों में बेचैनी देखी जा रही है. एक टीवी न्यूज चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए कांग्रेस विधायकों का इस संदर्भ में असली चेहरा दिखाने की कोशिश की थी.
इस खुलासे में कांग्रेस के पांच विधायकों को यह कहते हुए दर्शाया गया कि यदि केजरीवाल सरकार ने कांग्रेस नेताओं के खिलाफ जांच बैठाई, तो वे लोग सरकार नहीं चलने देंगे. जरूरत पड़ेगी, तो विधानसभा में जमकर हंगामा करेंगे. विधायक निधि के प्रावधान में बदलाव के प्रकरण में एक विधायक ने तो यहां तक कह डाला कि यदि केजरीवाल सरकार ऐसा करेगी, तो वे लोग विधानसभा में ही जूत (जूता) बजा देंगे.
‘आप’ कोर ग्रुप के सदस्य योगेंद्र यादव कहते हैं कि मौजूदा स्थिति में यह सरकार इसी सप्ताह गिर सकती है, या हो सकता है कि जनता के दबाव में सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा भी कर ले. क्योंकि, उन्हें अच्छी तरह से पता है कि आम जनता के दबाव की वजह से कांग्रेस नेतृत्व भी आसानी से उनकी सरकार गिराने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा. लेकिन, कांग्रेस के फैसले को लेकर वे लोग जरा भी चिंतित नहीं हैं. क्योंकि, यह फैसला कांग्रेस का है. हमने इतना जरूर साफ कर दिया है कि उनके समर्थन की वजह से हम उनके लोगों के ‘पाप’ माफ करने नहीं जा रहे. घोटालों की जांच होगी, तो जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी. ऐसे में, चाहे कांग्रेस वाले नाराज हों, या भाजपा वाले. उन्हें परवाह नहीं है.
‘आप’ के उदय के साथ ही देश की राजनीति में अंदर ही अंदर बदलाव की बयार तेज हो गई है. यदि ‘आप’ की राजनीति का दबाव नहीं होता, तो भाजपा नेतृत्व जोड़-तोड़ के जरिए आसानी से यहां सरकार बना लेता. क्योंकि, उन्हें तो सरकार बनाने के लिए महज चार विधायकों की ही दरकार थी.
यह काम उनके उस्तादों के लिए कोई मुश्किल नहीं था. क्योंकि, झारखंड से लेकर कई राज्यों में भाजपा के कारीगर अपनी जोड़-तोड़ की उस्तादी का कौशल दिखा चुके हैं. लेकिन, इन्होंने दिल्ली में ऐसा नहीं किया. इस पार्टी के नेता डॉ. हर्षवर्धन ने उपराज्यपाल नजीब जंग को जाकर बता दिया था कि उनके पास सरकार बनाने लायक ताकत नहीं है. इस परिघटना को भी बदलाव की राजनीति से जोड़कर देखा गया. इसके बाद कांग्रेस ने बगैर मांगे हुए केजरीवाल को समर्थन दिया. इतना ही नहीं पार्टी के नेतृत्व ने दबाव बनाया कि ‘आप’ वाले सरकार बना लें. इसके लिए उपराज्यपाल ने भी जोर लगाया. यहां तक कि राष्ट्रपति भवन से भी सरकार बनाने के लिए केजरीवाल को ज्यादा समय देना मंजूर किया गया.
हैरानी की बात यह रही कि आखिरी क्षणों तक केजरीवाल कांग्रेस के खिलाफ हुंकार भरते रहे. वे यह कहने में नहीं चूके कि उनकी सरकार शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुए घोटालों की जांच वरीयता के आधार पर कराएगी. इस पार्टी के नेताओं ने डंके की चोट पर कहा कि संभव है कि शीला दीक्षित के सरकार में रहे कई मंत्री 2014 में तिहाड़ जेल का रुख करते नजर आएं. इन जली-कटी बातों के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने केजरीवाल को समर्थन देने का संकल्प जताया है, तो यह भी नई राजनीति का ही कमाल है. नई सरकार ने दो दिन में ही दो बड़े चुनावी वायदे निभा दिए. ये हैं, मुफ्त पेय जल देने और बिजली दरों में भारी कटौती का.
आशंकाएं की जा रही थीं कि सत्ता संभालने के बाद केजरीवाल सरकार को पता चल जाएगा कि लोक-लुभावन वायदों को जमीन पर नहीं उतारा जा सकता. आलोचक कह रहे थे कि दिल्ली की बिजली कंपनियां अपनी दरों में बढ़ोत्तरी के लिए दबाव बना रही हैं. ऐसे में, यहां पर 50 प्रतिशत की कटौती असंभव है. यदि सरकार ने दबाव बनाया, तो पूरी बिजली व्यवस्था ही ध्वस्त हो सकती है. इसी तरह इस पार्टी ने वायदा किया था कि वे लोग सरकार में आएंगे, तो प्रति परिवार रोजाना 700 लीटर पेयजल मुफ्त मुहैया कराएंगे. इस मुद्दे पर भी तरह-तरह की बातें की जा रही थीं. शुरुआत में दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारी भी कह रहे थे कि मुफ्त जल देने की व्यवस्था संभव नहीं है. लेकिन, सरकार ने मजबूत राजनीतिक संकल्प के तेवर दिखाए, तो फटाफट दोनों फैसले कर लिए गए.
