एक न्यूज चैनल के संपादक महोदय को सिर्फ स्टिंग चाहिए. बाकी कोई खबर नहीं. उन्होंने अपने स्टाफ से कह दिया है कि जाओ और स्टिंग ले आओ. बिजनेसमैन्स का स्टिंग, नेताओं का स्टिंग, बिल्डरों का स्टिंग, नौकरशाहों का स्टिंग, धनी आदमियों का स्टिंग… केवल स्टिंग करो. इस स्टिंगबाजी के लिए चैनल की तरफ से ढेर सारे खुफिया यंत्र खरीदवाए गए हैं. कैमरे वाला चश्मा पहनकर लड़कियां स्टिंग करने निकल चुकी हैं. कैमरा वाला कलम लेकर रिपोर्टर स्टिंग करने निकल चुके हैं. कैमरे वाला टीशर्ट पहनकर ब्यूरो वाले स्टिंग करने निकल चुके हैं.
आफ द रिकार्ड बातचीत करते हैं लेकिन उस दौरान भी इनका कैमरा चलता रहता है. समझदार लोग तो आजकल टीवी वाले पत्रकारों से मिलते ही नहीं. जाने कौन किस वेश में आए और सब कुछ रिकार्ड कर ले जाए फिर सरेबाजार इज्जत नीलाम कर दे या नीलामी से पहले स्टिंग का मूल्य लगाने लगे. इस न्यूज चैनल के लोग इन दिनों खूब परेशान हैं. इनका कहना है कि नए संपादक जी ने ऐसा फरमान सुना दिया है कि अब तय करना मुश्किल हो रहा है कि पत्रकारिता करें या खेती करें. वजह इसलिए कि जहां जाओ वहां लोग एलर्ट रहते हैं और शक की नजर से देखते हैं कि कहीं ये स्टिंग तो नहीं कर रहा. ऐसे में कोई भी किसी भी मसले आफ द रिकार्ड बात नहीं करता. यह भी कहा जा रहा है कि नए नए आए संपादक महोदय ने मालिक को कह दिया है कि इस स्टिंग के जरिए वे करोड़ों रुपये मार्केट से उगाहकर दे देंगे. इस घटनाक्रम पर एक बिहारी पत्रकार टिप्पणी करते हैं: ''साला, पत्रकारिता न हुई रुपये पेरने की फैक्ट्री हो गई…''
(कानाफूसी)






