अनूप भटनागर. दिल्ली में कई दशक से कई बड़े मीडिया संस्थानों के साथ पत्रकारिता की अलख जगाते रहे. सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले हिंदी के पहले और वरिष्ठतम पत्रकार हैं. सहज सरल स्वभाव वाले वरिष्ठ पत्रकार अनूप भटनागर इन दिनों ज़िंदगी की कई कड़वी हकीकत से दो-चार हैं. उन्हें जिस समय उनके संस्थान की सबसे ज्यादा समर्थन की जरूरत थी, अचानक उन्हें अकेले छोड़ दिया गया. जिन पर उन्होंने सबसे ज्यादा भरोसा किया और हर मुश्किल अच्छे वक्त में उनके खड़े रहे, उन्होंने अनूप के मुश्किल वक्त में नाता तोड़ लिया. चुपचाप अपना काम करते रहने में भरोसा करने वाले अनूप भटनागर इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. लेकिन कुछ माह पहले तक वह आलोक मेहता के नेतृत्व वाले नई दुनिया में लीगल एडिटर के रूप में कार्यरत थे.
हिंदुस्तान, पीटीआई, दैनिक जागरण समेत कई संस्थानों में काम कर चुके अनूप भटनागर इन दिनों हर सप्ताह दो बार डायलिसिस की प्रक्रिया से गुजरते हैं. उनका इलाज चल रहा है. फिर भी वे पूरी तरह सक्रिय हैं. दिल्ली की दुनिया में जो सच्चे और अच्छे पत्रकार होते हैं, उन्हें बाहर के लोग कम ही जान पाते हैं क्योंकि वे खुद के ज्यादा प्रचार प्रसार पर कभी तवज्जो नहीं देते. वे चुपचाप अपना काम पसंद करते हैं. और, आजकल मीडिया की राजनीति में चुपचाप अपना काम करने वाले, किसी गुट में न रहने वाले, चापलूसी और झूठ का सहारा न लेने वाले पत्रकार उपेक्षित ही रह जाते हैं. ऐसे पत्रकार अनूप भटनागर के जीवन, सोच, सबक आदि के बारे में भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने लंबी बातचीत की. पेश है कुछ अंश…
– बचपन और पढ़ाई लिखाई के बारे में बताएं.
— मेरा बचपन बहुत कष्ट और परेशानियों में बीता। जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले बहराइच में हुआ। बाल्यावस्था में ही माता पिता का साया उठ गया था। पिता के निधन के बाद मेरी और छोटी बहन की जिम्मेदारी बड़े भाई दिलीप कुमार के कंधों पर आ गई थी। बड़े भाई ने पढाई के लिए मुझे लखनऊ भेजा जहां मैने बी.काम. और फिर एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की। दिशाहीनता के इस दौर में बड़े भाई के अलावा मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं था। ऐसी स्थिति में जो उचित समझा या समझा दिया गया उसी पर आगे बढने की कोशिश की।
– दिल्ली आना कैसे हुआ.
— दिल्ली आने की घटना रोचक है। भाई साहब विवाह के बाद दिल्ली आ गए थे। मैं लखनऊ में था। एलएलबी प्रथम वर्ष की परीक्षा देने के बाद जून जुलाई 1979 में दिल्ली आया। दिल्ली की दिनचर्या और कार्यशैली से दंग था। कुछ समय इस चकाचौंध में खोया रहा। फिर कुछ करने का विचार आया। एक टाइप स्कूल में हिन्दी में टाइप करके पहली बार पैसा कमाया। इसके बाद पत्रकारों की एक सोसायटी में नौकरी मिल गई। इस सोसायटी में पांच साल काम किया और इस दौरान सर्वश्री श्रीकांत वर्मा, कपिल वर्मा, मोहम्मद शमीम, योगेन्द्र बाली, एसी सक्सेना, पुष्प सराफ और टी आर रामचंद्रन जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के संपर्क में आया और इनसे बहुत कुछ सीखा जो आज भी काम आ रहा है। पांच साल की नौकरी के बाद मैने एक चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट मित्र की फर्म से जुड कर टैक्स मामलों की वकालत करने की दिशा में कदम बढाया। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
– पत्रकारिता के क्षेत्र में कैसे आए.
