आज उनके जन्म दिन पर उनको याद करते हुए 25 साल पुरानी स्मृतियों के चितवन से यादों के पुष्प सुवासित होने लगते हैं। 1986 में जनसत्ता दिल्ली के दफ्तर में अपने शहर के एक वरिष्ठ के मार्फत जिस अनोखे शख्स से मिलने का मौक़ा मिला उनके सहज बर्ताव और बिंदास लेखनी ने प्रभावित किया। फिर तो ऐसा हुआ कि रोज शाम को जनसत्ता में अपन घूमते पाए जाते। चंद दिनों की मुलाक़ात में ही आलोकजी का स्नेह छोटे भाई पर बड़े भाई की तरह बरसता। वे मुझ जैसे कई स्ट्रगलरों के बड़े भाई थे।
मैं बताना चाहूँगा कि फुल-टाईम पत्रकारिता और पार्ट-टाईम ड्रामा के उन दिनों में मुझे नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के इंटरव्यू के लिए दिल्ली बुलाया गया था और मैं जा कर लद गया अपने शहर के वरिष्ठ के सिर। परेशानी की वजह थी कि इंटरव्यू होने थे 19 जुलाई 1986 को और मैं पहुचा 30 जुलाई को। मुझे काल लैटर ही देर से मिला। अपना इरादा तो संचार मंत्री से मिल कर डाक-तार वालों की शिकायत का था क्योंकि और कोई काम तो था नहीं दिल्ली में, इस मौके पर आलोकजी गाईड बन कर सामने आए। पहले तो मेरी नौसिखिया पत्रकार वाली संचार मंत्री से संभावित मुलाक़ात और फिर देश में डाक-क्रांति लाने की मंशा से उखड़ कर उनने ऐसा भाषण दिया कि आधा दिमाग दुरुस्त हो गया। फिर मैं रोज उनके लिए खबरों के टापिक बताने के लिए पहुँच जाता।
मसलन चांदनी चौक चौराहे पर लगे सरकारी बोर्ड में हिन्दी की वर्तनी गलत है …वगैरह- वगैरह.. एक छोटे से शहर से गए अनाड़ी पत्रकार का विजन इससे ज्यादा और क्या हो सकता था। खीजे हुए आलोकजी ने कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव सुरेश पचौरी के पास भेज कर मुझे एक चिट्ठी दिलवा दी जिसमें एनएसडी के निदेशक के लिए पत्र था। ताव खा कर मैंने अपने शहर के कई बड़े नेताओं से फोन भी करा दिए। मेरा स्पेशल इंटरव्यू हुआ मगर मैं धौंस के सहारे रंगमंच में जाना चाह रहा था लिहाजा इंटरव्यू में सबने मिल कर मुझे इतना रगड़ा कि एनएसडी में दुबारा मैं कभी नहीं गया और पत्रकारिता में ही कैरियर बनाने के इरादे से मैंने आलोकजी से यह भी कहा कि अब रायपुर किस मुंह से जाना। उनके सौजन्य से दिल्ली प्रेस में मेरा आवेदन जमा हुआ जहां उस दौर में वहाँ बगैर सिफारिश के नौकरी मिल जाती थी और एक लेख लिखने पर नौकरी पक्की।
दिल्ली प्रेस से पीछा छूटते ही अपन भी महानगरीय जीवन में ऐसे रमे कि आलोकजी जनसत्ता छोड़ गए। मुलाक़ात होती मगर कैरियर की मुश्किल घड़ी में। आलोकजी मदद के लिए तत्पर रहते। उनका स्वभाव नहीं बदला। वे दूसरों से इस मायने में भी अलग थे कि दिल्ली में भी उनका शहर उनके सीने में धडकता रहा। छोटों से स्नेह से मिलते। वे खरा बोलते और खरा लिखते। डरना तो शायद सीखा ही नहीं। छोटी-मोटी शायरियाँ/कविताएँ डायरी में लिए चलने के उन दिनों में मैंने कहीं से उडाई हुई एक कविता उनको सुनाई..
मुझको दीपक सा जलना है
आलोक सभी को देना है.
जग कह दे दीपक खूब जला
बस और मुझे क्या लेना है.
