Om Thanvi : तारीफ करूंगा तो फिर कहेंगे आप तो हो गए 'आप' के! यारो, पैंसठ साल में किसी मुख्यमंत्री की हिम्मत हुई इस तरह बड़ी पूंजी और राजनेताओं के गठजोड़ पर हाथ डालने की? नेताओं में भी बस एक गुरुदास गुप्ता हैं जो इस घोटाले को उठाते आए हैं, उच्चतम अदालत तक गए। कभी-कभार कुछ आवाज दक्षिण से सुनाई दी।
पिछले साल 'आउटलुक' में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक गैस की कीमतों में बढ़े हर-एक डालर के पीछे 450 करोड़ रुपए मुकेश अंबानी की तिजोरी में जाते हैं। गैस ठहरी देश की प्राकृतिक सम्पदा। निकालने का काम अम्बानी का। पूरे कुएं खोदेंगे तो गैस की किल्लत क्यों होगी। किल्लत पैदा करते हैं और सरकार से मिलकर देश से देश की गैस के ऊँचे दाम वसूलते हैं।
पेट्रोलियम मंत्री के नाते मणिशंकर अय्यर और फिर जयपाल रेड्डी की छुट्टी का 'रहस्य' अब कोई भी समझ सकता है। राडिया टेप में रंजन भट्टाचार्य की जुबानी अंबानी का कथन मौजूद है कि अब तो (यूपीए) सरकार अपनी "दुकान" है! मुरली देवड़ा (देखिए, कैसे अंबानी का आदमी सीधे पेट्रोलियम मंत्री हो जाता है) और भोले-से दीखते वीरप्पा मोइली ने अब चुनावी वर्ष में अंबानी की कितनी खातिर की है।
गैस की कीमत में दुगुनी बढ़ोतरी की चपत गैस पर निर्भर ऊर्जा और उर्वरक क्षेत्र पर तो रंग दिखाएगी ही, ईंधन भी महंगा होगा। उर्वरक महंगे होने का मतलब होगा अनाज का महंगा होना। यानी सीधी मार आम उपभोक्ता जन पर है। इसीलिए साहस के लिए मैं फिर केजरीवाल की पीठ थपथपाता हूं। अगर इसमें राजनीति है तो कहना होगा राजनीति हमेशा बुरी चीज नहीं होती।
जनसत्ता अखबार के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.