— पत्रकारिता के क्षेत्र में आना महज संयोग रहा। जून-जुलाई 1984 में एक दिन सांसद श्रीकांत वर्मा की पत्नी वीणा वर्मा जी ने फोन पर कहा कि वर्मा जी उन्हें याद कर रहे हैं। श्रीकांत वर्मा जी से डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मिला तो उन्होंने पूछा क्या कर रहे हो? जब मैंने कहा कि वकालत करने की कोशिश कर रहा हूं तो वह बोले कि भई तुम्हे तो पत्रकारिता करनी है, वकालत की ओर क्यों जा रहे हो? उन्होंने कहा कि एक साप्ताहिक पत्र निकल रहा है और मुझे इसमें काम करना है। श्रीकांत वर्मा जी का आदेश शिरोधार्य था। इसके बाद श्रीकांत जी के सानिध्य में साप्ताहिक समाचार पत्र 'प्रेक्षा' का प्रकाशन शुरू हुआ। इस तरह मैं पत्रकारिता से जुड़ा।
– किन किन संस्थानों में काम किया.
— प्रेक्षा समाचार पत्र का प्रकाशन बंद होने के बाद मैंने दैनिक जागरण, पीटीआई भाषा, हिन्दुस्तान और फिर नई दुनिया में काम किया। प्रेक्षा के प्रकाशन के कुछ महीने बाद ही अक्तूबर 1984 में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या हो गई। इसके बाद चुनावों की घोषणा हो गई और श्रीकांत जी पार्टी के कामों में अत्यधिक व्यस्त हो गए। उन्होंने इस समाचार पत्र से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। श्रीकांत जी के अलग होने के बाद मैंने भी समाचार पत्र छोड़ दिया। इस तरह मैं बेरोजगारी की स्थिति में जा पहुंचा। बेरोजगारी के दौरान चुनिन्दा वरिष्ठ पत्रकारों ने मार्गदर्शन किया और उन्ही के प्रयासों से मुझे दैनिक जागरण के दिल्ली ब्यूरो में नौकरी मिली। जागरण के ब्यूरो प्रमुख थे श्री चतुर्भुज मिश्रा जिन्होंने मुझे काम की खुली छूट दी थी।
इसी दौरान मेरे वकील मित्र भरत संगल ने कहा कि अनूप, सुप्रीम कोर्ट की खबरों का संकलन शुरू करो और हम तुम्हारी मदद करेंगे। इस तरह मैं सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही कवर करने लगा। सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी पत्रकारों का दबदबा था, जो आज भी है, लेकिन मै कुछ संकोचों के साथ लंबे समय तक अलग थलग रहते हुए काम करता रहा। इसी बीच मुझे सुप्रीम कोर्ट का एक्रेडिटेशन मिल गया और इस तरह मैं भी सुप्रीम कोर्ट के अंग्रेजी दां पत्रकारों की जमात में शामिल होकर उनके साथ काम करने लगा। सुप्रीम कोर्ट में आज स्थिति काफी बदल चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट में हिन्दी के कई पत्रकारों को मान्यता मिल चुकी है। यही नहीं, अब एक्रेडिटेशन के बगैर भी अस्थाई पास की मदद से न्यायालय की कार्यवाही का संकलन हो सकता है पहले ऐसा करना मुश्किल था।
अप्रैल 1986 में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार पीटीआई भाषा में ज्वाइन किया। पीटीआई में काम के दौरान बहुत कुछ सीखा। खबरें लिखने की शैली सीखी। प्रतिद्वन्दी से पहले कम शब्दों में तत्परता से खबर फाइल करने की कला भी वहीं सीखी जो आज भी काम आ रही है। पीटीआई के वरिष्ठ सहयोगियों के सानिध्य में अनेक चुनौतीपूर्ण असाइनमेन्ट भी किए। फरवरी 1997 तक भाषा में नौकरी की और इस दौरान राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित अनेक महत्वपूर्ण नेताओं के साथ देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया। फरवरी 1997 तक भाषा में और फिर जून 2008 तक हिन्दुस्तान में काम किया। इसके बाद जून, 2008 में नई दुनिया में आ गया था।
