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उत्तराखंड में सहारा समय और नेटवर्क टेन का दबदबा बढ़ा, ईटीवी पिछड़ा

हाल के दिनों में उत्तराखंड की पत्रकारिता में कुछ सकारात्मक बदलाव के लक्षण नजर आ रहे हैं। ईटीवी का दबदबा अब खत्म हो रहा हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सहारा समय ने ईटीवी को काफी पीछे छोड़ दिया है। अब सहारा समय पर यदि कोई खबर आती है तो उसकी चर्चा अक्सर कभी फोन तो कभी आपसी बातचीत में आ जाती है। दरअसल ईटीवी की साख उसी समय खत्म होनी शुरु हो गई थी जब रमेश पोखरियाल निशंक राज्य के मुख्यमंत्री थे।

हाल के दिनों में उत्तराखंड की पत्रकारिता में कुछ सकारात्मक बदलाव के लक्षण नजर आ रहे हैं। ईटीवी का दबदबा अब खत्म हो रहा हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सहारा समय ने ईटीवी को काफी पीछे छोड़ दिया है। अब सहारा समय पर यदि कोई खबर आती है तो उसकी चर्चा अक्सर कभी फोन तो कभी आपसी बातचीत में आ जाती है। दरअसल ईटीवी की साख उसी समय खत्म होनी शुरु हो गई थी जब रमेश पोखरियाल निशंक राज्य के मुख्यमंत्री थे।

कहा जाता है कि ईटीवी के चैनल हेड ने तब दोनों हाथों से पैसा बटोरा। उस डेढ़ साल की अवधि में ईटीवी की साख रसातल में पहुंच गईं। खासतौर पर तब जब जनरल खंडूड़ी के मुख्यमंत्री बनने पर इस चैनल ने एक फर्जी, मानहानिकारक और घटिया सीडी अपने चैनल पर बार-बार दिखाई। इस हरकत ने साबित कर दिया कि निशंक के मुख्यमंत्री न रहने की खबर ने इस चैनल को कितना बौखला दिया। यह पत्रकारिता के इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना थी। इस चैनल ने हद दर्जे के घटियापन पर उतर कर जनरल खंडूड़ी पर झूठे आरोप ही नहीं लगाए बल्कि बेशर्मी के साथ उन्हें दो दिन तक दोहराया भी। मुझे याद है कि उस समय इस पूरे वाकये पर आम लोगों में इतना गुस्सा था कि वे ईटीवी के पत्रकारों पर हमला भी कर सकते थे। एक चैनल अपने झूठ के जरिये अपने संवाददाताओं की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है, इसका अहसास मुझे पहली बार हुआ। उन बेहद नाजुक क्षणों में मैंने ईटीवी के कुछ पत्रकार साथियों को आगाह भी किया कि वे अनावश्यक बहसों से बचें। लेकिन इससे यह भी जाहिर हो गया है कि झूठी खबरें कभी भी किसी भी समुदाय को उत्तेजित कर सकती हैं और इसका शिकार निश्चित तौर पर वे पत्रकार होंगे जो सर्वाधिक असुरक्षित माहौल में काम कर रहे हैं।

चुनावों के दौरान और उसके बाद ईटीवी ने जिस तरह से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ मानहानि जनक आरोपों का अभियान चलाया उससे यह साफ लगता था कि ईटीवी की मुख्यमंत्री के दूसरे दावेदार के साथ डील हो चुकी है। अन्यथा बिना किसी सबूत और बाइट के ही ईटीवी दो दिन तक इंडिया बुल्स कंपनी पर यह आरोप लगाता रहा कि उसने 500 करोड़ रुपये में विजय बहुगुणा के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी खरीदी। पत्रकारिता के लटके-झटकों की जानकारी रखने वाले लोगों का मानना है कि यह अभियान दरअसल विजय बहुगुणा को अपने चैनल के दबाव में लाने का दांव था। यह दांव कामयाब भी रहा। ईटीवी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि वह देश का ऐसा पहला न्यूज चैनल है, जिसे खबर चलाने के लिए बाइट की जरुरत नहीं पड़तीं, वह बाजारु अफवाहों को भी खबर के रुप में पेश करने का हुनर रखता है।

गजब तो यह है कि ईटीवी ने रंग बदलने में एक बार फिर गिरगिट को मात देते हुए विजय बहुगुणा की चरण वंदना करने के पुराने सारे रिकार्ड धो डाले हैं। ईटीवी के जरिये ही राज्य की जनता यह दुर्लभ जानकारी प्राप्त कर पाई कि राज्य के मुख्यमंत्री रात को क्या खाते हैं और दिन में क्या? वह भोजन के साथ कितने चम्मच दही लेते हैं, इस महत्वपूर्ण जानकारी को भी ईटीवी ने ही राज्य के लोगों तक पहुंचाया। सदा की तरह इस बार भी ईटीवी मुख्यमंत्री के आगे नतमस्तक है। ऐसा एक भी वाकया हमें याद नहीं जब ईटीवी मुख्यमंत्री के दरबार की चारण मंडली में न रहा हो। उसके द्वारा पिछले तीन मुख्यमंत्रियों की जो आरतियां उतरी गई हैं वे सत्ताधारियों को आत्ममुग्ध करने में तो कामयाब रही हैं, लेकिन जनता ने चारण चैनलों के प्रचार को उसकी औकात बता दी।

ईटीवी की साख खत्म होने से पहला स्थान खाली है। अब सहारा समय इस पर कब्जा करने की ओर अग्रसर है। इस बीच नेटवर्क टेन ने भी तेजी से अपनी पहचान बनाई है। नेटवर्क टेन को सर्वाधिक लाभ यह है कि उसके पास कुछ बेहतरीन पत्रकारों की टीम है तो उसके पास संपादक के नाम पर एक जाना-माना चेहरा भी है। राज्य के जनमत को प्रभावित करने वाले बुद्धिजीवी वर्ग में यह चैनल सर्वाधिक लोकप्रिय है। नेटवर्क टेन जिस तेजी से लोकप्रिय हो रहा है उससे ईटीवी तीसरे स्थान पर पिछड़ सकता है। यदि नेटवर्क टेन के संचालकों ने मेहनत की तो यह चैनल राज्य के मुद्दों को प्रभावित करने और आंदोलन तैयार करने की स्थिति में पहुंच सकता है। पहाड़ के कई कस्बों में इस चैनल की खबरों की इंतजार करने वाले दर्शकों की तादाद जिस तरह से बढ़ रही है, उससे लगता है कि ईटीवी के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। ईटीवी का संकट अब इसलिए भी बढ़ गया है कि उसके पास स्थानीय समाज की नब्ज पहचानने वाले संवाददाता ही नहीं हैं। ठेठ पहाड़ में भी उसके पास स्थानीय संवादादाता नहीं हैं। लखनऊ से आयात किए जा रहे संवाददाताओं की यह पूरी फौज दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहारी स्टाइल की पत्रकारिता में दीक्षित है जो कि राज्य के पहाड़ी मिजाज से मेल भी नहीं खाती और उसे उत्तराखंड का भूगोल तक नहीं मालूम। इसलिए यह पूरी टीम अब एक बड़ी विफलता की ओर अग्रसर है।

लेखक राजन टोडरिया उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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