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उत्तराखंड

उत्तराखंड में ‘मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री’ खेल से सरकार को गंभीर खतरा

उत्तराखण्ड की कांग्रेस सरकार में शह मात का खेल जारी है। 'मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री' खेलने को कांग्रेस के सभी धड़े तैयार हैं। इसके लिए कांग्रेसी नेता लगातार दिल्ली दरबार तक दौड़ लगा रहे हैं। अधिकारिक सूत्रों की माने तो वर्तमान सीएम विजय बहुगुणा के प्रयासों के बावजूद उनके सिर पर विकास का सेहरा सजता नहीं दिखता। ऐसा नही है कि मुख्यमंत्री विकास कामों को तरजीह नहीं दे रहे हैं अथवा विकास कार्यों से मुह मोड़ रहे हैं, पर जून की जल प्रलय ने इनके सारे किये कराए पर पानी फेर दिया। अब तक विकास की लहर जो दौड़नी चाहिए थी वह नहीं दौड़ी। जिसके कारण स्थिति गंभीर हो रही है। विकास के कामों को न कर पाना और विकास को प्रचारित प्रसारित न कर पाना इस सरकार की प्रमुख नाकामयाबी है।

उत्तराखण्ड की कांग्रेस सरकार में शह मात का खेल जारी है। 'मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री' खेलने को कांग्रेस के सभी धड़े तैयार हैं। इसके लिए कांग्रेसी नेता लगातार दिल्ली दरबार तक दौड़ लगा रहे हैं। अधिकारिक सूत्रों की माने तो वर्तमान सीएम विजय बहुगुणा के प्रयासों के बावजूद उनके सिर पर विकास का सेहरा सजता नहीं दिखता। ऐसा नही है कि मुख्यमंत्री विकास कामों को तरजीह नहीं दे रहे हैं अथवा विकास कार्यों से मुह मोड़ रहे हैं, पर जून की जल प्रलय ने इनके सारे किये कराए पर पानी फेर दिया। अब तक विकास की लहर जो दौड़नी चाहिए थी वह नहीं दौड़ी। जिसके कारण स्थिति गंभीर हो रही है। विकास के कामों को न कर पाना और विकास को प्रचारित प्रसारित न कर पाना इस सरकार की प्रमुख नाकामयाबी है।

पिछले दिनों हल्द्वानी में सरकार द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना 2013 के लिए एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में सीएम समेत सभी वरिष्ठ नेताओं को पहुंचना था पर ऐसा नही हो पाया। कई प्रमुख और प्रभावकारी नेता इस गोष्ठी में नहीं पहुंचे। इसके पीछे लोगों को नाराजगी मानी जा रही है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के कुछ नेता मुख्यमंत्री के कार्य व व्यवहार से संतुष्ट नहीं हैं जो उनके अभियान को भी सफल नहीं होने देना चाहते। इसमें हर गुट के नेता शामिल हैं जो चाहते हैं कि मुख्यमंत्री की योजनायें सफल हों पर उसमें उनको भी पूरा महत्व मिले।

इस आयोजन में क्षेत्रीय सांसद केसी सिंह बाबा भी नहीं आये। श्री बाबा की छवि दबंग और प्रभावकारी नेताओं में से है। कई विधायक भी इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। हाँ सह प्रभारी संजय कपूर जरूर गोष्ठी में उपस्थित थे जिन्होंने पहले से ही वर्तमान मुख्यमंत्री के कार्यकाल के बारे में आलाकामान को विरोधी रिपोर्ट दे रखी है। इसके साथ ही साथ इस कार्य्रक्रम में प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी भी नहीं पहुंचीं। साथ ही साथ अल्मोड़ा सासंद प्रदीप टम्टा भी गोष्ठी से नदारद रहे। कई विधायकों ने भी कार्यशाला में पहुंचने की जहमत नहीं उठाई। राहुल और सोनिया के स्वप्निल परियोजना में इन दिग्गजों का न पहुंचना यह कहने को काफी है कि कहीं ना कहीं प्रदेश नेतृत्व को लेकर सबकुछ ठीकठाक नहीं है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो उत्तराखण्ड सरकार और संगठन से प्रभारी अंबिका सोनी संतुष्ट नहीं हैं। इसके पीछे आपदा समेत कई प्रमुख मुद्दों पर सरकार का विफल होना है।

