हमारे राजनैतिक नेतृत्व और नौकरशाहो में लोकहित के कार्यों के प्रति इच्छाशक्ति की कमी तथा नैतिकता के लोप का ही परिणाम है, प्रदेश में स्थापित महिला एवं बाल विकास विभाग में उत्पन्न अनेक विसंगतियां। मसलन प्रदेश के लगभग तीस जिलों में तैनात प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी जो मूलतः बाल विकास परियोजना अधिकारी हैं। इनके द्वारा करोड़ों रूपये का आहरण-वितरण का कार्य किया जा रहा है जबकि वह भी यह जानते हैं कि उन्हें आहरण-वितरण का अधिकार प्राप्त ही नहीं है।
बताते चलें कि वित्त विभाग के शासनादेश के अनुसार अराजपत्रित अधिकारी जिनका वेतनमान 6500-10500 के नीचे हो तो इस वर्ग के अधिकारी को आहरण-वितरण का अधिकार नहीं दिया जा सकता। फिर प्रदेश के यह बाल विकास परियोजना अधिकारी तो 5000-8000 के ही वेतनमान वर्ग में हैं जो अराजपत्रित अधिकारी वर्ग की श्रेणी में हैं। अतः अराजपत्रित अधिकारी को आहरण-वितरण का अधिकार किसी भी दशा में देय नहीं है। यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या इन पर कोई निगरानी तंत्र नहीं है? यदि है तो वह क्या कर रहा है? आज तक इन प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारियों को अनाधिकार आहरण-वितरण करने से रोका क्यों नहीं गया? क्या निगरानी तंत्र किसी बड़ी विभागीय घटना की प्रतीक्षा कर रहा है जैसा कि आम तौर पर होता है।
दूसरी ओर भारतीय लोक प्रशासन से स्वच्छ, पारदर्शी, बेहतरीन प्राशासनिक एवं प्रबन्धकीय सेवाओं की अपेक्षा की जाती है, इनसे बेहतर निगरानी तथा समन्वय की भी आशा रहती है। खासकर उन मामलों में जिन सार्वजनिक नीतियों से नागरिक प्रभावित होते हैं फिर यह इस प्रकरण पर मूकदर्शक क्यों हैं? कारण कि यही आई0ए0एस0 कलेक्टर, निदेशक, सचिव और मुख्य सचिव निगरानीकर्ता के रूप में तैनात हैं तो क्या यह निगरानीकर्ता प्रदेश के जिलों के प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारियों के इस अनैतिक क्रिया-कलापों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। यदि हां तो क्या इस प्रकार के चूकों के लिए इन्हें दण्डित किये जाने का प्राविधान नहीं होना चाहिए। क्या दुर्गा नागपाल को आधे घण्टे में ही निलम्बित करने वाली सरकार इतने बड़े अनैतिकता पर मूकदर्शक बनी रहेगी जिसका मूल कर्तव्य ही है कि वह साफ एवं सक्षम लोक प्रशासन प्रदान करें।
गाजीपुर से शिवेंद्र पाठक की रिपोर्ट. संपर्क 09415290771 या [email protected]