1984-85 में रामस्वरूप जासूसी कांड की दिल्ली हाईकोर्ट में बंद कमरे में हो रही सुनवाई की कवरेज के दौरान मैं आलोक मेहता के संपर्क में आया। श्री आलोक मेहता जब हिन्दुस्तान अखबार पहुचे तो फिर उनसे संपर्क हुआ और उन्होंने फरवरी 1997 में हिन्दुस्तान अखबार में काम करने का आफर दिया जिसे मैंने तुरंत स्वीकार भी कर लिया। इस तरह मैं न्यूज एजेन्सी से निकल कर अखबार में पहुंच गया था। हिन्दुस्तान अखबार में काफी लंबे समय तक मेरे पास बैठने के लिए उचित स्थान नहीं था। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में काम करता रहा। आलोक मेहता के कार्यकाल में हिन्दुस्तान में मेरी दिनचर्या अदालत तक सिमट कर रह गई थी। श्री अजय उपाध्याय के संपादक बनने पर पदोन्नति हुई और फिर लोकसभा का प्रेस कार्ड भी बहाल हुआ। श्री अजय उपाध्याय के इस्तीफे के बाद श्रीमती मृणाल पांडे संपादक बनी। श्रीमती मृणाल पांडे के कार्यकाल में कई बार विदेश यात्रा का अवसर मिला। इसी बीच आलोक मेहता जी ने नई दुनिया में आने का प्रस्ताव रखा जिसे मैंने बगैर किसी संकोच के स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन नई दुनिया शुरू होने के बाद जो तस्वीर सामने आई तो मन में अनेक शंकाएं जन्म लेने लगीं। एक बार नई दुनिया के मेट्रो एडीटर से कहा भी कि कहीं मेरा निर्णय गलत तो नहीं हो गया?
– आलोक मेहता के साथ कई जगहों पर आप रहे, कैसा अनुभव रहा आपका.
— जहां तक सवाल आलोक मेहता के साथ काम करने के अनुभव का है तो मेरा मानना है कि उनकी कार्यशैली में काफी बदलाव आ चुका है। पहले वह पत्रकारों के काम का सम्मान करते थे लेकिन नई दुनिया में अनुभव हुआ कि उन्हें भी काम करने वालों से ज्यादा दरबारियों और चाटुकारों की आवश्यकता है जो उनकी हां में हां मिलाते रहे और बार बार उनके सामने कोरनिस बजाते रहें। मुझे याद है कि नई दुनिया में एक बार आलोक मेहता ने सबके सामने कहा था कि भटनागर जी और मानसी जी तो उनके कमरे में आते ही नहीं है। इस पर मैंने कहा था कि जब भी जरूरत होगी या किसी महत्वपूर्ण खबर के बारे में जानकारी देनी होगी या परामर्श करना होगा तो जरूर आऊंगा और इस परंपरा का निर्वाह नई दुनिया में अपने कार्यकाल के अंतिम दिन तक मैंने बखूबी किया। बाकी लोगों के बारे में टिप्पणी करना व्यर्थ है।
आलोक मेहता के बारे में इतना जरूर कहना चाहूंगा कि उनकी कार्यक्षमता पर किसी को संदेह नहीं है लेकिन उनकी कार्यशैली किसी भी संस्थान का भट्टा बिठाने की क्षमता रखती है। इस संदर्भ में हिन्दी की आउटलुक पत्रिका और नई दुनिया के एनसीआर संस्करण की बदहाली जगजाहिर है। नई दुनिया में आलोक मेहता को असीमित अधिकार मिले थे जिनका इस्तेमाल उन्होंने शुरू में दिल्ली संस्करण को जमाने में और फिर करीब पांच करोड़ रुपए सालाना का नुकसान दे रही संडे मैगजीन को निरंतर प्रकाशित करते रहने की जिद पूरी करने के लिए किया। संडे नई दुनिया के साथ मुफ्त में दी जाने वाली इस पत्रिका से किसका भला हो रहा था, यह आलोक मेहता जी अधिक बेहतर जानते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि नई दुनिया जैसे प्रतिष्ठित अखबार की आर्थिक हालत खराब करने के कारणों में सडे संस्करण के साथ निकलने वाली इस मैगजीन का भी बड़ा योगदान रहा है।
– आपका डायलिसिस चल रही है. इस दिक्कत तकलीफ के दौरान आफिस का काम कैसे करते रहे.
