Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

इंडियन मुस्लिम पेज पर “राम” नाम को लेकर भड़काने वाला भ्रामक प्रचार

ऐसा लगता है कि कुछ मतान्ध और कट्टर मुस्लिमों ने फेसबुक पर मिथ्या-प्रचार का अभियान छेड़ रखा है. इनमें इंडियन मुस्लिम नामक पेज सबसे आगे है. ऐसे ही अपने एक पोस्ट (https://www.facebook.com/IndMuslim/posts/417529895027279#!/IndMuslim/posts/417529895027279) में ये पेज "राम" नाम पर हिन्दू आस्था पर भ्रामाकपूर्ण तथ्यों के जरिये भड़काने वाला चोट करता है.

ऐसा लगता है कि कुछ मतान्ध और कट्टर मुस्लिमों ने फेसबुक पर मिथ्या-प्रचार का अभियान छेड़ रखा है. इनमें इंडियन मुस्लिम नामक पेज सबसे आगे है. ऐसे ही अपने एक पोस्ट (https://www.facebook.com/IndMuslim/posts/417529895027279#!/IndMuslim/posts/417529895027279) में ये पेज "राम" नाम पर हिन्दू आस्था पर भ्रामाकपूर्ण तथ्यों के जरिये भड़काने वाला चोट करता है.

पूरे पोस्ट को पढ़ कर (Screenshot नीचे दिए गए हैं) आपको पेज के एडमिनों के इतिहास और दर्शन के ज्ञान को लेकर हंसी भी आएगी और उनके दूषित मानसिकता को लेकर रोना भी आएगा। पूरे पोस्ट के विषय-वस्तु को पढ़कर ये साफ़ पता चल जायेगा कि इसमें कितने झूठ और प्रपंचों का सहारा लेकर राम नाम के प्रति जानबूझ कर वैमनस्य फैलाया गया है. साथ ही शातिराना तरीके से पोस्ट को लिखने वाले का नाम हिन्दू-पहचान के साथ दिया गया है. जबकि इस पेज का कोई एडमिन अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करता.

अब जहां तक इस पोस्ट में उल्लेखित अर्थी-यात्रा में "राम नाम सत्य है" के उद्घोष का सवाल है तो ये सबको पता है कि अर्थी-यात्रा का प्रयोजन ही लोगों के मानस को ये सन्देश देने का है कि मनुष्य-जीवन क्षणिक है, क्षण-भंगुर है और जिसकी अंतिम परिणिति मृत्यु ही है यानि अंतिम सत्य मृत्यु ही है. इसी क्रम में ऐसे उद्घोष की आवश्यकता पड़ी जो ये सन्देश सीधा और बेबाकी से दे सके. "मरा (मृत्यु) सत्य है" – ऐसा ही उद्घोष था. चूँकि सनातन दर्शन अपने स्वभाव से ही विनीत और उदार रहा तो मृतक के अंतिम यात्रा में ऐसे कठोर शब्द का सीधा उपयोग भी थोड़ा अनुचित प्रतीत हुआ. और फिर "मरा" शब्द का स्थान "राम" को दे दिया गया. शब्द तो उल्टा हो गया लेकिन भाव और उद्घोष का सन्देश वही समझा और रखा गया.

वैसे भी यदि मरा-मरा शब्द का निरंतर जाप किया जाये तो वो राम-राम हो जाता है. साथ ही इससे दो उद्देश्य एक साथ साध गये. पहला तो सन्देश भाव में यथावत रहा और साथ ही उसे राम जैसे कल्याणकारी और कर्णप्रिय शब्द का सहारा भी मिल गया. तथा मरा और राम शब्द के बीच के इस सम्बन्ध का परिचय हर हिन्दू बालक को तुलसीदास के उस कथा से दिया जाता है, जहाँ मरा-मरा का जाप करते करते वो राम-राम कहने लगे थे. अब इससे कोई ये अर्थ निकाल ले की राम शब्द अशुभ और और अपवित्र है तो उसपे दया ही आ सकती है. ऐसा लिखने वाले ये भी भूल जाते है कि हिन्दू अपने हर कार्य के शुभारम्भ और अभिवादन में जय श्री राम ही कहते हैं. लेकिन कुछ मदरसों के बाहर बंटने वाले दो पृष्ठों के पम्लेट के सहारे ज्ञानी बनने वालों से अपेक्षा भी क्या की जा सकती है.

उसी तरह बात आती है दलितों के अपने उपनाम को राम रखने पर. इस पर अपना ज्ञान बघारने वालों को थोडा इतिहास पढ़ना चहिये. ये कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब दलितों ने अपना उपनाम "राम" रखना शुरू किया. और ये नतीजा था महात्मा गांधी के उस क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी जाति- और छुआछुत निषेध आन्दोलन का जिसमें उन्होंने सैकड़ों वर्षों से उपेक्षित रहे समाज के एक वर्ग को जो दलित कहलाता था, को "हरीजन-  इश्वर के जन" कह कर बुलाना शुरू किया था. और इसी क्रम में हरिज़नों को, दलितों को राम तथा कृष्ण जैसे हिन्दू आस्था के ईश्वरीय आत्माओं के नाम पर अपना उपनाम रखने का अनुरोध हुआ, आग्रह हुआ. अब कोई इसे राम और कृष्ण शब्द के अपवित्र होने के अशुभ हो जाने के रूप में देखता है तो इससे पता चलता है कि वो खुद कितना बड़ा जातिवादी सोच का है, कितनी दूषित मानसिकता का है. साथ ही ये भी पता चलता है कि देश के इतिहास का उसे कितना ज्ञान है, कितना भान है. यहाँ फिर वही बात आती है की कुछ मदरसों के बाहर बंटने वाले दो पृष्ठों के पम्लेट के सहारे ज्ञानी बनने वालों से अपेक्षा भी क्या की जा सकती है.  

फेसबुक ने ऐसे लोफरों, आवारागर्दों और डपोर-शंखों जिन्हें न इतिहास का कोई इल्म है न दर्शन का; की बातों को एक

अभिवन शंकर

बेहद विस्तृत माध्यम दे दिया है जो चिंता की बात है. और उससे भी चिंता की बात ये है कि ऐसी बातें करने वाला पेज खुद को भारतीय मुस्लिमों का प्रतिनिधि बतलाता है. मुझे पूरा विश्वास है की भारतीय मुस्लिम समाज के वाजिब इल्मदार इस तरह के वाहियात और अधकचरे बातों से इत्तेफाक नहीं रखते होंगे और समाज में घृणा और असत्य फैलाने वाले इस तरह के कुत्सित प्रयासों का कतई समर्थ नहीं करते होंगे. लेकिन ऐसे पेजों को मिले सवा लाख लाइक्स मेरे इस भरोसे को कहीं न कहीं कमज़ोर भी कर रहे हैं.

लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और फिलहाल एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं. अभिनव शंकर को थोरियम घोटाले का भंडाफोड़ करने का श्रेय जाता है.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...