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इमानदार पत्रकारों की अनकही पीड़ा के लिए सशक्त मंच बना भड़ास

किसी कवि की ये पंक्तियां  भारतीय पत्रकारिता में भड़ास की भूमिका और उसकी सार्थकता पर सटीक बैठती है कि 'बड़ा महीन है ये अखबार का मुलाजिम भी, खुद में खबर है,मगर दूसरों की छापता है।' भड़ास के चार साल पूरे होन पर यशवंत जी सहित सभी भड़ासियों को बधाई। ‘भड़ास' यानि क्षोभ, आक्रोश और पत्रकारिता के चाल, चरित्र और चेहरे से पर्दा उठाने का नाम. मीडिया जगत के अन्दर क्या घट रहा है? इसकी जानकारी का कोई मजबूत जरिया पत्रकार बिरादरी के पास नहीं था। यह काम यशवंत जी ने भड़ास के माध्यम से किया जो अपने में एक क्रांतिकारी काम है।

किसी कवि की ये पंक्तियां  भारतीय पत्रकारिता में भड़ास की भूमिका और उसकी सार्थकता पर सटीक बैठती है कि 'बड़ा महीन है ये अखबार का मुलाजिम भी, खुद में खबर है,मगर दूसरों की छापता है।' भड़ास के चार साल पूरे होन पर यशवंत जी सहित सभी भड़ासियों को बधाई। ‘भड़ास' यानि क्षोभ, आक्रोश और पत्रकारिता के चाल, चरित्र और चेहरे से पर्दा उठाने का नाम. मीडिया जगत के अन्दर क्या घट रहा है? इसकी जानकारी का कोई मजबूत जरिया पत्रकार बिरादरी के पास नहीं था। यह काम यशवंत जी ने भड़ास के माध्यम से किया जो अपने में एक क्रांतिकारी काम है।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला भारतीय मीडिया खुद अपने प्रबंधन के अलोकतांत्रिक विरोधाभास में फसा कशमशा रहा था। मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के साथ होने वाली होनी और अनहोनी दीपक तले अंधेरे वाली बात की तरह थी। जिन लोगों को पत्रकारिता के सरोकार और उसके दायित्व निर्वहन की वेदना अंदर ही अंदर सालती रहती थी, उनके लिए भड़ास एक सहयोगी मित्र के रूप में आया। अखबारों और न्यूज चैनलों में संपादक के रूप में लाइजनर बने बैठे खबरों के ठेकेदार अपने निजी हितों के आलोक में खबर के औचित्य और सरोकार को कथा व्यासों की तरह व्याख्यित करने की हठधर्मिता का परिचय देते थे। एक सच्चे पत्रकार के लिए यह सब बड़ा ही पीड़ादायी होता। भड़ास उस सरोकार से जुड़ी पीड़ा की अभिव्यक्ति का एक सशक्त मंच बन कर उभरा। यही भड़ास की स्थापना का अपना मकसद रहा है और वो पूरी तरह सुफल है। पत्रकारिता के सरोकार का यह मिशन यू ही चलता रहे यही कामना करता हूं।

विवेक दत्त मथुरिया

पत्रकार और लेखक

tag- b4m 4 year

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