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सुख-दुख...

आलोक घटनाओं तक पहुंचकर उसकी धड़कन सुनने का जहमत उठाते थे

: आलोक तोमर के जन्‍मदिन पर विशेष : आलोक तोमर तेजस्वी और तपस्वी पत्रकार थे। कुछ वर्षों में वे अनचाही आपदा से घिर जाने के कारण क्लांत अवश्य थे परंतु नैराश्य तथा अवसाद को उन्होंने खुद पर हावी नहीं होने दिया था। अपनी साफगोई उन्होंने बचा कर रखी थी। अपने लेखन में अक्षर-अक्षर रचा कर रखी थी।

: आलोक तोमर के जन्‍मदिन पर विशेष : आलोक तोमर तेजस्वी और तपस्वी पत्रकार थे। कुछ वर्षों में वे अनचाही आपदा से घिर जाने के कारण क्लांत अवश्य थे परंतु नैराश्य तथा अवसाद को उन्होंने खुद पर हावी नहीं होने दिया था। अपनी साफगोई उन्होंने बचा कर रखी थी। अपने लेखन में अक्षर-अक्षर रचा कर रखी थी।

उनका असमय चला जाना हिंदी पत्रकारिता का दुर्भाग्य था। उनका स्वयं का दुर्भाग्य ये था कि उन्होंने खुद को हिंदी पत्रकारिता के लिए समर्पित कर दिया। वरना 'हरा भरा अकाल' जैसी जीवंत पुस्तक रचने के बाद वह राष्ट्रीय पत्रकारिता के अचर्चित न रह जाते। सूखा दुर्भिक्ष और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भारत का किसान, कृषि मजदूर आदिवासी और उनके भाग्य से जुड़ा हुआ छोटा ग्रामीण कारीगर कैसी यंत्रणा से गुजरता है इसका कटु यर्थार्थ इस पुस्तक के  एक-एक पृष्ठ में कसमसाता मिलता हैं।

नौकरशाही तथा राजनीति जैसे उन आपदाओं को अपने निर्मम निजी स्वार्थ साधने के लिए इतनी अमानुषकता के साथ इस्तेमाल करती है, इसका सुलगता वृतांत हरा भरा अकाल में मिलता है। आलोक तोमर उन पत्रकारों में से नहीं थे, जो अखबारी कतरनों और यत्र-तत्र बिखरी छपी छपाई जानकारी को सहेज कर चौंकाने वाली शैली का तड़का लगा कर परोस देते है। तु मुझे मेरे कहे, मै तुझे ग़ालिब, की गिरोहबाज पत्रकारी संस्कृति में पेज लोग उस नस्ल के लेखक को उछाल उसे अमरत्व प्रदान करने की हरचंद कोशिश भी करते हैं। वैसे लेखन के लिए सम्मानों तथा पुरस्कारों का जुगाड़ भी हो जाता है।

आलोक तोमर जन्मना विप्लवी होने के कारण पत्रकारीय संस्कृति से सरोकार कभी रख नहीं सके। इसलिए प्रायोजित प्रसिद्वि तथा पुरस्कारों से वंचित रहे। मैंने उन्हें हिंदी के उन विरले पत्रकारों में इसलिए माना था कि वे घटनाओं की तह तक पहुंच कर उसकी धड़कनों को सुनने की जहमत उठाते थे। उनका हिन्दी का पत्रकार होना दुर्भाग्य इसलिए कहा कि यदि इतना सशक्त जीवंत और सच्चा लेखन उन्होंने अंगरेजी में किया होता तो राष्ट्रीय और कुछ हद तक अंतराष्ट्रीय ख्‍याति का आभामंडल सहजता से हासिल हो गया होता। उनकी पुस्तक हरा भरा अकाल और राजनीतिक प्रशासनिक कड़ी के जो अमानवीय चेहरे उन्होंने अपने अन्य लेखन में बेबाकी के साथ दिखाए थे, वही काम को सांईनाथ ने अपने अंग्रेजी में छपे आलेखों के संकलन एवरीबडी लव्ज आ गुड ड्राऊट में किया था। साई नाथ की अंग्रेजी पुस्तक बहुत चर्चित थी।

परंतु उन्हें यश के साथ ही धनराशि देने वाला मैग्सेसे सम्मान इनायत हो गया। साईंनाथ प्रतिभा संपन्न पत्रकार हैं इसलिए उनका सम्मान भारतीय लेखन का सम्मान लगता है, परंतु आलोक तोमर और सुरेंद्र प्रताप सिंह भी उनसे उन्नीस कहां बैठते थे? क्या सतत संघर्ष और संत्रास उनका और उनका पीछा इसीलिए नहीं करता रहा कि उन्होंने अपना सर्वत्र हिंदी पत्रकारिता को दे देना पसंद किया। हिंदी की पत्रकारों का अतिरिक्त दुर्भाग्य यह है कि स्वयं अपनी ही बिरादरी में गुण ग्राहिता की अपेक्षा छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति पसरी हुई है| हिंदी में प्रतिभा और साधना के  सम्मान के मनोभाव ने भी सुविधाओं से समझौता करने वाले बहुतेरों को सूरजमुखी जमात की तरफ धकेला है। यह यह एक अंतहीन व्यथा कथा है। इस पर फिर कभी। 

आलोक तोमर पर लौटता हूँ। वे संवेदनाओं के शहंशाह पत्रकार थे। वह एक प्यारे जिंदादिल दोस्त थे, दिल्ली में, उससे पहले चंडीगढ़ में और फिर छत्तीसगढ़ में उनसे कई मुलाकातें हुईं, लम्बी बातें और बहसें भी हुईं, उनके अपने मूल्य थे और मान्यताएं थीं जिनसे वे कभी नही डिगे, सत्ता प्रतिष्ठानों की परिक्रमाएं कभी नही की। लेकिन देश और समाज के दुःख दर्द को समझने के लिए दूर दूर तक भटकने से भी कभी गुरेज नही किया। जो देखा और जो दिल पे गुजरा उसे आख़िरी सांस तक प्रिंट के अलावा सोशल मीडिया पर भी व्यक्त करते रहे। हिन्दी पत्रकरिता और हिन्दी समाज को बहुत कुछ दिया। प्रतिदान की अपेक्षा नही की। फिर भी यश तो उन्हें मिला ही था। हिन्दी पत्रकरिता को उनके अवदान का स्मरण तथा सम्मान किया जाना वंदनीय है। एक काय का आलोक एक अनंत यात्रा पर चला गया परन्तु यश काया का आलोक सहेजे रखना चाहिए।

लेखक रमेश नैयर वरिष्‍ठ पत्रकार तथा संडे आब्‍जर्वर के पूर्व संपादक हैं. इनका यह लेख डेटलाइन इडिया से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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