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इंडिया टीवी में अभिव्यक्ति की आजादी के पहरेदारों के लिए गुलामी का फरमान

न्यूज चैनल इंडिया टीवी से एक बुरी खबर है. यहां के एचआर और एडमिन के हेड पुनीत टंडन ने एक मेल जारी कर कर्मियों से कहा है कि वे आफिस टाइम में चाय पीने के लिए भी आफिस से बाहर न जाएं. मेल में यह भी कहा गया है कि बाहर की चाय स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है इसलिए लोग इससे परहेज करें और आफिस टाइम में आफिस से बाहर न जाएं. इस आदेश के जारी होने के बाद इंडिया टीवी कर्मियों में हलचल मच गई है. इंडिया टीवी के कुछ कर्मियों का कहना है कि इंडिया टीवी बिग बास के घर जैसा हो गया है जहां से बाहर नहीं निकला जा सकता.

न्यूज चैनल इंडिया टीवी से एक बुरी खबर है. यहां के एचआर और एडमिन के हेड पुनीत टंडन ने एक मेल जारी कर कर्मियों से कहा है कि वे आफिस टाइम में चाय पीने के लिए भी आफिस से बाहर न जाएं. मेल में यह भी कहा गया है कि बाहर की चाय स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है इसलिए लोग इससे परहेज करें और आफिस टाइम में आफिस से बाहर न जाएं. इस आदेश के जारी होने के बाद इंडिया टीवी कर्मियों में हलचल मच गई है. इंडिया टीवी के कुछ कर्मियों का कहना है कि इंडिया टीवी बिग बास के घर जैसा हो गया है जहां से बाहर नहीं निकला जा सकता.

आफिस के अंदर जो कैंटीन है उसमें बेहद घटिया चाय और खाना परोसा जाता है. इसी कारण लोग बाहर चाय पीने जाते हैं. पर स्वास्थ्य कारणों का बहाना बनाकर उन्हें आफिस से बाहर निकलने से रोका जा रहा है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. यह सब उस चैनल में हो रहा है जिसके मालिक रजत शर्मा खुद पत्रकार रहे हैं. पत्रकार अपने काम के दौरान खाली होने पर बाहर चाय सिगरेट के जरिए अपना तनाव निकालता है और फिर फ्रेश मूड में आफिस में काम करता है. लेकिन यह तुगलकी फरमान इंडिया टीवी में कर्मियों की कार्यक्षमता को प्रभावित करेगा.

नौ घंटे तक आफिस में कैद रहकर काम करने से अच्छा आउटपुट नहीं आ सकता. बाहर ठेले पर चाय नाश्ता के बहाने पत्रकार आपस में कई इशुज पर डिस्कस भी करते हैं. इससे उनमें जीवंतता का स्तर बना रहता है पर इंडिया टीवी के पत्रकार अब गुलाम की तरह आफिस में ही नौ घंटे तक पड़े रहेंगे और नौ घंटे खत्म होने का इंतजार करेंगे ताकि आजादी की सांस ले सकें.

उल्लेखनीय है कि इंडिया टीवी टीआरपी के मामले में नंबर एक या नंबर टू पर रहने वाला चैनल है और इसे काफी विज्ञापन मिलता है जिसके कारण अच्छी खासी कमाई होती है लेकिन इस चैनल ने पांच साल में सिर्फ एक बार इनक्रीमेंट अपने कर्मियों को दिया है. कई अन्य सुविधाएं भी यहां के कर्मियों को नहीं मिलती. अब उनकी आजादी पर भी लगाम लगा दिया गया है, जिससे अभिव्यक्ति के पहरेदारों में आक्रोश है. लोगों का कहना है कि जो दूसरों की समस्याओं और आजादी के लिए लड़ाई लड़ते हैं वे खुद अब अपने संस्थान में गुलाम बनकर रह गए हैं.

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