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आलोक सिंघई को दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए

भोपाल। ''जिनके घर शीशे के होते हैं वह दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते''- आलोक सिंघई के जीवन पर ये कहावत सटीक बैठती है। पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करने वाले आलोक सिंघई को दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और नैतिकता की दुहाई देने से पहले इन सवालों के जवाब देना चाहिए कि जब शलभ भदौरिया अग्निपथ, भोपाल के सम्पादक थे तब ऐसा क्या हुआ था, जिसके कारण तुम्हें अग्निपथ से निकाला गया था?

भोपाल। ''जिनके घर शीशे के होते हैं वह दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते''- आलोक सिंघई के जीवन पर ये कहावत सटीक बैठती है। पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करने वाले आलोक सिंघई को दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और नैतिकता की दुहाई देने से पहले इन सवालों के जवाब देना चाहिए कि जब शलभ भदौरिया अग्निपथ, भोपाल के सम्पादक थे तब ऐसा क्या हुआ था, जिसके कारण तुम्हें अग्निपथ से निकाला गया था?

तत्कालीन जनसंपर्क आयुक्त मनोज श्रीवास्तव को ब्लैकमेल करने वाली ख़बर अपनी वेबसाइट से क्यों हटाना पड़ी? तत्कालीन लोकायुक्त रेपुसुदन दयाल सक्सेना से चल रही आपकी व्यक्तिगत लड़ाई क्यों ठंडे बस्ते में चली गयी? जब आपकी खुद की वेबसाइट है तो आपको भड़ास4मीडिया डॉट कॉम का सहारा क्यों लेना पड़ा? हम जानते हैं कि दूसरों पर कीचड़ उछालना जितना आसान है उससे कहीं अधिक कठिन काम अपने बारे में सच उजागर करना है। मैं जानता हूं कि आप में अपने बारे में सच कहने का साहस नहीं है, इसीलिए मैं आपके पत्रकारिता के जीवन पर संक्षेप्त में प्रकाश डालना चाहता हूं।

सब जानते हैं कि अग्निपथ में रहते आपने एक महिला पत्रकार के साथ अश्लील हरकतें की थी और उस महिला पत्रकार ने आपकी करतूत की शिकायत अग्निपथ के सम्पादक शलभ भदौरिया से की थी, तब शलभ भदौरिया ने आपको पुलिस के हवाले करने की बजाय नौकरी से निकालना उचित समझा और तुम पर बड़ा उपकार किया था। क्योंकि तुम पर पत्रकार होने का ठप्पा लगा था, तुम्हारी करतूत आम होती तो पूरा पत्रकारिता जगत बदनाम होता और शलभ भदौरिया नहीं चाहत थे कि तुम्हारी करतूत से पूरा पत्रकारिता समाज बदनाम हो। भलाई का बदला ये मिलेगा कोई सोच भी नहीं सकता।

दूसरी बात- तत्कालीन जन सम्पर्क आयुक्त मनोज श्रीवास्तव के बारे में आपने अपनी वेबसाइट पर जो खबर जारी की थी उसके पीछे आपकी मंशा मनोज श्रीवास्तव को ब्लैकमेल करना था, आप जब अपने इरादों में सफल हो गए तो आपने साइट से खबर हटा ली। कमोवेश  यही हाल तत्कालीन लोकायुक्त के मामले में रहा उनको भी आपने ब्लैकमेल किया और लेन-देन करने के बाद मामले से मुंह मोड़ लिया। जहां तक बात भड़ास4मीडिया को ढाल बनाने की है बताने की जरूरत नहीं कि आपकी वेबसाइट ब्लैकमेल करने और जन सम्पर्क विभाग के अधिकारियों पर अड़ीबाजी कर विज्ञापन बटोरने की है। आप अच्छी तरह जानते हो कि आपकी साइट आपके अलावा कोई नहीं देखता वर्ना देश की सर्वाधिक लोकप्रिय भड़ास4मीडिया डॉट कॉम को ढाल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।

उपरोक्त तथ्यों से पता चलता है कि आपका चरित्र क्या है और आप पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ धंधा कर रहे हो, उसके बाद भी यदि इसे कोई पत्रकारिता माने तो भगवान ही मालिक है पत्रकारिता के भविष्य का। दरअसल आप जैसे लोग कुण्ठित मानसिकता के शिकार हो ओर अपने अस्तित्‍व को बचाने के लिए इस तरह के खुराफात करते रहते हैं, वर्ना क्या कारण है कि अपने को कलमवीर समझने वाले को किसी अखबार में काम तक नहीं मिल रहा है। जहां तक शलभ भदौरिया का सवाल है तो मैं उनकी सम्पत्ति के बारे में तो नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि उनका संगठन को चलाने और पत्रकारों संगठित करने में बड़ा योगदान है। पत्रकारों की राजनीति करना और लगभग 30 वर्षों तक टिके रहना आसान बात नहीं है।

अरशद अली खान

भोपाल

 

 
 

 
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