— जहां तक सवाल मेरी डायलिसिस का है तो इस वजह से मेरे काम पर बहुत अधिक असर नहीं पड़ा था। जनवरी 2011 में डाक्टरों ने डायलिसिस के लिए फिस्टुला बनवाने की सलाह दी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मैंने आलोक जी को बताया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि परेशान होने की जरूरत नहीं है, कन्हैया लाल नंदन जी तो 15- 20 साल तक डायलिसिस के बावजूद काम करते रहे। मेहता जी ने मुझसे कहा कि स्वास्थ का ध्यान रखते हुए सहजता से काम करूं। इस प्रोत्साहन ने नए उत्साह का संचार किया और मैं नई ऊर्जा के साथ काम करने लगा। डायलिसिस के बाद मैं सीधे सुप्रीम कोर्ट जाता था और फिर आफिस आकर खबरें लिखता था। नई दुनिया में अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में मैंने दो बार दस दस दिन अवकाश लिया क्योंकि उस दौरान मेरी सर्जरी हुई थी। डायलिसिस के कारण होने वाली थकान की वजह से उस दिन देर से काम शुरू करता था लेकिन काम पूरा करता था। मेरे सहयोगी कहा करते थे कि डायलिसिस के दिन मुझे आफिस नहीं आना चाहिए लेकिन मैं ऐसा नहीं करता था क्योंकि मुझमें काम करने से नई शक्ति का संचार होता है। यही नहीं, मुझे यह भी पता था कि दूसरों के बारे में शिकायत करने या कान भरने के मौकों की तलाश में रहने वाले दरबारी आलोक मेहता के कान भरने का कोई मौका गंवाना नहीं चाहेंगे।
मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि डायलिसिस कराने के बावजूद कुछ सावधानियों के साथ सामान्य जीवन व्यतीत करना संभव है। इस तरह की परिस्थितियों में चिकित्सक और डाइटीशियन की सलाह बहुत काम आती है। डायलिसि कराने की प्रक्रिया और इसके बाद की मनःस्थिति के संदर्भ में 'थ्री ईडियट' में आमिर खान का मंत्र 'आल इज वेल' और नंदन जी की सक्रियता को हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
– पत्रकारिता में आपके रोल माडल कोन लोग रहे हैं
पत्रकारिता में मेरे रोल माडल श्री शरद द्विवेदी और श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह रहे हैं। एसपी सिंह जी के साथ काम करने का तो अवसर नहीं मिला लेकिन उनके साथ उठने बैठने और बतियाने का मौका कई बार मिला था। श्री सिंह चाहते थे कि मैं नवभारत टाइम्स के लिए सुप्रीम कोर्ट की कवरेज करूं। वह मुझे दो तीन बार श्री राजेन्द्र माथुर से मिलाने के लिए नवभारत टाइम्स भी ले गए लेकिन इत्तेफाक से एक बार भी श्री माथुर से मुलाकात नहीं हो सकी थी। जहां तक शरद द्विवेदी जी का संबंध है तो उन्होंने नई पीढी के पत्रकारों को एजेन्सी में काम करने की कला सिखाई। श्री द्विवेदी ने समाचार भारती, समाचार, यूनीवार्ता और फिर भाषा में काम किया था। उनके पास पत्रकारिता का व्यापक अनुभव था। लेकिन किसी प्रकार का घमंड नहीं था। वह युवा पीढी को पत्रकारिता के नए नए गुर सिखाने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।
– उन लोगों के नाम बताइए जिनसे आप जीवन में बेहद प्रभावित रहे.
