डॉक्टर मनोज कुमार आईपीएस। यह नाम है गाजीपुर के पुलिस कप्तान का, जिसने बीते दिनों एक निर्दोष युवक को जीवन भर के लिए अपराध की दुनिया में धकेलने के लिए अपने स्तर से सारा इंतजाम कर दिया। शातिर पुलिसवालों की फाइल पर बिना देखे ही दस्तखत करके एक बेगुनाह युवक और उसके परिवारवालों के पूरे भविष्य के कत्ल का अहकाम जारी कर दिया। कहने की जरूरत नहीं कि मनोज कुमार ने उस युवक पर गैंगेस्टर एक्ट तामील करते समय यह तक देखने की जहमत नहीं उठायी कि उस युवक का अपराध क्या था।
गाजीपुर में पिछले पंचायत चुनाव के दौरान एक झड़प हुई। नंदगंज के बनगांवा में पुलिस यह मामला थाम नहीं पायी और गोली चल गयी। नतीजा, एक व्यक्ति मारा गया। मुकदमा मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें दूसरों के साथ रवि कांत सिंह का भी नाम जुड़ गया। हादसे को सम्भाल पाने में अक्षम रही नंदगंज पुलिस ने आव देखा न ताव, अक्षमता का अपना कलंक धोने के लिए लाठियां उठायीं और आतंक मचाते हुए बनगांवा गांव में हुल्लड़ मचाते हुए रविकांत सिंह के घर की सारी महिलाओं को थाने पर खींच ले गयी।
इस हादसे के बाद मैं गया था बनगांवा। घटना का विस्तृत ब्योरा मुझे गांववालों ने ही दिया। पुलिस का तर्क था कि चूंकि रविकांत सिंह का नाम इस मुकदमे में है और वह घर से गायब है, इसलिए उस पर दबाव बनाने के लिए इन महिलाओं को थाने पर लाया गया है। जब तक रविशंकर हाजिर नहीं हो, महिलाएं थाने पर ही रहेंगी। हैरत की बात तो यह रही कि इस सारे कर्मकांड में कानून ताक पर रखते हुए महिला पुलिसकर्मियों तक की जरूरत नहीं समझी गयी। बाद में जब अगले दिन रविकांत ने सरेंडर किया तभी इन महिलाओं को थाने से रिहा किया गया। लेकिन अभियुक्त तक पहुंचने का तरीका तो ठीक वैसा ही था, जैसे कोई जन्मना अपराधी या डाकू किसी पैसे वाले का अपहरण कर लें और कहें कि जब तक फिरौती नहीं मिलती, पकड़ को छोड़ा नहीं जाएगा। इतना ही नहीं, इस घटना के कुछ ही दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसला भी दिया था कि अभियुक्त की तलाश करना पुलिस का काम है, न कि अभियुक्त के परिजनों का। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस फैसले में यह व्यवस्था दी थी कि किसी अभियुक्त की खोज के नाम पर उसके घरवालों को प्रताडित नहीं किया जा सकता है। लेकिन जनता के प्रति खुद के जिम्मेदार संगठन होने का दावा करने वाली पुलिस का का नंगा सच रविकांत सिंह के प्रकरण से सामने आ गया।
हालांकि बाद में रविकांत सिंह हाजिर हुआ और अब अदालत से जमानत पर है। इस युवक के नाम यह पहला मुकदमा था। लेकिन मनोज कुमार ने उसे गिरोहबंदी करने वाला अपराधी करार दे दिया है। इस पूरे प्रकरण पर यह सवाल तो पूरी शिद्दत के साथ जवाब चाहता है कि आखिरकार गिरोहबंदी की श्रेणी में कौन है। गाजीपुर की पुलिस या रविकांत सिंह। हुई तो थी जांच इस मामले की कि आखिर रविकांत सिंह के परिवार की महिलाओं को थाने पर क्यों रात भर बिठाये रखा गया। लेकिन क्या कोई बतायेगा कि उस जांच का क्या हुआ। किसे दोषी पाया गया और किस पर क्या कार्रवाई हुई।
हालांकि मनोज कुमार यह मानते हैं कि गिरोहबंद तामीली में शामिल किये गये दूसरे लोग तो शातिर हैं, लेकिन रविकांत सिंह के बारे में वे अभी और तथ्य जुटायेंगे। तो सवाल यह है कि पूरे तथ्यों को देखे बिना ही रविकांत सिंह पर गिरोहबंद कानून क्यों तामील कर लिया गया। मनोज अभी तथ्यों का परीक्षण करेंगे लेकिन जरा सोचिये कि परीक्षण के दौरान तो रविकांत सिंह को गिरोहबंद अपराधी तो बना ही दिया गया। शातिर अपराधी होने का पोस्टर तो उस पर चिपका ही दिया गया। और अगर बाद में रविकांत सिंह को मनोज कुमार निर्दोष पाते हैं तो फिर क्या अपने शातिर अमले को दंडित कर पायेंगे जिसकी करतूतों के चलते एक युवक संगठित अपराध की ओर धकेल दिया गया।
बेहतर होता, अगर इस प्रकरण पर वे गलती और अपराध के बीच का फर्क समझने की कोशिश करते। मैं नहीं कहता कि रविकांत सिंह निर्दोष हैं, लेकिन यह भी नहीं कहता हूं कि वह दोषी है। यह फैसला तो अदालत को करना होगा। लेकिन गलती और अपराध के बीच का विभेदीकरण तो हम कर ही सकते हैं। वजह यह कि यह सवाल एक बड़े सामाजिक मसले की अहमियत रखता है। दरअसल, यह और कुछ नहीं, हत्या है एक युवक के निजी व सामाजिक जीवन की।
लेकिन तर्कों की भाषा उसे कैसे समझ में आ सकती है जो खुद को एक खतरनाक वायरस साबित करने पर तुला हो। सवाल रविकांत सिंह पर गिरोहबंद कानून तामील करने का नहीं है। असल सवाल और मूल चिंता का विषय तो किसी निर्दोष युवक के भविष्य पर संगठित अपराध करने का सरकारी तमगा लगाने के तौर-तरीके पर है जो उसपर आजीवन गैंगेस्टर होने का ठप्पा चस्पा किये रहेगा। जलालत तो उसके घरवाले भी झेलेंगे।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, हिंदुस्तान समेत कई अखबारों में विभिन्न पदों पर विभिन्न शहरों में काम कर चुके हैं. महुआ न्यूज के यूपी ब्यूरो चीफ रह चुके हैं. इन दिनों के नए लांच होने जा रहे न्यूज चैनल यूपी न्यूज के ब्यूरो चीफ हैं.





