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इसका ये मतलब नहीं कि ‘तहलका’ को भी दंडित किया जाए

Mukesh Kumar :  तरूण तेजपाल को उनके किए की कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए मगर इसका ये मतलब नहीं कि तहलका को भी दंडित किया जाए। तहलका ने चालू पत्रकारिता से हटकर कुछ अच्छा काम किया है और उसे सराहा और सँजोया जाना चाहिए। उनके द्वारा किए और करवाए गए स्टिंग ऑपरेशन ने गुजरात के उन सचों को उजागर किया है जो अन्यथा दबे ही रह जाते। हाँ प्रतिशोध एवं हिंसा से सने मोदी समर्थकों को वह सब खलता था और अब वे इस अवसर का लाभ हिसाब बराबर करने में लगे हैं जो कि स्वाभाविक भी है। लेकिन जो लोग अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकते हैं उन्हें उनके या परिस्थितियों के दबाव में नहीं आना चाहिए और जहाँ भी जो भी थोड़ी अच्छी चीज़ें बची हैं उन्हें बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अँग्रेज़ी की कहावत है कि बॉथ टब के गंदे पानी के साथ बच्चे को नहीं फेंका जाता।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar :  तरूण तेजपाल को उनके किए की कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए मगर इसका ये मतलब नहीं कि तहलका को भी दंडित किया जाए। तहलका ने चालू पत्रकारिता से हटकर कुछ अच्छा काम किया है और उसे सराहा और सँजोया जाना चाहिए। उनके द्वारा किए और करवाए गए स्टिंग ऑपरेशन ने गुजरात के उन सचों को उजागर किया है जो अन्यथा दबे ही रह जाते। हाँ प्रतिशोध एवं हिंसा से सने मोदी समर्थकों को वह सब खलता था और अब वे इस अवसर का लाभ हिसाब बराबर करने में लगे हैं जो कि स्वाभाविक भी है। लेकिन जो लोग अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकते हैं उन्हें उनके या परिस्थितियों के दबाव में नहीं आना चाहिए और जहाँ भी जो भी थोड़ी अच्छी चीज़ें बची हैं उन्हें बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अँग्रेज़ी की कहावत है कि बॉथ टब के गंदे पानी के साथ बच्चे को नहीं फेंका जाता।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

Nadim S. Akhter : तरुण तेजपाल ने जो किया, इसकी सजा उन्हें कानून जरूर देगा लेकिन इस बहाने तहलका पर हमला कितना जायज है? जो लोग टीवी की स्क्रीन पर अनवरत कवरेज करके ये बता रहे हैं कि तहलका ने फलां खबर रोकी, वे पहले अपने दामन में झांक लें जहां रोजाना ना जाने कितनी खबरें रोकी जाती हैं, दबाई जाती हैं. एक बार फिर कहता हूं कि पहला पत्थर वो मारे, जो पानी ना हो. बाकी कबीर दास की उल्टी वाणी, बरसे कंबल, भीगे पानी.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

Vineet Kumar : हाँ हम tehelka के संपादक के रवये के सख्त खिलाफ है जैसा की कल भी थे. जो आरोप है उसपर तो कोर्ट कचहरी का फैसला जब आयेगा तब आयेगा लेकिन जो उसके बाद किया उसके, इसे किसी भी तरह से एथिक ली सही नहीं करार दिया जा सकता. आज से शुरू हुई मेरी दिहाड़ी व्यस्तता को चुप्पी या समर्थन समझा जाये इसके पहले साथ में ये भी जोड़ना ज़रूरी है कि मै तहलका पर लिखी अपनी सारी बातों के साथ खड़ा हूँ. इस घटना को मेनस्ट्रीम मीडिया के मनोहर कहानियां बनाये जाने को लेकर कल भी आपत्ति थी,आगे भी रहेगी. पत्रिका के कुछ नाम अब इस से अलग हो गये लेकिन जिनका जिक्र किया था उनका होना अब भी बेहद ज़रूरी है और उन पर हमें नाज़ है. तहलका की जितनी ज़रूरत कल थी,आगे भी रहेगी और नहीं रहेगी तो इनके विकल्प अपने आप निकल आयेंगें जिसमे संभव है कि उनमे से कुछ यही लोग और नाम शा मिल हो.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Nadim S. Akhter : भइया, तेजपाल के जेल जाने से ना देश के मुसलमानों को कोई खतरा है और ना ही तहलका मैगजीन को. डर सिर्फ इस बात का है कि तेजपाल के बहाने 'वे लोग' तहलका वाली पत्रकारिता को निपटाने के चक्कर में हैं. अगर इनमें इतना ही दम था, तो वो सब क्यों नहीं कर दिया, पत्रकारों और संसाधनों की लंबी-चौड़ी फौज लेकर, जो कम संसाधनों में अकेले तहलका ने कर दिखाया. 'ये लोग' चाहते हैं कि किसी तरह तहलका की साख कम कर दी जाए. इस पर बट्टा लगा दिया जाए. इन्हें डरा दिया जाए. तहलका के खबर रोकने के 'खुलासे' पर जो लोग बोल रहे हैं, खोजा जाएगा तो ना जाने कितने मामले निकलेंगे कि किनके कहने पर उन्होंने कब और क्या-क्या किया. सो जब खुद के घर शीशे के हैं तो तहलका पर पत्थर मत मारिए भाई. स्टिंग कभी भी और किसी का भी हो सकता है…'आप लोगों' का भी.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

Abdul Noor Shibli : बलात्कारी और हत्यारे नेताओं के आगे पीछे घूमने वाले चमचे तरुण तेजपाल का पुतला जला रहे हैं।

पत्रकार अब्दुल नूर शिबली के फेसबुक वॉल से.

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