इप्टा के बेहतरीन अभिनेता मतीन अहमद पान का ठेला चलाते हैं और गायक मनोज गुप्ता के आशियाने से केवल 50 मीटर की दूरी पर रहते हैं। छोटे कस्बे में थियेटर हॉल के अभाव में नाटकों की रिहर्सल मनोज के आशियाने के ऊपर वाली मंजिल पर एक कमरे में हुआ करती थी जो किरायेदार की प्रतीक्षा में खाली था। इसके खाली रहने का एक बड़ा कारण यह था कि संभावित किरायेदार पूछताछ करते हुए पहले मतीन अहमद से टकराता था ओर मतीन उसे किसी बहाने से टरका देते थे ताकि नाटकों की रिहर्सल में कोई बाधा खड़ी न हो।
कुछ जूनियर कलाकारों ने इस कमरे में भूत-प्रेत होने की अफवाह फैलाने की योजना भी बना रखी थी। इस वाकये में कितनी सचाई है यह या तो मतीन को पता है या इसे मनोज बेहतर जानते हैं, पर यह बात सौ फीसदी सच है कि मतीन मनोज के घर के दरवाजे पर लगे सीसी टीवी की तरह हैं जिनकी निगाहों से बचकर कोई अंदर नहीं जा सकता। वे बेहद अंदरूनी खबर भी रखते हैं और कभी-कभी उसे ‘ब्रेक’ भी कर देते हैं। मसलन जब मनोज पतली दस्त की शिकायत के कारण रिहर्सल में नहीं पहुंचे तो मतीन भाई ने बताया कि उन्हें गरज के साथ छींटे पड़ने की शिकायत हो रही है।
फिलवक्त मैं मतीन का नहीं मनोज का जिक्र करना चाहता हूं जो कमाल के गायक हैं और उन्हें आप एक बार ‘लाइव’ सुन लें तो आप शर्तिया उनके मुरीद हो जायेंगे। शैलेन्द्र शैली मध्यप्रदेश में माकपा के महासचिव थे और उन्हें हमने एक व्याख्यान के लिये अपने कस्बे में बुलाया था। शाम को शरद जोशी के क्लासिक नाटक ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खां’ का मंचन था। शैलेन्द्र शैली ने नाटक से पहले मनोज के जनगीतों को सुना तो अवाक -से रह गये। लौटकर एक लंबी चिट्ठी लिखी और नाटक से ज्यादा मनोज के गानों की तारीफ की। कहा कि ‘काश, इन इंकलाबी गीतों के साथ सुर में सुर मिलाने वाले मजदूरों के आंदोलन भी साथ-साथ खड़े हो जायें।’ मनोज के गीतों के साथ आंदोलनों की इस जुगलबंदी की कामरेड शैली ने लंबी प्रतीक्षा नहीं की और कोई एकाध बरस के भीतर ही आत्महत्या कर ली।
पिछली दफे मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के प्रथम निदेशक संजय उपाध्याय यहां आये। हैरानी जाहिर की कि एक छोटे-से कस्बे में नाटकों को लेकर इस तरह से काम किया जा रहा है। उनके शिष्य और खैरागढ़ में इंदिरा कला व संगीत विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग के व्याख्याता योंगेद्र चौबे ने सार्वजनिक तौर पर गुरूजी के चरण स्पर्श किये । योगेन्द्र चौबे ने अपने नाटक ‘‘पाखंडी बाबा’’ का प्रदर्शन भी किया। प्रदर्शन के बाद योगेन्द्र ने गुरूजी की सेवा में दवा-दारू के इंतजाम के लिये कहा और यह इशारा भी किया कि दवा की मात्रा कम हो, बल्कि बिल्कुल न हो। सो दवा-दारू के इस गैर आनुपातिक मिश्रण के सेवन के बाद गुरूजी मूड में आ गये और पूरे समय मनोज भाई के गानों की तारीफ करते रहे। उनके साथ मस्ती में ‘‘साधो गगन घटा गहरानी’’ भी गाया। मुझसे कहा कि आपकी टीम का सांगीतिक पक्ष बेहद मजबूत है और कभी इस पर वर्कशाप करना चाहें तो मैं सहर्ष प्रस्तुत रहूंगा। अगली सुबह जब वे शाम के बेमेल मिश्रण के प्रभाव से मुक्त हो गये थे, मनोज के गानों की खुमारी बाकी थी। चलते-चलते उनकी डायरी में उनकी ढेर सारी प्रशंसा दर्ज की।
मनोज गुप्ता नाम का यह शख्स जो सर्वहारा के गीत गाता है, दिखने में भी सर्वहारा है। आप उनसे ईर्ष्या कर सकते हैं कि खूब तेल-मिर्च-मसालों के साथ चटखारेदार भोजन करने वाला यह शख्स इतना दुबला-पतला कैसे है? उनके ‘जीरो फिगर’ पर करीना कपूर भी ईर्ष्या कर सकती है और वे गुजराती के व्यंग्यकार विनोद भट्ट के उस कैरेक्टर की तरह हैं जो तेज हवाओं में महज अपनी कलम के कारण उड़ने से बच जाता है और घनघोर बारिश में भी दो बूंदों के बीच में आ जाने के कारण बगैर छतरी के भीगने से बच जाता है। लेकिन यही शख्स जब इंकलाबी जनगीत गाता है तो उसमें इतना ‘फोर्स’ होता है कि वह बड़े से बड़े पूंजीपति के सारे सरमाये को तिनके की तरह बहाकर ले जाये। ‘‘ऑकूपाई वॉल स्ट्रीट’’ वालों के मंसूबे महज इसलिये कामयाब नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि उनके पास एक अदद मनोज गुप्ता नामक शख्स नहीं है।
