उत्तराखंड को अलग राज्य बने साढ़े बारह बरस हो चुके हैं। पर इस राज्य के कर्णधार आज दिन तक राज्य स्थापना की अवधारणा के अनुरूप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाए हैं। यहाँ के नेताओं और सत्ता की दावेदार सियासी पार्टियों के पास उत्तराखंड के विकास एवं नियोजन को लेकर सुस्पष्ट सोच एवं रणनीति का घोर अभाव है। राज्य बनाने के बाद किसी भी सियासी पार्टी, भले ही वह भाजपा हो या कांग्रेस, की सरकारों ने राज्य स्थापना की अवधारणा के अनुरूप उत्तराखंड के दीर्घकालिक पक्ष में एक भी निर्णय नहीं लिया।
फौरी और तात्कालिक निर्णय लिए भी गए, उनमें से ज्यादातर निर्णयों में अदूरदर्शिता तो दिखी। साथ ही इन निर्णयों में उत्तराखंड के बजाय सियासी और व्यक्तिगत हित ज्यादा निहित रहे। नियोजन और नीतिगत मामलों में अस्पष्टता एवं अदूरदर्शिता एवं सियासी और व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड अनेक बुनियादी मामलों में दो कदम आगे सरकने के बजाय पीछे हुआ है। उत्तराखंड में दो पुलिस परिक्षेत्र समाप्त करने का एक जून का निर्णय नियोजन और नीतिगत मामलों में उत्तराखंड के नेताओं की अस्पष्टता एवं अदूरदर्शिता की जिन्दा और ताजा मिसाल हैं।
पिछले ही साल तेईस अप्रैल को प्रदेश सरकार ने आनन – फ़ानन में उत्तराखंड में पहले से ही कार्यरत डीआईजी, गढ़वाल रेंज (पौड़ी) और डीआईजी कुमाऊँ रेंज (नैनीताल) को विभाजित कर देहरादून और पिथौरागढ़ में दो नए पुलिस परिक्षेत्र बना दिए थे। करीब सवा तेरह महीने बाद सरकार दो नए रेंज खतम कर पुरानी स्थिति बहाल कर दी। दिलचस्प बात यह है कि नए पुलिस रेंज सृजित करने और विघटित करने संबंधी दोनों फैसले का आधार पीएचक्यू की रिपोर्ट को बनाया गया।
यहाँ सवाल पुलिस परिक्षेत्रों की तादाद बढ़ाने या घटने का नहीं है। असल सवाल उत्तराखंड के विकास एवं नियोजन को लेकर यहाँ के नेताओं की सोच और नजरिये का है। सवा तेरह महीने पहले सरकार को देहरादून और पिथौरागढ़ में दो नए पुलिस परिक्षेत्रों की जरूरत क्यों महसूस हुई? आज क्यों नहीं? साफ है या तो सरकार का सवा तेरह महीने पहले का निर्णय गलत था या एक जून २०१३ का निर्णय गलत है।
पुलिस परिक्षेत्रों की संख्या घटाने को लेकर इस राज्य के भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार पूर्व मंत्री प्रकाश पन्त का एक अख़बार में बड़ा ही दिलचस्प बयान छपा है। इस बयान के जरिये उत्तराखंड के नेताओं के नजरिये को बखूबी समझा जा सकता है। भाजपा नेता प्रकाश पन्त ने पुलिस परिक्षेत्रों की संख्या घटाने की निंदा करते हुए कहा है कि – "…..छोटे राज्य के साथ यह भी परिकल्पना थी कि छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों से लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी प्रमुख सुविधाएँ अपने ही गाँव में मिल जाएं। पुलिस परिक्षेत्र बढ़ाकर कानून व्यवस्था व सुरक्षा सुनिश्चित करना भी प्रमुख लक्ष्य था, ताकि लोग जहाँ हैं, वहीँ स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हुए अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें….।" यानी विकास का मतलब – पुलिस परिक्षेत्रों की संख्या बढ़ाना। वाह, क्या बात है।
लेखक प्रयाग पाण्डेय उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.