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आशुतोष को शुभकामना देना कठिन है, क्योंकि मैं ‘आप’ को एनजीओवादी राजनीति का स्वरूप मानता हूं

Awadhesh Kumar :  पत्रकार Ashutosh का 'आप' में जाना…  मेरे से अनेक मित्रों ने पूछा है कि मैं Ashutosh जी के प्रसंग पर खामोश क्यों हूं? हर प्रसंग पर राय देना मैं आवश्यक नहीं समझता। बावजूद अचानक मन आया कि क्यों न सोच उभर रही है उसका कुछ अंश आप सबसे बांटूं। आशुतोष जी हमारे पुराने मित्र हैं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के दौर से मैं उन्हें जानता हूं। हिन्दुस्तान के फीचर पृष्ठ पर उनके लिए मैंने काफी लिखा। एकाध प्रसंग में बातचीत में तनाव भी हुआ, पर उससे संबंधों पर कोई अंतर नहीं आया।

Awadhesh Kumar :  पत्रकार Ashutosh का 'आप' में जाना…  मेरे से अनेक मित्रों ने पूछा है कि मैं Ashutosh जी के प्रसंग पर खामोश क्यों हूं? हर प्रसंग पर राय देना मैं आवश्यक नहीं समझता। बावजूद अचानक मन आया कि क्यों न सोच उभर रही है उसका कुछ अंश आप सबसे बांटूं। आशुतोष जी हमारे पुराने मित्र हैं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के दौर से मैं उन्हें जानता हूं। हिन्दुस्तान के फीचर पृष्ठ पर उनके लिए मैंने काफी लिखा। एकाध प्रसंग में बातचीत में तनाव भी हुआ, पर उससे संबंधों पर कोई अंतर नहीं आया।

प्रिंट पत्रकारिता के उस दौर में मेरे जैसे लोग चाहते थे कि आशुतोष प्रिंट क्षेत्र में रहें, लेकिन वे टीवी की ओर चले गए। यह बात अलग है कि पिछले 10 वर्षों में दस बार से ज्यादा आमना-सामना नहीं हुआ। उनके नेतृत्व में चलने वाले आईबीएन7 ने कभी मुझे बहस में नहीं बुलाया। बावजूद इसके मैं कह सकता हूं कि वर्तमान टीवी मीडिया में जिन कुछ लोगों ने ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ीं होंगी उनमें आशुतोष जी का नाम शीर्ष पर होगा। मेरे मित्र और इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक Rana Yashwant भी उनकी विद्वता के कायल हैं। कल सुबह ही बातचीत में Yashwant जी ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

अपने पद और काम को लेकर कभी अहं का शिकार होते उन्हें नहीं देखा। वे वही लिखते और बोलते हैं जो उनकी नजर में सही होता है। हां, उनकी सोच वर्तमान व्यवस्था, उनके अध्ययन की धारा तथा संगति से अवश्य प्रभावित रही है। इस कारण उनके लेखन और वाचन से अनेक बार अपनी घोर असहमति रही है। कई बार उनकी सोच भारत में प्रचलित और पाखंड का अभिप्राय हो चुकी सामाजिक न्याय वाली राजनीतिक सोच का परिष्कृत संस्करण नजर आता था। पर उनमें इतनी लोकतांत्रिकता है कि अपने मत के विपरीत मत सुन सकें और उससे कुंठाग्रस्त न हों। कभी अशालीन होकर किसी पर बरस पड़ना या भला बुरा कहना उनके स्वभाव का अंग नहीं रहा।

लेकिन उनका इस्तीफा और आप में जाने का निर्णय इन सबसे अलग है। इस समय कॉरपोरेट दबाव में जिस तरह कई मीडिया कंपनियां हैं उन्हीं में से एक आईबीएन भी है। इसलिए उनका इस्तीफा क्यों हुआ होगा यह मेरे लिए रहस्य है। कुछ समय पहले आईबीएन से भारी पैमाने पर लोग निकाले जाने को मजबूर हुए यदि उस समय उन्होंने इस्तीफा दिया होता तो इसका रंग कुछ दूसरा होता। असली कारण तो वे ही बता सकते हैं। लेकिन यह साफ है कि उनके लिए इस पर भारी दबाव रहा होगा।

हां, वे आम आदमी पार्टी में जाने के लिए आईबीएन से बाहर आए होंगे मेरे लिए ऐसा मानने का कोई कारण नहीं। उनके जीवन में सामाजिकता, सार्वजनिक सरोकार की उत्कटता तथा समाज के लिए अपने निजी जीवन को दांव पर लगाने या पत्रकारिता छोड़कर कूद पड़ने का जज्बा भी मैंने नहीं देखा। अन्ना अनशन अभियान एवं आप के प्रति उनका अति उत्साह…हमेशा दिखता था। अपने पत्रकारीय पेशे की सीमाओं से परे जाकर अन्ना अनशन एवं आप को महिमामंडित करते हुए उन्हें आसानी से देखा जा सकता था।

हर पत्रकार एक नागरिक है और उसके नाते उसे आंदोलन, अभियान, चुनाव, पार्टी आदि में अपनी भूमिका तय करने और निभाने का अधिकार है। पर यह सक्रियतावादी पत्रकारिता का ऐसा नमूना था, जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता है, भले उसके पीछे इराद जो भी हो। आशुतोष अन्ना अभियान एवं आप की राजनीति को भारत में बेहतर राजनीतिक बदलाव का अंग मानते हैं, लेकिन एक चैनल के प्रमुख रहते हुए उनकी भूमिका अन्ना अभियान और आप के सक्रिय भागीदार जैसी हो जाती थी। मेरे मत में इससे वे बचते हुए भी इनका समर्थन कर सकते थे।

बहरहाल, जब वे 'आप' में जा रहे हैं तो अब 'आप' के नेता के रूप में जाने जाएंगे। लेकिन मेरे लिए शुभकामना देना इसलिए कठिन है, क्योंकि मैं आप को एनजीओवादी राजनीति का स्वरूप मानता हूं जिसका समर्थन नहीं कर सकता। फिर भी मेरी सहानुभूति उनके साथ है।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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