: बे-ईमानी और स्वार्थपरकता की अदभुत मिसाल : बकौल निलय उपाध्याय 'नवें दशक के लेखकों की जब आंख खुली तो सबसे पहले उसने यही सब कुछ देखा और अपने लिए रास्ते की पड़ताल की। नवें दशक के पहले दौर में जो कवि आए उसमें स्वप्निल श्रीवास्तव, विनोद दास, मदन कश्यप, देवी प्रसाद मिश्र, विमल कुमार, लीलाधर मंडलोई, संजय चतुर्वेदी, कुमार अंबुज, हरीश चंद्र पांडे प्रमुख थे।
दूसरे दौर में एकान्त श्रीवास्तव, बद्री नारायण, अष्ट भुजा शुक्ल, नवल शुक्ल, बोधिसत्व, मोहन राणा, हेमन्त कुकुरेती. प्रमोद कौसवाल आदि थे। लंबे और कई दशकों के बाद अनामिका, गगन गिल, तेजी ग्रोवर और कई कवयित्रियो ने भी हिन्दी के इस दौर की कविता में अलग तरह से स्त्री स्वर के साथ साहसिक हस्तक्षेप किया और पूर्णता प्रदान की।
नवें दशक के कवियों के सामने समय बिलकुल खुला हुआ था। इनमें भी कुछ का संगठ्न के प्रति आग्रह पहले के कवियों की तरह था और वे उसी तरह किसी न किसी के छाते में चल रहे थे और कुछ बाहर रहकर एक औपचारिक संवाद बनाए रखकर चल रहे थे। उन्हें सब कुछ सही सही पता था। चौकी पर विचार है और चौके मे अवसर वाद। उन्हें पता कि आठवे दशक के कवियों की पीठ पर बन्दूक रख कर निशाना साधा गया है और रूप वाद कह कर आलोचना क्यों हो रही है। इसलिए उसके सामने यह साफ़ था कि उसे क्या नहीं करना है।
कविता यहां आकर पूरी तरह बदली और अपनी जड़ों की ओर मुड़ी। मदन कश्यप ने नक्सल वादी कविता की उस खांटी भूमि को पकड़ा जो जीवन के संघर्ष की भूमि थी जिसे हिन्दी कविता ने अपनी हड़बड़ी में छोड़ दिया था तो लीलाधर पहली बार सुदूर अंदमान को कविता में लेकर आए। एकान्त श्रीवास्तव गांव को लेकर आए। बद्री नारायण ने लोक धुनो को पकड़ा और एक नया स्वरूप दिया । कात्यायनी और अनामिका ने औरतो के सवाल को मुखर रूप में उठाया। यहां शब्दों मे सहज अर्थो में संवेदनशील जीवन धर्मी कविताऒ की शुरूआत हुई।
अपने पहले संकलन की तैयारी के क्रम में मैं गोरखपुर गया था और परमानंद श्रीवास्तव के यहां रूका था । रात भर इस मुद्दे पर हमारी बात चलती रही थी और मेरे कहने पर उन्होंने मेरी किताब 'अकेला घर हुसैन का' पर वही लिखा था जो उस दौर की प्रवृतियां थी' (वागर्थ के जनवरी अंक मे प्रकाशित).
मित्रो, नवें दशक के सशक्त प्रगतिशील जनवादी कवि शैलेन्द्र चौहान का नाम इन दलाल कवि – आलोचकों द्वारा जानबूझ कर नहीं लिया जाता। शैलेन्द्र का पहला ही कविता संग्रह 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए' काफी सशक्त रहा। यह सन 1983 में परिमल प्रकाशन इलाहबाद से प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि शैलेन्द्र चौहान अपने समय के सर्वाधिक चेतना सम्पन्न और जन-प्रतिबद्ध कवि हैं।
चूंकि शैलेन्द्र स्वनामधन्य आलोचकों के ताबेदार नहीं हो पाए इसलिए वे आलोचक और उनके दम हिलाने वाले कवि प्रगतिशीलता की सूची में अग्रणी रहे। जिन कवियों की फेहरिस्त निलय उपाध्याय ने दी है उनमें अधिकतर अपने व्यक्तिगत जीवन में घोर सामंतवादी और पतित हैं फिर भी प्रगतिशील हैं। यह हिंदी कविता का दुर्भाग्य है। घोर अवसरवादी ही बड़े प्रगतिशील हो गए हैं।
बे-ईमानी और स्वार्थपरकता की इससे बड़ी मिसाल हिंदी साहित्य से इतर दुर्लभ ही है। भारतीय अपराधिक राजनीति को भी इन छद्म प्रगतिशीलों ने पीछे छोड़ दिया है। बेशर्मी इतनी कि हर शाम शराबियों की मंडली गलबहियां डाले मदमस्त हो परकीय प्रेम के गुण गाती पाई जाती है। यह इनकी प्रगतिशीलता है। वागर्थ का यह घटिया अंक इन्ही कमजोरियों को गौरवान्वित करता है। इसके सुनामधन्य संपादक को अपनी जिंदगी बनानी है इसलिए आप देखेंगे कि वहां कांग्रेसी किस्म का क्षुद्र सर्वसमावेश हमेशा ही रहता है ताकि लोग एकांत श्रीवास्तव की वाहवाही करते रहें।
अर्जुन प्रसाद सिंह






