: ‘आटो मास्टर’ के संपादक की एक माह में तीसरी मर्तबा जमानत अर्जी खारिज : इंदौर । प्रभावशाली लोगों द्वारा आम पत्रकारों पर आरोप लगाकर जेल भिजवाने की घटना कोई नई नहीं है. हद तो तब है जब अदालतें भी कई बार प्रभावशाली लोगों के पक्ष में खड़ी दिखती हैं. इंदौर की एक घटना में सेशन कोर्ट ने एक पत्रकार की जमानत याचिका तीसरी बार खारिज कर दी. पत्रकार का आरोप है कि उसे प्रभावशाली लोगों ने फर्जी मामलों में फंसाया है, इसके पीछे वजह कुछ खबरों का प्रकाशन है.
‘आटो मास्टर’ पत्रिका के संपादक हैं. प्रदीप मिश्रा. उनकी जमानत अर्जी सेशन कोर्ट ने एक माह में तीसरी मर्तबा खारिज कर दी है. प्रदीप की पहली नियमित जमानत अर्जी 15 सितंबर को खारिज हुई थी. इसके बाद 20 सितंबर को दूसरी मर्तबा अर्जी खारिज हुई. 8 अक्टूबर को तीसरी मर्तबा उनकी अर्जी पर सुनवाई हुई तो न्यायाधीश अनुपम श्रीवास्तव ने पुराने हालात बने रहने का हवाला देते हुए सिरे से अर्जी खारिज कर दी.
गौरतलब है कि एलबीएफ पब्लिकेशन के चेयरमैन पुरूषोत्तम अग्रवाल की शिकायत पर पुलिस तुकोगंज ने मिश्रा के खिलाफ ब्लैकमेलिंग का केस दर्ज किया. अग्रवाल का आरोप है कि मिश्रा उसे ब्लैकमेल कर एक लाख 22 हजार 500 रूपए का चेक हासिल किया है और अनर्गल झूठी खबरें छापने की धमकी देकर 45 लाख रूपए अलग से देने की मांग कर रहा है. मामले में मिश्रा ने सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी देकर दलील दी थी कि उसने चमेलीदेवी ग्रुप आफ इंस्टीट्यूट का इश्तेहार छापने के एवज में उक्त चेक लिया था. अग्रवाल उस पर खंडन छापने के लिए दबाव बना रहा है.
अग्रवाल की ओर से अर्जी का विरोध करते हुए यह आपत्ति ली गई थी कि आरोपी पत्रकारिता की आड़ में धमकी देकर अवैध वसूली करने का आदी है. उसके खिलाफ एनआईसीटी ग्रुप (जो कि दैनिक भास्कर से संबद्ध है) ने भी मानहानि का परिवाद पेश किया हुआ है जिसमें उसके खिलाफ केस पंजीबद्ध हो चुका है और मिश्रा के हाजिर नहीं रहने से प्रकरण लंबित है. उसके पास कोई संपत्ति नहीं है, यदि उसे जमानत मिली तो वह फरार हो जाएगा. बस, इन्हीं आधार के कारण कोर्ट ने फिर जमानत देने से इनकार कर दिया. अगर प्रदीप की जगह कोई प्रभावशाली व्यक्ति होता तो अव्वल तो वह जांच के पहले जेल ही नहीं जाता और जेल जाता भी तो तुरंत उसकी जमानत हो जाती. इस प्रकरण को लेकर पत्रकारों में तरह तरह की चर्चाएं हैं.