हैरानी की बात तो यह है कि इस बीच मुख्यमंत्री बीमार रहे हैं. वे अपना कामकाज संभालने के लिए दफ्तर भी नहीं जा पाए. लेकिन, उन्होंने दोनों फैसले दो दिन में करा दिए. इस तरह से ‘आप’ की सरकार ने दिल्ली की आम जनता को नए साल में दो बेहतरीन तोहफे दे दिए हैं. इसी के साथ इन लोगों ने यह जता दिया है कि वे लोग अलग तरह की राजनीति करने आए हैं. उनका मकसद जनसेवा का ही है. सत्ता के जरिए मालामाल होने का नहीं. जैसा कि अन्य राजनीतिक दलों की संस्कृति बन गई है. इस पार्टी ने अपनी धमाकेदार शुरुआत दिल्ली से की है. यहां राज्य स्तर पर चुनाव आयोग से उसे क्षेत्रीय दल की मान्यता भी मिल गई है. अब यह पार्टी लोकसभा के चुनाव में बड़े पैमाने पर अपने पैर पसारने की तैयारी में है. शुरू में तो लक्ष्य यही था कि करीब 100 सीटों पर ही ‘आप’ के उम्मीदवार उतारे जाएं. लेकिन, दिल्ली की सफलता के बाद इस पार्टी की पकड़ पूरे देश में मजबूत होती जा रही है. रोज हजारों लोग ऑनलाइन, पार्टी की सदस्यता ले रहे हैं. पिछले एक सप्ताह में ही इस पार्टी के साथ एक लाख से ज्यादा युवा जुड़ गए हैं.
कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी को अमेठी में चुनावी चुनौती देने के लिए ‘आप’ के नेता कुमार विश्वास तैयार हैं. उन्होंने यहां से चुनाव लड़ने के लिए आवेदन भी कर दिया है.
खबर यह भी है कि ‘आप’ के एक तेज-तर्रार नेता भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी को भी चुनावी चुनौती देंगे. उत्तर प्रदेश में ‘आप’ ने संजय सिंह को अपना संयोजक बनाया है. संकेत मिल रहे हैं कि ये पार्टी प्रदेश में लोकसभा की ज्यादातर सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. खास तौर पर दिग्गज नेताओं के सामने पार्टी चुनावी चुनौती जरूर पेश करेगी. जिस तरह से दिल्ली में इस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बेमिसाल जनसंपर्क की शैली विकसित की है, उससे राष्ट्रीय दलों में भी बेचैनी है. राजनीति में जातिवाद, संप्रदायवाद व धनबल की भूमिका काफी बढ़ गई है. ‘आप’ ने दिल्ली के अंदर एक झटके में ही इन बंधनों को तोड़ दिया है. यह राजनीतिक प्रयोग पूरे देश ने देख लिया है.
पिछले दिनों राहुल गांधी ने भी अपने लोगों से यही कहा था कि यदि पार्टी को जनता का विश्वास फिर से जीतना है, तो उसे केजरीवाल के लोगों से नई किस्म की राजनीति सीखनी होगी. अब भाजपा और कांग्रेस में भी ‘आप’ शैली की नकल करने की होड़ मची है. भाजपा के नेताओं ने भी अब ‘आप’ के राजनीतिक फंडों का इस्तेमाल करना शुरू किया है. इस पार्टी ने अपने कुछ नेताओं को आगे रखकर यह प्रचारित करना शुरू किया है कि उनकी पार्टी में भी केजरीवाल जैसे खांटी ईमानदार नेताओं की कमी नहीं है. सोशल मीडिया पर संघ परिवारियों ने एक फोटो गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर की पोस्ट की है. इस फोटो में वे एक साधारण ढाबे में खाना खाते दिखाई पड़ रहे हैं. इसमें लिखा गया है कि केजरीवाल की तरह वे भी आईआईटी से पास हैं. वे आज भी अपनी स्कूटी से विधानसभा जाते हैं. उनकी पत्नी गोवा में सब्जी लेने के लिए रिक्शे से जाती हुई दिख सकती हैं. आह्वान किया गया है कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोग शेयर करें, ताकि भाजपा की भी छवि कुछ निखरे. राहुल गांधी तो शुचिता की राजनीति के लिए कई ऐसे मुद्दों की पहल कर रहे हैं, जिनको लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस में हलचल का दौर तेज हो गया है. यह सब ‘आप’ की नई राजनीति का बढ़ा हुई दबाव तो ही है!
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.