— ऐसे कई व्यक्ति हैं लेकिन उनके नामों का जिक्र करना उचित नहीं होगा।
– पत्रकारिता पर बाजारवाद के हावी होते जाने से क्या दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं.
— पत्रकारिता पर हावी हो रहे बाजारवाद का ही नतीजा है कि आज खबरों से अधिक पैकेजिंग का महत्व हो गया है। प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की होड़ का ही नतीजा है कि कई बार अधकचरी खबरों को ही सजा कर पेश कर दिया जाता है। बाजारवाद के दौर में युवा पत्रकार सीखने की बजाए किसी न किसी तरह आगे निकलने की होड मे हैं। इसमें इलेक्ट्रानिक मीडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है।
– पहले और आज की पत्रकारिता में क्या फर्क महसूस करते हैं.
— इलेक्ट्रानिक मीडिया के उदभव से पहले काम करने की शैली एकदम भिन्न थी। पहले पत्रकारिता के मानदंडों को ध्यान में रखते हुए ही खबरें लिखी और पेश की जाती थी। वह संचार क्रांति का दौर नहीं था। इंटरनेट और मोबाइल नहीं थे। इस वजह से पत्रकारों को भी खासी मेहनत करनी पड़ती थी। पहले तथ्यों की पुष्टि के बाद ही खबरें लिखी जाती थीं और परिस्थितियों के अनुसार सूत्र की पहचान गुप्त रखने के उद्देश्य से खबर सूत्रों के हवाले से लिखी जाती थी लेकिन आज ऐसा नहीं है। मुझे महसूस होता है कि अब पत्रकार के मन में उपजे ताने बाने या कही सुनी बातों को ही सूत्रों के हवाले से पेश करने का चलन बढा है। आज घटनास्थल पर जाए बगैर ही सिर्फ इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आ रही खबरों के सहारे खबर गढ देने का सिलसिला भी चल निकला है। पहले ऐसा नहीं था। पत्रकार हमेशा घटनास्थल पर जाते थे। शायद यही वजह है कि इन दिनों पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
– आपको अपने भीतर तीन सी कमी नजर आती हैं.
— सहजता से लोगों पर भरोसा कर लेता हूं। दूसरों को आहत किये बगैर ही सभी को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति के कारण कई बार असहमति के भावों को मन में ही रख लेता हूं। इस कमी का अहसास है और इसका खामियाजा भी भुगता है लेकिन इस उम्र में स्वभाव तो बदलेगा नहीं।
-आप खुद को किस बात के लिए शाबासी देना चाहेंगे.
— उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से निकले युवक के लिए बतौर हिन्दी पत्रकार 25 साल से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की कवरेज बड़े बड़े मीडिया संस्थानों के लिए करना बहुत बड़ी उपलब्धि मानता हूं। एक छोटे से शहर से निकल कर दिल्ली जैसे महानगर में किसी मजबूत आधार के बगैर ही अपनी जगह बनाने में मिली सफलता पर संतुष्ट हूं। लेकिन मुझे लगता है कि अभी इस पड़ाव से आगे भी जहां और है जिसके लिए सतत प्रयास और संघर्ष की जरूरत है।
अनूप भटनागर से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





