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इस दौर में खामोश नहीं रहते प्रभाष जोशी

आज प्रभाष जोशी का ७५ वां जन्मदिन है लेकिन फर्क यह है कि उनके न रहने के बावजूद उनका जन्मदिन है। इसलिए भी यह महत्वपूर्ण है क्योंकि वे बेजोड़ परंपरा छोड़ गए हैं। यह बेजोड़ परंपरा है साहसिक और लोकोन्मुखी पत्रकारिता की। यह दोनों ही बात आज की पत्रकारिता में नजर नहीं आती है। आज की पत्रकारिता में तमाम तरह का समर्पण दिखता है जो एक ओर कारपोरेट घरानों, निगमों और सरकारों के प्रति है। दूसरी ओर लोकोन्‍मुखता के नाम पर बाजार के प्रति समर्पण। सवाल यह है कि अगर आज वे होते तो उनकी भूमिका में क्या क्या होता जो हिंदी समाज के ज्यादातर बड़े हिस्से को जागरूक बनाते हुए उसमे प्रतिरोध, आलोचनात्मक निगाह और सवाल उठाने की क्षमता का विकास करता।

आज प्रभाष जोशी का ७५ वां जन्मदिन है लेकिन फर्क यह है कि उनके न रहने के बावजूद उनका जन्मदिन है। इसलिए भी यह महत्वपूर्ण है क्योंकि वे बेजोड़ परंपरा छोड़ गए हैं। यह बेजोड़ परंपरा है साहसिक और लोकोन्मुखी पत्रकारिता की। यह दोनों ही बात आज की पत्रकारिता में नजर नहीं आती है। आज की पत्रकारिता में तमाम तरह का समर्पण दिखता है जो एक ओर कारपोरेट घरानों, निगमों और सरकारों के प्रति है। दूसरी ओर लोकोन्‍मुखता के नाम पर बाजार के प्रति समर्पण। सवाल यह है कि अगर आज वे होते तो उनकी भूमिका में क्या क्या होता जो हिंदी समाज के ज्यादातर बड़े हिस्से को जागरूक बनाते हुए उसमे प्रतिरोध, आलोचनात्मक निगाह और सवाल उठाने की क्षमता का विकास करता।

आज ये बातें उनका नाम याद आने पर याद आती हैं। दूसरी बात जो है वह यह कि उनकी पत्रकारिता अलग तरह की थी। उनका यह दौर जनसत्ता के शुरुआती चौदह सालों के अंकों को उलट कर देखने पर ज्यादा समझा जा सकता है। यह वह दौर था जब प्रभाष जोशी ने संपादक की भूमिका निभाई थी। यह अलग तरह की पत्रकारिता थी, जिसमें सामाजिक घटनाओं से लगाव, भाषा, भाषा वर्तनी, भाषा लिपि और फांट आदि शामिल था। तब आठ कालम में प्रचलित अख़बारों की बजाय छह कालम का ले आउट, ख़बरों का चयन, लेखन की विविधिता भी झलकती थी। जीवन का कोई भी क्षेत्र अखबार के दायरे से ना छूटे और तमाम तरह की ख़बरें ली जाए इस पर भी जोर दिया गया।

जनसत्ता अलग तरह का अखबार था जिसमें विविधिता थी। जहाँ गीत कभी नहीं छपे हालाँकि हम पर गीत छापने का दबाव हमेशा रहा। गीतकार कवि प्रभाष जोशी से शिकायत करते तो उन्हें समझाने का प्रयास किया जाता और बाद में 'संपादक जी' (वे मुझे संपादक जी कहते थे) के पास उन्हें भेज दिया जाता। उन्होंने कभी मेरे काम में हस्तक्षेप नहीं किया। उनका लेखन, संगीत, राजनीति, लोकजीवन और सामाजिक राग विराग के बारे में रहा। वे और उनके मित्र संपादक राजेंद्र माथुर, दोनों का लेखन, समझ, अध्ययन और संपर्क न केवल हिंदी बल्कि लोक भाषा मालवी से लेकर अंग्रेजी तक में व्यापक लेखन से दिखता है। आज के संपादक में कितने हैं जो ऐसे लोगों से संपर्क रखते हुए अपने लेखन और अध्ययन को पैना रख पाए। प्रभाष जी जीवन जीते थे। चाहे क्रिकेट हो या संगीत हर कही उनमें बड़े पारखी तरीके से विषय को प्रस्तुत करने की माहिती थी। मेरा उनका रिश्ता कुमार गन्धर्व के कारण बना था। जनसत्ता पहला अखबार था जो पहले दिन से ऐसा दिखा कि इस अखबार में सबका सबकुछ छपेगा। यह दृष्टि अब दुर्लभ है।

मै रविवारीय जनसत्ता में था तो वहाँ गंभीर रचनाओं को भी पढ़ता। ऎसी कहानियां, संगीत, सिनेमा और यात्रा वृतांत जैसी सारगर्भित सामग्री छपी जिसपर आरोप लगाया गया कि यह बहुत गंभीर है। वहाँ काम करते हुए यह सब इतना सहज हो गया था कि हम ज्यादा बेहतर तरीके से सामग्री का चयन करते और प्रकाशित करते क्योंकि कोई दबाव नहीं था। जब भी संगीतकर्मी, रंगकर्मी, लेखक साहित्यकार यहाँ तक कि विज्ञान और राजनीति से जुड़े़ लोग भी जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव पर मसलन साठ साल या पिचहत्तर साल के होते तो उनपर जनसत्ता अलग पहल लेता। ऐसे लोगों के निधन पर पहले पेज पर खबर होती। उस ज़माने वेब आधारित लेखन सुलभ नहीं था। हम सब इस तरह की सूचना पाते ही रातदिन एककर सारी सामग्री तैयार करते। हमने रघुवीर सहाय, नामवर सिंह, त्रिलोचन, नागार्जुन से लेकर विष्णु चिंचालकर आदि पर एक एक पेज की सामग्री छापी। भारत भवन पर भी छापा गया। यह सामग्री आज भी याद की जाती है।

आज समाज और भी संकट के दौर में है ऐसे में पत्रकार, संपादक और लेखक प्रभाष जोशी की कमी खलती है। मैं प्रायः सोचता हूँ कि आज अपने ही देश में आदिवासियों के इलाके में जो हिंसा हो रही है उसपर प्रभाष जी का क्या रवैया होता। आज जबकि ज्यादातर अखबार पिछले कई सालों से वहाँ आपरेशन ग्रीन हंट के चलते वहाँ की ख़बरें नहीं देते हैं ऐसे में प्रभाष जोशी कि क्या प्रतिक्रिया होती। निश्चित ही वे लोकोन्मुखी रहते हुए आदिवासियों के पक्ष में सक्रिय होते और पूरे देश की चिंता करते हुए जनमानस को खंगालने का काम करते। बस इतना ही।

लेखक मंगलेश डबराल रविवारीय जनसत्ता के संपादक रह चुके है और प्रभाष जोशी की टीम के स्तंभ भी। उनका यह लेख जनादेश से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है।

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