Shambhunath Shukla : 'यादों में आलोक' वह कार्यक्रम है जो आज बीस मार्च को शाम पौने चार बजे से दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में होगा। हालांकि मेरा मानना है कि यादों में आलोक की बजाय यादों का आलोक होना चाहिए। आलोक तोमर की कल तीसरी पुण्यतिथि है। आलोक हमारे बीच नहीं है, यह सोचना भी असहज कर देता है और लगता है कि बस अभी-अभी आलोक घर आ धमकेगा और मलकिन से कहेगा 'भौजाई आज बस कढ़ी चावल खाऊँगा।'
आलोक का यह आलोक ही रहा कि जिस आलोक को हम दो अगस्त 1983 तक जानते तक नहीं थे, वह पहली ही मुलाकात में इतना प्रभावित कर गया कि लगा ही नहीं कि आलोक हमारा आदमी नहीं है। शायद आलोक की इस कला के पीछे उसकी वह पक्षधरिता थी जो उसे लोगों से जोड़ लेती थी। जिस दौर में आलोक पत्रकारिता में आया वह वही समय था जब पत्रकारिता का मतलब स्वान्त: सुखाय नहीं वरन् उन लोगों के साथ खड़ा होने और उनके लिए लडऩे का दौर था जो वंचित थे लेकिन जिनका हिंदी पट्टी में तेजी से उभार हो रहा था। वे जो जमीन की नई बंदोबस्त प्रणाली और केंद्रीय सरकारों के तमाम कार्यक्रमों के चलते फलक में आ गए थे पर मीडिया के स्थापित लोग उस वर्ग को पकड़ नहीं पा रहे थे।
हालांकि अखबारों के मालिक इस उभार और इस बाजार को समझ रहे थे पर संपादक गण नहीं। आलोक इस नई समझ के पत्रकार थे, इसीलिए उनकी हर बात में उनकी हर रपट में यह नया उभार और नई ताजगी दिख रही थी। 1984 की सिख विरोधी हिंसा में आलोक ने सिखों के साथ खुद को आत्मसात कर एकतरफ़ा रिपोर्टिंग की लेकिन यह रिपोर्टिंग उस दौर की डिमांड ही नहीं वरन् उस दौर के लिए आवश्यक थी। आलोक ने कभी नहीं कहा कि वह निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहा है। वह खुलकर कहता था कि वह पक्षधर है लेकिन जन का। यही उसकी खासियत थी और यही उसकी यूएसपी भी।
आलोक की पत्नी सुप्रिया ने मुझे फोन कर आग्रह किया कि मैं इस कार्यक्रम का संचालन करूं। मैंने मना किया कि उस कार्यक्रम में शुद्ध भाषा और वाणी के लालित्य में पारंगत श्री राहुल देव होंगे, श्री Om Thanvi होंगे तो ऐसे लोगों के रहते मुझ जैसे कम जानकार और भाषा-ज्ञान में बेहद कमजोर व्यक्ति से वे क्यों संचालन कराना चाहती हैं? लेकिन सुप्रिया का कहना है कि 'भाई साहब दिल्ली आने पर आलोक जिसको सबसे ज्यादा पसंद करते थे वे आप हैं।' मैने कहा कि ठीक है मैं कोशिश करूंगा। आज आप लोग भी आइए अपनी-अपनी यादों को आलोकित करने और मुझ जैसे नासमझ और वाक्कला में एकदम अनगढ़ व भाषा को भासा बोलने वाले के संचालन को देखने।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.
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