आपदा प्रबंधन में जिस लचर नीति का परिचय यहां की सरकार और संगठन ने दिया उससे पूरे देश में कांग्रेस की छीछालेदर हुई। जिसका आभास आलाकमान को भी है और पार्टी प्रभारी को भी है। वैसे भी पार्टी में जिस तरह सिर फुटव्वल हो रही है मुख्यमंत्री बहुगुणा, प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, कैबिनेट मंत्री हरीश रावत के बीच जिस तरह से वाक यूद्ध चल रहा है। कभी यह लोग एक दूसरे की तारीफ करते हैं तो कभी ये लोग दो बैलों की जोड़ी त्रिशूल अथवा हल का फाल बन जाते हैं। कौन दो बैलों की जोड़ी कौन हल का फाल है कौन त्रिशूल है। इसका निर्णय जनता करेगी पर इस वाक युद्ध से भी जनता में भला संदेश नहीं गया है।

अभी हाल में ही डा. हरक सिंह रावत के यहां हुई पार्टी में कुँवर प्रणव सिंह चैंपियन द्वारा कथित रूप से चलाई गई गोली पर भले ही घायलों ने मुँह सी लिये है पर विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल की बेबाक राय से कुंवर प्रणव सिंह चैपिंयन को जमानत करानी ही पड़ गई। संसदीय कार्य मंत्री डा. इंदिरा ह्दयेश पहले गोली चलाने की स्वीकार पर बाद में मुकर गई। अब चैंपियन ने इसे पटाखेबाजी बताया। एक के बाद एक घटनाक्रमों से आलाकमान भी चिंतित हुआ है। गोलीबारी की घटना से पूर्व हरक सिंह रावत के पीआरओ युद्धवीर सिंह रावत हत्याकांड में मंत्री निवास का उपयोग तथा वहां से आरोपी का पकड़ा जाना भी सरकार तथा शासन दोनों को असहज करने वाला रहा है। ठीक यहीं स्थिति गन्ना किसानों के बकाया भगुतान में रही। जहां दोनों गुटों में लगातार तलवारें खिचीं रही।

एक के बाद एक ऐसे घटनाक्रम हुए जिससे सरकार की इमेज पर प्रभाव पड़ा है। फिलहाल दोनों दलों के नेता मुख्यमंत्री बचाने या सीएम बनाने के लिए लगातार दिल्ली दरबार की दौड़ लगा रहे हैं। जिससे स्थिति गंभीर बनी हुई है कब कहां क्या हो जाए इस पर कोई भी टिप्पणी करने बच रहा है। वैसे तो सरकार से जुड़े लोगों ने साफ कह दिया है कि ये अफवाहें है इनमें कोई दम नहीं है पर नौकरशाही इन अफवाहों पर ही सही काम में मन नहीं लगा रही है जिसके कारण सारी योजनाएं प्रभावकारी नहीं हो रही है। इन व्यवस्थाओं को देखा जाए तथा विधायकों की दिल्ली दरबार दौड़ को देखा जाए तो लगता है कि सत्ता, संगठन और नौकरशाही एक दूसरे के पूरक नही हैं। जिसके कारण सरकार की स्थिरता पर लगातार प्रश्नचिन्ह् लग रहा है। भेड़िया आया भेड़िया आया की तर्ज पर मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री खेल रहे कांग्रेस के नेताओं के अंदरूनी झगड़े के कारण विकास कार्य तो प्रभावित हो ही रहा है इससे सरकार की स्थिरता को भी खतरा है।

उत्तराखंड से वरिष्ठ पत्रकार राम प्रताप मिश्र की रिपोर्ट.  सम्पर्क: 09412413304

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