Rajen Todariya : भगवान राम ने रावण पर हमले के लिए समुद्र में बनने वाले पुल का ठेका तब के इंजीनियर नल नील को दिया था। वो सतयुग की बात थी और तब तक कमीशन का रिवाज नहीं शुरू हुआ था। इसलिए पुल ठीक-ठाक बन गया। आज की बात होती तो भगवान राम के लिए बनाए जाने वाले इस अरबों रुपये के पुल से मुख्यमंत्री से लेकर पीडब्लूडी मंत्री तक सब कमीशन खाते। उप्र निर्माण निगम होता तो भगवान राम की सेना के भार से ही पुल टूट जाता।
शुक्र है कि सतयुग में न निर्माण निगम था और न पीडब्लूडी। हमारे नेताओं को कमीशन कितना प्रिय है कि इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भाजपा ने चुनाव में विज्ञापन का जो बजट तय किया था उसमें भी भाई लोग न्यूज चैनलों और अखबार वालों से कमीशन खा गए। भाजपा के ही लोग बता रहे हैं कि प्रचार का काम देख रही नल-नील की जोड़ी ने कमीशन में लाखों बटोर लिए। लेकिन पार्टी के प्रचार में भी कमीशन वसूलने की अकेली योग्यता मात्र भाजपा में ही नहीं है बल्कि कांग्रेस भी कम नहीं है।
कांग्रेस के एक राष्ट्रीय नेता की कातिल कृपादृष्टि से निहाल एक भद्र महिला नेत्री ने भी प्रचार के बजट की इस कामधेनु को दुहने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कातिल नजर वाले इस नेता रणनीति की नहीं बल्कि उसकी रातें कांग्रेस के भीतर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। बताया तो यह भी जाता है कि कांग्रेस के लिए जो घटिया विज्ञापन कैंपेन डिजायन किया गया था वह भी कमीशनखोरी का ही नतीजा है। कहा जा रहा है कि एआईसीसी के प्रतापी नेताओं ने दिल्ली में ही भारी कमीशन खाकर विज्ञापन कैंपेन को मूर्खतापूर्ण प्रचार अभियान में बदल डाला। जिन दलों के नेता अपनी ही पार्टियों के काम में कमीशन खा रहे हों वे विकास कार्यों में कितना कमीशन खायेंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है।
उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजन टोडरिया के फेसबुक वॉल से.