किसान -मजदूर आंदोलनों को उकसाने वाले जनगीतों के गायन की परंपरा हिंदी पट्टी में काफी कम है। कुछ जो जनगीत गाते भी हैं तो ऐसा लगता है कि है कि सुगम संगीत गा रहे हैं। कुछ के गाने इतने सुगम होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि वे जगाने वाले जनगीत है या सुलाने वाली लोरियां हैं। इसके बरअक्स मनोज के गानों की कंपोजिशन ठीक गीतों के भाव व मूड के अनुरूप होती है और मजे की बात यह कि उन्हें किसी भी गाने की कंपोजिशन में दस मिनट से जयादा का वक्त नहीं लगता। असीमित संभावनाओं से भरपूर इस बेमिसाल सिंगर-कंपोजर की सबसे बड़ी खामी यह है कि इस कमबख्त गायक की कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं है और वह सड़कों में होने वाले नुक्कड़ नाटकों में गाकर ही अत्यंत प्रसन्न व परम संतुष्ट रहता है और जिसे फिल्मों में जाने का ख़याल तक नहीं आता।
‘अंधेर नगरी’ में जब वह साधू, ‘मुर्गीवाला’ में दारोगा और ‘विरोध’ में विरोधी बनता है तो कमाल का अभिनय भी करता है और कहता है कि ‘‘अरे भैया, हम विरोधी हैं -जन्मजात विरोधी! मैंने तो पैदा होने का भी विरोध किया था- मुझे ऑपरेशन करके बाहर निकाला गया।’’ अपना यह विरोध उन्होंने तब भी दर्ज किया जब वे पश्चिम बंगाल के जलपाई गुड़ी में ज्योति बसु की सभा में जनगीत गाने वाले थे। सुरक्षा वालों ने मंच में जाने से पहले मेटल डिटेक्टर से मनोज के हारमोनियम की जांच की। मनोज ने कहा कि ‘हारमोनियम सुरों को बिखेरने के लिये होता है, बम की किरचे बिखेरने के लिये नहीं।’
इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिये सुप्रसिद्ध संगीतकार कुलदीप सिंह भी भिलाई आये थे। उनकी प्रसिद्धि "साथ-साथ" फिल्म से है जिसमें उन्होंने जगजीत सिंह साहब के लिये कंपोजिशन की थी। अंकुश फिल्म का गाना "इतनी शक्ति हमें देना देता" भी खासा पापुलर है व उन्हें हाल ही में थियेटर संगीत के लिये संगीत नाटक अकादमी का सम्मान भी मिला है। संयोग से कुलदीप सिंह से ठीक पहले मनोज को गाने का अवसर मिल गया। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल ‘ हो गयी है पीर पर्वत-सी’ की प्रस्तुति, जिसकी कंपोजिशन मनोज भाई ने सूफियाना कलाम की तर्ज पर की है, हबीब तनवीर रंगमंच से की गयी तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया।
लेकिन असल प्रशंसा मिली कुलदीप सिंह से, जिन्होंने कहा कि "आपने हमारा प्रोग्राम चौपट कर दिया।" हमें लगा कि थियेटर आर्टिस्ट होने के नाते वे महज हमारी हौसला अफज़ाई कर रहे हैं, मगर वे संजीदा थे। उन्होंने तफसील में जाते हुए कहा कि "दरअसल दुष्यंत ने इमरजेंसी के जिस दौर में यह ग़ज़ल कही थी ठीक उसी दौर में कैफी साहब ने "लाई फिर इक लरजिशे-मस्ताना तेरे शहर में" कही थी। दोनों ग़ज़लों के मूड को देखते हुए मैंने इनकी कंपोजिशन एक ही धुन में तैयार की थी व अपनी टीम से इन्हें ही गवाने वाला था। लेकिन आप लोगों ने जिस तरह से इस ग़ज़ल को गाया है, अब इसे पेश करने की मुझे हिम्मत नहीं हो रही है।" इस बात पर कुलदीप सचमुच संजीदा थे और अगले दिन जब दूसरे मंच से उन्होंने अपनी यही प्रस्तुति दी तो बाकायदा इस बात को दोहराया कि कल क्यों वे इसे नहीं गा सके? उन्होंने गांवों-कस्बों में थियेटर कर रही छोटी मंडलियों के साथ संगीत पर कुछ काम करने की ख्वाहिश भी जाहिर की। खुदा करे कि उनकी यह ख्वाहिश जल्द पूरी हो।
मेरी दिली इच्छा है कि आपको जब कभी मौका मिले मनोज को लाइव जरूर सुनें। फिलहाल तो मैं उनकी आवाज में दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल सुना रहा हूं। मैंने जब अपनी पोस्ट ‘‘मुझे दुष्यंत कुमार ने बिगाड़ा’’ भड़ास पर डाली थी तो आपसे वायदा किया था कि इस ग़ज़ल को एक दिन मनोज की आवाज में जरूर सुनाऊंगा। आज यह वायदा मैं बोनस के साथ पूरा कर रहा हूं।
ये रहे गीत, आडियो प्लेयर के प्ले पर क्लिक करें… वाल्यूम फुल कर लें…पहला गीत है- हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए… दूसरा वाला है- हाथ कुदाली रे….
लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्टा, डोगरगढ़ के अध्यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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