इस साल होली आने वाली हर होली के ढेर सारे रंग छीन ले गई और अब यह 27 दिसम्बर- आलोक के नहीं होने के बाद का पहला 27 दिसम्बर! कड़ाके की ठण्ड में ठिठुरन से ज्यादा सिहरन-सी महसूस हो रही है. ज्ञानी तो समझा गए कि यह दुनिया ही आनी-जानी है. पर समझ स्वीकार करना तो सिखा सकती है, दर्द कहाँ कम करती है!
1983 के पहले भी दिल्ली आता जाता रहा पर एक भौंचक पर्यटक की तरह. इस शहर में खूंटा गाड़ने की जिद जगी तब जब मैंने इसे आलोक की नजरों से देखा. 1983 कि शुरुआत में मैं भोपाल छोड़कर कोलकाता पढ़ाई करने चला गया था. उसी साल के आखिर में दिल्ली आया, आलोक के बुलाने पर. आलोक भी ग्वालियर से दिल्ली आ चुका था और जनसत्ता में उसकी नौकरी लग गई थी. याद आता है, मुझे वो लाल किला और क़ुतुब मीनार भी यूँ दिखाने ले गया जैसे कोई बड़ा बच्चे को घुमाने से ज्यादा इतिहास भूगोल समझाने की जतन कर रहा हो. इसके बाद के 8 साल में कई दफा आया. खूब तफरीह रहती. हम साथ-साथ रहते. आलोक हर बार कहता, पत्रकारिता फिर शुरू करो..दिल्ली आ जाओ. मैं हर बार महीने दो महीने में कमर कस कर आने का भरोसा दिलाता और जाने के बाद अपनी दुनिया में मस्त हो जाता. पत्रकारिता से मेरा और कोई सरोकार नहीं रह गया था सिवाय इसके कि मैं जब-तब रविवार के दफ्तर स्वर्गीय सुरेन्द्र प्रताप सिंहजी और विजय कुमार मिश्राजी के पास गप्पे हांकने पहुंच जाया करता था. इन्हीं दोनों के कहने पर 'रविवार' के लिए दो-चार स्टोरी करने के अलावा पत्रकारिता के नाम पर कहीं कुछ लिख-पढ़ भी नहीं रहा था. आलोक को मेरी इस लापरवाही पर बड़ा गुस्सा आता.
दरअसल हमारी दोस्ती की शुरुआत 1980 में तब की प्रतिष्ठित पत्रिका 'रविवार' में मेरा एक लेख छप जाने के बाद हुई थी. मैं भोपाल में पढ़ता था और आलोक ग्वालियर में पत्रकारिता करने लगा था. हमारी खतो-किताबत शुरू हुई और फिर 1981 में ग्वालियर में हमारी मुलाकात हुई. इसलिए आलोक के लिए मैं मूलतः एक पत्रकार था जो पिता के पैसे उड़ाने के लिए चार्टड एकाउंटेंट बनने की बेवकूफाना कवायद कर रहा था. आलोक सही था.
कई वर्षों का अंतराल रहा और फिर सन 90 में मैं दिल्ली आया — पहली बार पत्रकारिता करने का इरादा लेकर. आलोक की शादी हो चुकी थी इस लिए इस दफा मैं रुका अपने एक सम्बन्धी के यहां. यह एक तकल्लुफ था जिस से हम दोनों का ही मतलब थोड़ा कम रहा. हुआ यह कि मैं जनसत्ता उस से मिलने पहुंचा और शाम को वो मुझे साथ अपने बाबा खड़ग सिंह मार्ग वाले घर लाद ले गया, जहां वो अभी सुप्रियाजी के साथ अपनी गृहस्थी ज़मा ही रहा था. खैर इसके बाद तो शहर में तब अपने इस इकलौते दोस्त की बेतकल्लुफी मेरे लिए हर तरह का संबल थी.
खैर, उन दिनों मैं भूमि सुधार पर पढ़ रहा था. आलोक ने कहा इसी पर लिख दो. कोई 4 साल बाद मैंने फिर कलम उठाई और उसी रात एक लम्बा चौड़ा लेख लिख दिया. सुबह सुप्रियाजी को उनके दफ्तर छोड़ते हुए जब हम जनसत्ता पहुंचे तो आलोक मुझे मय उस लेख के कौल साहेब (श्री जवाहर लाल कौल) के पास ले गया. कौल साहेब ने लेख रख लिया. कोई दो घंटे बाद ही कौल साहेब का बुलावा आया. बोले, बढि़या है और इसे हम अग्र लेख के तौर पर ले रहे हैं. पर हमारे यहां अग्र लेख तीन किस्तों में छापे जाने की परम्परा नहीं है इसलिए इसे थोड़ा छोटा कर दीजिये कि दो किस्तों में छप जाये. बालासुंदरम गिरी जी की टेबल पर बैठकर मैंने लेख छोटा किया और जैसा मुझे याद है कि 3 और 4 अगस्त को वो छप भी गया. प्रभाषजी का बुलावा आया. उन्होंने तारीफ की. साथ लाए पैसे मैं उड़ा चुका था. मैंने झट से उनसे निवेदन किया कि इसका पारिश्रमिक नकद ही दिला दिया जाए. उन्होंने एक आवेदन लिखवाया और उसपर आदेश कर दिया. दो महीने हो चुके थे और कोलकाता की गलियां बहुत याद आने लगी थी. सो, मैंने पैसे लिए और उसी शाम ट्रेन पकड़कर वापस कोलकाता भाग गया. वहां से फोन किया तो आलोक ने बस इतना ही कहा -"तुम ठीक नहीं कर रहे."
