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इतना महंगा अखबार और इतनी घटिया रिपोर्टिंग

यशवंतजी, अब मीडिया इस दौर में पहुंच गई है कि जहां थोड़ी पैसे हाथ में आए नहीं कि चैनल, अखबार, मैगजीन खोल कर धंधा शुरू कर दिया. अब पत्रकारिता जनसरोकार की बात नहीं धंधे की जात हो गई है. आखिर पत्रकारिता का काम भी चोखा है. सेटिंग हो गया तो बल्‍ले बल्‍ले है नहीं तो किसी को हड़काने के लिए हल्‍ले हल्‍ले तो है ही. विज्ञापन मिलेगा ऊपर से. खैर, जब गली मोहल्‍ले में अखबार और पत्रिका के कार्यालय खुल रहे हैं तो पत्रकारों की जरूरत पड़ेगी ही. पर बड़े से लेकर छोटे संस्‍थान को पत्रकार ऐसे चाहिए जो पैसा ना मांगते हों.

यशवंतजी, अब मीडिया इस दौर में पहुंच गई है कि जहां थोड़ी पैसे हाथ में आए नहीं कि चैनल, अखबार, मैगजीन खोल कर धंधा शुरू कर दिया. अब पत्रकारिता जनसरोकार की बात नहीं धंधे की जात हो गई है. आखिर पत्रकारिता का काम भी चोखा है. सेटिंग हो गया तो बल्‍ले बल्‍ले है नहीं तो किसी को हड़काने के लिए हल्‍ले हल्‍ले तो है ही. विज्ञापन मिलेगा ऊपर से. खैर, जब गली मोहल्‍ले में अखबार और पत्रिका के कार्यालय खुल रहे हैं तो पत्रकारों की जरूरत पड़ेगी ही. पर बड़े से लेकर छोटे संस्‍थान को पत्रकार ऐसे चाहिए जो पैसा ना मांगते हों.

अब जो पत्रकार काम धाम जानते हैं वो तो फ्री में काम करने को तैयार नहीं होंगे. पर जिन्‍हें पत्रकारिता के नाम पर अपनी दुकान चलानी है वो तो ऐसे अखबारों-चैनलों को खोजते ही रहते हैं. आखिर मीडिया बाहरी ग्‍लैमर के साथ भोकाल का फील्‍ड भी तो हैं. ऐसा ही एक अखबार है पूर्वांचल प्रहरी, जिसका प्रकाशन गुवाहाटी से होता है. बारह पेज के इस पेपर की कीमत है छह रुपये. यह अखबार साल में पांच से छह करोड़ रुपये का विज्ञापन कलेक्‍ट करता है, पर अपने पत्रकारों को देने के लिए इसके पास पैसा नहीं होता है.

अपने रिपोर्टरों को यह अखबार देता है सिर्फ दो हजार रुपये. अब जब इतने कम में रिपोर्टर आएंगे तो काम भी उसी हिसाब से करेंगे. मैं आपको पूर्वांचल प्रहरी अखबार की रिपोर्टिंग की शैली दिखाना चाहता हूं. आपको एक कटिंग भेज रहा हूं. आप भी इस कटिंग वाले समाचार को देखकर अपना माथा पीट सकते हैं. अब इतना महंगा अखबार लेकर क्‍या लोग इसी तरह की घटिया रिपोर्टिंग पढ़ेंगे. आप भी देखिए पूर्वांचल प्रहरी अखबार की खबर और उसकी भाषा शैली.  

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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