Dilip C Mandal : पिंक, ट्यूलिप और ओरेंज क्रांतियां यूरोप में भी हुई थी और अरब देशों में भी और फिलिपींस से लेकर पेरू तक में भी. किसने कराई ये क्रांतियां और फिर क्या हुआ, ये असहज सवाल हैं. आप तो हैप्पी हैं, है्प्पी रहिए. काश कि दुनिया में हर किसी को आप की मासूमियत और भोलापन नसीब हो.
काश कि हम भी यह मान सकें कि फोर्ड फाउंडेशन और आवाज और तमाम औद्योगिक घरानों द्वारा पोषित और रॉकफेलर फाउंडेशन (मैगसायसाय पुरस्कार के फंडदाता) द्वारा प्रशंसित यह एनजीओ 'क्रांति' देश की बहुसंख्यक जनता को खुशहाली की दिशा में ले जाएगीं. वैसे भी इस समय दुनिया भर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कथित सबसे बड़ी लड़ाई वर्ल्ड बैंक और उसके पोषित एनजीओ लड़ रहे हैं.
काश कि हम भी मान पाते कि इसका संचालक विचार यूथ फॉर इक्वेलिटी का फासीवाद नहीं, समानता और बंधुत्व की आदर्श परिकल्पना है. आप नए प्रशंसक है, हम पुराने आलोचक हैं. लोकपाल का हमारा विरोध प्रारंभ से अपनी निरंतरता में कायम है. लोकपाल हमारे लिए हमेशा लोकतंत्र के मुकाबले खड़ी प्लूटोक्रेसी है. घनघोर अभिजनवाद है. देश के राजनीतिक वर्ग ने अपने नकारेपन की वजह से इस 'क्रांति' के लिए स्पेस बना दिया है.
यह चीज देश में सूई की तरह घुसी है, तलवार बनकर निकलेगी. वैसे भी यह षड्यंत्र युग है और संदेह युगधर्म है. आप हैप्पी होने का धर्म निभाएं, हम संदेह करने का धर्म निभा रहे हैं.
इंडिया टुडे हिंदी के संपादक दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.





