बेखौफ अपराधियों ने 8 दिसंबर को लखीसराय जिले के बभनगांवा गांव में आरटीआई कार्यकर्ता रामविलास सिंह की गोली मारकर हत्या कर दिया था। मृतक श्री सिंह सूचना के अधिकार को लेकर जिले के आला अधिकारियों से लेकर दंबग जन प्रतिनिधियों के आंखों की किरकिरी बन गये थे। हत्या को एक महीना पूरा होने को है, फिर भी नामजद अभियुक्तों में से सिर्फ एक की गिरफ्तारी कर पुलिस अपना दामन बचाने में लगी रही।
हत्या के मामले में पुलिस के इस रवैये को आम जनता से लेकर मानवाधिकार आयोग तक ने कठघरे में खड़ा किया है। आज भी इनका एकलौता अनाथ पुत्र अपने पिता के हत्या में पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार मान रहा है। आज भागलपुर प्रक्षेत्र के आईजी की वार्षिक बैठक कानून-व्यवस्था को लेकर लखीसराय एवं बेगूसराय के पुलिस अधीक्षक के साथ थी। पर निदंनीय यह रहा कि बैठक के बाद जब आईजी मीडिया से रूबरू हुए तब उन्हें पता चल पाया कि यहां एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई है। इस बात से साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले की पुलिस इस हत्या के मामले को किस तरह आईजी साहब के नजरों से ओझल रखना चाहती थी।
हालांकि मीडिया द्वारा इस मामले की जानकारी मिलते ही उन्हों ने एसपी से हत्या की रिर्पोट मांगी। उन्होंने मीडिया को आश्वासन भी दिया कि अब दोषी जल्द ही नपेंगे। हालांकि इस मामले को देखते हुए एसपी ने विभिन्न थानों में पदस्थापित 16 पुलिस अवर निरीक्षकों को इधर से उधर किया है, लेकिन इनमें वह थानेदार नहीं हैं, जिन पर आरटीआई कार्यकर्ता हत्या मामले का आरोप लगा है। ऐसे में पुलिस पर यह साफ आरोप लग रहा है कि आखिर पुलिस क्यों नही लखीसराय के थाना प्रभारी को निलंबित कर रही है। इससे पूर्व रामविलास ने अपने जान के सुरक्षा की गुहार लखीसराय थाने में लगायी थी। तब लखीसराय पुलिस ने उनकी एक न सुनी। तब उन्हों ने स्पीड पोस्ट के माध्यम से थाना, एसपी सहित सरकार तक अपने सुरक्षा की गुहार लगायी। बावजूद उनको किसी तरह की सुरक्षा नहीं दी गयी। अब ऐसे में साफ देखा जा सकता है कि यहां के थाना से लेकर जिले के पुलिस कप्तान भी इसमें कम दोषी नजर नही आते।
एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.