उसके और कुछ अपनों के ऐसे टहोकों ने आखिर असर दिखाया और मैं अगले साल जनसत्ता कि नौकरी में आ लगा, बाकायदा टेस्ट देकर. पर उसके लिए भी जनसत्ता के कोलकाता एडिशन का टेस्ट होने की ख़बर अलोक ने ही बड़ी जिम्मेदारी के साथ मुझे वक़्त रहते भिजवाई. लेकिन टेस्ट देने और रिजल्ट आने के दरम्यान की कहानी भी लम्बी है. अलोक को शक था कि मैं कोलकाता गया तो फिर समय से शायद ही लौटू. आखिर तय हुआ कि यहीं रुका जाये. मैं व्यासजी (तब जनसत्ता के एडिटर, न्यूज़ श्री हरिशंकर व्यास) से मिला. उन्हें कहा कि टेस्ट रिजल्ट आने तक मुझे यहाँ काम करने दिया जाये क्योंकि 5 सबसे अच्छी कापियों में मेरी एक होनी चाहिए (तुरंत काम चाहिए था इसलिए ये दावा ठोंक दिया.. बाद में ईश्वर ने भी मानो पत रख ली– सफल उम्मीदवारों की जो सूची आई उसमें ऊपर मेरा नाम था). व्यासजी मुस्कुराये और कहा, "क्राइम करो" यानी अपराध की रिपोर्टिंग करो. फिर तो मैंने पूरी ताक़त से अपने को झोंका और उसके बाद फ्रंट पेज पर मैंने बराबर अपनी मौजूदगी बनाये रखी.
आलोक का व्यवहार शास्त्र शायद किसी अज्ञात लिपि में लिखा गया था. किसी तरंग में आए तो आपके लिए कोई जोखिम उठा ले और जब दूसरी वाली में हो तो फोन भी ना उठाए. मुझे याद है कि एक दफा जनसत्ता के दफ्तर में एक वरिष्ठ साथी ( जिनसे मेरे रिश्ते आज भी बहुत गहरे हैं) ने मेरे लिए कुछ कह दिया. जो कहा वो अमर्यादित तो था पर स्टाफ रिपोर्टर की हैसियत वाले साथी के लिए ऐसे जुमले उछालना कइयों की अदा होती है. खैर, आलोक अपनी जगह से उठा और उन पर बरस पड़ा– " अगर ये आदमी पत्रकारिता छोड़ कर नहीं गया होता तो आज आप इसके आगे-पीछे डोल रहे होते. और ये भी जान लीजिए की भाषा को लेकर मुझे आप 'किरानी' छाप पत्रकारों से कोई चुनौती महसूस नहीं हुई. अगर कभी किसी से हुई तो वो है मेरा छोटा भाई अनुराग तोमर और ये कुमार संजॉय सिंह."
मेरे आजतक और एनडीटीवी के दिनों में मेरे किसी पीटीसी को सुन कर उसका फोन आया–"यही वो बात है कि मैं तुम्हें अपना बड़ा भाई कहता हूं" और फिर ये भी होता कि मैं बगल के एस्कार्टस हास्पीटल में पड़ा हूं या उसके पहले मेरी पत्नी का ब्रेन ट्यूमर जैसा बड़ा ऑपरेशन हो रहा है, प्रभाषजी स्वयं घंटों अस्पताल में बैठे हो, तमाम करीबी और मामूली करीबी भी आ जा रहे हो, मगर आपको आलोक कभी न दिखे. शायद सुप्रियाजी ठीक ही कहती थी, "वो किसी अपने को तकलीफ में नहीं देख पाते."
जिन प्रभाषजी की थपकियों ने संवारा और इस शहर में अपने सबसे पुराने जिस दोस्त की झिड़कियों ने एक फक्कड़ को सदगृहस्थ बनाने को ललकारा, उन दोनों के चले जाने के बाद मन बहुत बुझा-बुझा सा है. कब
मेरा रास्ता बौनी सोच और साजिशों ने नहीं काटा कि अबके उनके सूत्रधारों के विषदन्त ना झाड़ दूं मगर लगता है, इस से अब तक क्या हुआ और आगे क्या हो जायेगा. इस लिए राम बहादुर राय और उन जैसे कई बहुत अपनों के होते हुए और कहते हुए भी कलम उठाने कि तबीयत पिछले दो साल में नहीं हुई. आज आपने छेड़ दिया तो जाने क्या-क्या बोल गया हूं वैसे ही जैसे कब्रिस्तान के सन्नाटे में किसी समाधि लेख के पत्थर पर टिक कर कोई अपनी यादों के समंदर में कुछ शफ्फाक मोती तलाश रहा हो.
कुमार संजॉय सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता, आजतक, इंडिया टुडे, एनडीटीवी जैसे संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर भी रहे. यह लेख उनसे बातचीत पर आधारित है.