आलोकजी ने कविता पसंद की मगर कहा कि "जग के कहने की कोई परवाह नहीं होनी चाहिए। जग के कहने के लिए जलेंगे?" वे जमीन से जुड़े हुए थे और दिल्ली की कृत्रिमता उनके व्यक्तित्व में नहीं आ पाई। जिसे कैंसर हो जाए वो इलाज में ही आधा हो जाता है मगर यह आलोकजी का ही कलेजा था कि उनने इस पर भी जम कर लिखा और इस रोग के इलाज के नाम पर जो धंधेबाजी चल रही है उसकी तरफ भी सबका ध्यान खींचा। उनकी मौत कैंसर से नहीं बल्कि दिल के दौरे से हुई। कैंसर को तो वे लगभग परास्त कर चुके थे। मरना तो सबको एक दिन है मगर यह साक्षात देखा कि मौत को सामने देख कर भी जो हौसला ना खोए वह आलोक तोमर ही हो सकते हैं। लेखक के रूप में आलोकजी एक रोल माडल बन गए थे। हाल के दिनों में उनने तथ्यों के साथ बड़े-बड़ों की बखिया उधेड़ डाली। उनकी अलग शैली थी। उनने सच बोलने के खतरे उठाए।
कार्टून विवाद में जेल भी गए मगर झुके नहीं। जनसत्ता में अपनी मार्मिक खबरों से चर्चा में आये आलोक तोमरजी ने सिख दंगों से लेकर कालाहांडी की मौत को इस रूप में सामने रखा कि पढ़नेवालों का दिल हिल गया। कुछ वैसे ही जैसे हर खबर सिर्फ खबर नहीं होती, कभी-कभी ख़बरों को अखबारनवीस जीता भी है उन्हें खाता भी है उन्हें पीता भी है, ख़बरों को जीने वाले ही आलोक तोमर कहलाते हैं। मौत एक दिन सबको आनी है। अन्ना हजारे ने भी कहा है कि उनको सुरक्षा नहीं चाहिए क्योंकि हार्ट अटैक तो कोई नहीं रोक सकता।
आलोक कैंसर से लड़े, लड़ते शेर ही हैं, बाकी आत्मसमर्पण कर देते हैं, एक ऐसे वक्त में जब लड़ने की बात पर है तो सब चाहते हैं इस देश में भगत सिंह पैदा तो हो मगर पड़ोसी के यहाँ हो। इस दौर में आलोक जी का ये जज्बा था कि संघर्ष में वे झुके नहीं, रुके नहीं., थके नहीं, लड़े आन बान शान से और मूल्यों के लिए लड़े. कलम की खातिर लड़े. ख़बरों की खतिर लड़े. पूछा जाए उन सिख परिवारों से जिनको न्याय दिलाने के लिए वे लड़े। जिनके खिलाफ एक शब्द भी लिखने से लोग कतराते थे, लेकिन आलोक जी ने साहस के साथ उनके बारे में भी लिखा।
आलोक तोमरजी ने सत्रह साल की उम्र में एक छोटे शहर के बड़े अखबार से जिंदगी शुरू की। दिल्ली में जनसत्ता में दिल लगा कर काम किया और अपने संपादक गुरु प्रभाष जोशी के हाथों छह साल में सात पदोन्नतियां पा कर विशेष संवाददाता बन गए। मेरी भी राय में पुरस्कार की एक घोषणा तो मध्य प्रदेश सरकार को करनी चाहिए जिसे नाज होना चाहिए कि आलोकजी वहां जन्मे और देश-दुनिया में मध्य प्रदेश का मान बढ़ाया। उनके शब्दों में ही कहूँ तो दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए और उन्होंने भारत में कश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया। दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए। झुकना तो सीखा ही नही। वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले और सीधी-सपाट बात की जिसे सरेआम छापा। जब उनको एक कार्टून मामले में जेल जाना पड़ा तो साफ़ कहा एक सवाल है आप सब से और अपने आप से। जिस देश में एक अफसर की सनक अभिवक्ति की आजादी पर भी भरी पड़ जाए, जिस मामले में रपट लिखवाने वाले से ले कर सारे गवाह पुलिस वाले हों, जिसकी पड़ताल, 17 जांच अधिकारी करें और फिर भी चार्ज शीट आने में सालों लग जायें, जिसमें एक भी नया सबूत नहीं हो-सिवा एक छपी हुई पत्रिका के-ऐसे मामले में जब एक साथी पूरी व्यवस्था से निरस्त्र या ज्यादा से ज्यादा काठ की तलवारों के साथ लड़ता है तो आप सिर्फ़ तमाशा क्यों देखते हैं?
लेखक रमेश शर्मा राष्ट्रीय सहारा, छत्तीगढ़ के ब्यूरोचीफ हैं. उनका यह लेख डेटलाइन इंडिया से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.






