समय की मार ने मुझे आज ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है कि मैं अब सोचता हूं कि पीपली गांव का नत्था दास मणिकपुरी बन जांऊ। रवीश कुमार की रिपोर्ट ‘‘कुश्ती गरीबी से लड़ना सीखा देती'' है, बिलकुल सत्य है। कुश्ती का तो पता नहीं, क्योंकि कभी खेली नहीं है, हां, आर्थिक बदहाली के चलते इतना जरूर मालूम हो गया है कि ‘‘गरीबी जिंदगी जीना सीखा देती है''। बचपन से ही राष्ट्र के लिए कुछ करने की चाह रही है। मेरी उम्र करीब 20 वर्ष है और इस उम्र में आते-आते आर्थिक हालात ने मुझे जीना सिखा दिया है और जिंदगी में एडजस्ट करना भी सीख लिया है।
मेरी 12वीं तक की शिक्षा लटकते-लटकते हुई है। पढ़ाई में अच्छा था इसलिए टीचरों का भी हमेशा प्यार और सहयोग मिलता रहा। गांव का हूं तो घरवालों की हमेशा उम्मीद रही की 12वीं पास कर हमारा बेटा नौकरी करने लगेगा, आर्थिक मंदहाली से निकालेगा। लेकिन बेटे के मन में कुछ और था। वो (मैं) कुछ और ही बनना चाहता था। मैं पत्रकार बनना चाहता था। वो भी टीवी पत्रकार। इसलिए मैंने महाविद्यालय की बजाए विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया ताकि जल्दी से पत्रकार बन जाऊं। कॉलज के मुकाबले यूनिवर्सिटी की फीस काफी ज्यादा है। लेकिन मैंने जैसे-तैसे करके घरवालों को मना लिया। अब बस दाखिला लेते ही कुछ करने का मन था।
मैंने पत्रकारिता की बारीकियां सीखनी भी शुरू कर दी थी। मैंने पढ़ाई के लिए शिक्षा ऋण ले रखा है। लेकिन आज द्वीतीय वर्ष के दूसरे सेमेस्टर की फीस जो कि दस हजार रुपये है, नहीं भरी जा रही है। क्योंकि मैंने एक ऐसा फैसला कर लिया कि मेरे दस हजार जो मुझे बैंक ने दिए थे, डूब गए। मेरे एक फैसले ने मेरे सारे सपने अधूरे से कर दिए हैं। मेरे परिवार वालों के साथ बुरा वक्त चल रहा है। विद्यार्थी जीवन की आर्थिक बदहाली का वर्णन भी मैं नही कर सकता। कोई विद्यार्थी पांच रुपए लेकर क्या यूनिवर्सिटी जाएगा, जोकि बस किराया भी कम है? वो तो शुक्र भगवान का कि निजी बस वाले मेरे दोस्त बन गए। नहीं तो बिन रुपए जाने वाला पहला विद्यार्थी होता। लेकिन मैं और कर भी क्या सकता था। ऐसे में अगर कोई दोस्त चाय का कहता है तो उसके साथ चाय भी नहीं पी सकता क्योंकि अगर गलती से मेरे मुंह से ये निकल गया कि पैसे मैं दे देता हूं तो कहा से दूंगा। घर की अपनी जमीन न होने पर हमें दूसरों की जमीन हिस्से पर लेनी पड़ रही है, जिसमें घर का गुजारा भी बड़ी मुश्किल से होता है।
भाई भी इंजिनियरिंग का डिप्लोमा कर रहा है जिसकी फीस मेरे से ज्यादा है। मैंने प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया का काम सीख लिया है और कुछ और सीखने की भी कोशिश कर रहा हूं। क्योंकि मैंने छुट्टियों में यह सारा काम यूनिवर्सिटी और लोकल मीडिया से सीख लिया था। अब जाहिर सी बात है कि सीख लिया है तो किसी समाचार पत्र और चैनल में काम भी मिल जाना चाहिए। मिल भी रहा लेकिन मुफ्त। अब सच्ची पत्रकारिता करूंगा तो शायद ये मुफ्तवाला सौदा भी छूट सकता है। ऐसे स्थिति में घर वालों के सपने जल्द पूरे होते नहीं लग रहे है। क्योंकि वक्त रहते मैंने फीस नही भरी तो घर पर भी बैठना पड़ सकता है।
लगता है ऐसे हालात में मुझे अब नत्था दास मनिकपुरी बन जाना चाहिए। सुना है महंगाई के साथ-साथ सरकार ने आत्महत्या के भी दाम बढ़ा दिए है। कम से कम सरकार आत्महत्या पर एक लाख रूपए तो देगी ही देगी, शायद कुछ बोनस भी मिल जाए। इस पैसे से भाई की पढ़ाई और मेरा लिया हुआ कर्ज तो चुकता हो जाएगा जिससे शायद पापा की टेंशन कम हो जाए। मीडिया का छात्र हूं तो अंतिम इच्छा भी किसी मीडिया वाले से मिलने की होगी। फिर क्या पता नत्था (प्रमोद) मरेगा सुन कर रवीश कुमार भी आ जाएं पता लगाने के लिए कि आखिर प्रमोद कैसे नत्था बन जाना चाहता है। चैनल और अखबार वालों का हफ्ता निकल जाएगा और शायद प्रमोद की आखिरी बार रवीश कुमार से मुलाकात हो जाएगी।
उपरोक्त बातें लिखकर Parmod Risalia नामक सज्जन ने मेल आईडी [email protected] से मेल भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. मेल में सिरसा, हरियाणा का जिक्र है और मोबाइल नंबर 09315888825 दिया गया है.






