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उत्‍तराधिकार की राजनीति में फंसी हैं सभी पार्टियां, पर प्रियंका के लिए जगह नहीं

श्री लाल शुक्ल के कालजयी उपन्यास राग दरबारी का अंतिम हिस्सा सबको बखूबी याद होगा। उपन्यास के अंत में वैध महाराज की सत्ता पर जब सवाल उठने शुरू हुए या कहें उनके दिन पूरे होने को आए तो उन्होंने किस तरह नाटकीय अंदाज से सत्ता अपने पहलवान बेटे को सौंप दी। अयोग्य शनिचर को अपनी ताकत का इस्तेमाल कर ग्राम प्रधान बनवा दिया। यही भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति है। देखें, बालठाकरे ने पुत्रमोह में योग्य होते हुए भी राज ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। शिवसेना को संभाल रहे हैं उद्भव ठाकरे। नतीजा परिवार और पार्टी विघटन। राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी बना ली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे)। इसका खामियाजा हालांकि दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है। दोनों की ताकत बंट गई। ताकत बंटने पर हानि ही होती है। उधर, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मुखिया बनने के कई योग्य दावेदार हैं लेकिन पार्टी की कमान मिली मुलायम यादव के बेटे अखलेश यादव को। कोई भी परिवार सत्ता विमुख नहीं होना चाहता। बड़े नेता किसी भी कीमत पर पद से या तो खुद चिपके रहते हैं या फिर अपने आत्मीय को वहां सुशोभित कर देते हैं।

श्री लाल शुक्ल के कालजयी उपन्यास राग दरबारी का अंतिम हिस्सा सबको बखूबी याद होगा। उपन्यास के अंत में वैध महाराज की सत्ता पर जब सवाल उठने शुरू हुए या कहें उनके दिन पूरे होने को आए तो उन्होंने किस तरह नाटकीय अंदाज से सत्ता अपने पहलवान बेटे को सौंप दी। अयोग्य शनिचर को अपनी ताकत का इस्तेमाल कर ग्राम प्रधान बनवा दिया। यही भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति है। देखें, बालठाकरे ने पुत्रमोह में योग्य होते हुए भी राज ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। शिवसेना को संभाल रहे हैं उद्भव ठाकरे। नतीजा परिवार और पार्टी विघटन। राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी बना ली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे)। इसका खामियाजा हालांकि दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है। दोनों की ताकत बंट गई। ताकत बंटने पर हानि ही होती है। उधर, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मुखिया बनने के कई योग्य दावेदार हैं लेकिन पार्टी की कमान मिली मुलायम यादव के बेटे अखलेश यादव को। कोई भी परिवार सत्ता विमुख नहीं होना चाहता। बड़े नेता किसी भी कीमत पर पद से या तो खुद चिपके रहते हैं या फिर अपने आत्मीय को वहां सुशोभित कर देते हैं।

कांग्रेस तो जैसे गांधी परिवार की जागीर बन गई है। दुनियाभर के विरोध के बाद भी किसी और को मौका नहीं दिया जा रहा। सोनिया गांधी (एडविग एंतोनिययो अल्बिना मैनो) का विदेशी होने का मुद्दा कितना उछाला गया सभी जानते हैं, नतीजा भी सबके सामने है। कहने को तो सोनिया त्याग की मूर्ति बना दी गई हैं। कहा जाता है कि विरोध के कारण ही उन्होंने प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं किया। सच्चाई क्या है कानून विशेषज्ञ अच्छी तरह जानते हैं। सोनिया को विरोध की इतनी ही परवाह थी तो राजनीति से ही दूर क्यों नहीं हो गई। क्योंकि गांधी परिवार कांग्रेस की हुकुमत नहीं छोडऩा चाहता। राहुल गांधी से अधिक लोकप्रिय हैं प्रियंका वाड्रा लेकिन वे सोनिया की बेटी हैं, बेटा नहीं। भारत में पितृसत्तात्मक समाज है। प्रियंका को कांग्रेस का उत्तराधिकारी बनाने से सत्ता गांधी परिवार के पास नहीं रहेगी। इस बात को सोनिया गांधी अच्छी तरह समझती हैं। तभी तमाम कांग्रेसियों और जनता के आग्रह के बाद भी वे प्रियंका वाड्रा को प्रत्यक्ष राजनीति में लेकर नहीं आतीं। हालांकि चुनाव के वक्त उनकी लोकप्रियता का जमकर उपयोग किया जाता है।

उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान चल रहा है। प्रचार जोरों पर है। प्रियंका वाड्रा कांग्रेस और राहुल गांधी के समर्थन में रायबरेली और अमेठी में जमकर चुनाव प्रचार कर रहीं हैं। उनको देखने और सुनने हजारों की तादात में भीड़ पहुंच रही है। उनकी लोकप्रियता को देखकर उनके पति रॉबर्ट वाड्रा का मन राजनीति में कूदने का होता है। 6 फरवरी को वे प्रियंका के साथ प्रचार करने पहुंचे। यहां उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जनता चाहेगी तो वे भी राजनीति में आने को तैयार हैं। वे चुनाव लडऩा चाहते हैं। जब पत्रकारों ने राबर्ट से सवाल किया कि प्रियंका क्या हमेशा प्रचार ही करती रहेंगी या चुनाव भी लड़ेंगी? जवाब में रॉबर्ट ने कहा कि हर चीज का वक्त होता है। सबकुछ समय आने पर ही होता है। अभी प्रियंका का राजनीति में आने का वक्त नहीं है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अभी राहुल गांधी का वक्त चल रहा है। आगे प्रियंका का भी वक्त आएगा, तब वे राजनीति में आएंगी। रॉबर्ट वाड्रा के इस बयान को आधा दिन भी नहीं बीता था कि प्रियंका को खुद इसका खंडन करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनके पति व्यवसाय में बहुत खुश हैं वे राजनीति में नहीं आएंगे। जरूर पत्रकारों ने कोई आड़ा-टेड़ा सवाल किया होगा तभी उनके मुंह से उक्त बयान निकल गया होगा। लेकिन, सच यह है कि वहां प्रियंका के लिए जनता का उत्साह देखकर रॉबर्ट के मुंह से दिल की बात निकली थी। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि सोनिया गांधी नहीं चाहती कि प्रियंका गांधी राजनीति में आए। इसलिए ही शाम तक प्रियंका को सफाई देनी पड़ गई।

एक यक्ष प्रश्न है। इसके उत्तर की खोज करने पर भी संभवत: स्पष्ट हो जाएगा कि यह सच है कि सोनिया गांधी अपनी बेटी प्रियंका वाड्रा (जो अब गांधी नहीं रही) संसद में कभी प्रवेश नहीं करने देंगी। संसद में प्रवेश कर भी लिया तो कांग्रेस में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। यक्ष प्रश्र यह है कि जब प्रत्येक पार्टी एक-एक सीट जीतने के लिए गुंडा, बदमाश, दागी उम्मीदवारों को भी टिकट बांट रहीं हैं ऐसे में एक साफ-सुथरी छवि और निश्चित विजय प्राप्त करने वाली उम्मीदवार को टिकट क्यों नहीं दिया जाता? उससे महज प्रचार ही क्यों कराया जा रहा है? कुछ लोग कह सकते हैं राजनीति में गंदगी है इसलिए सोनिया गांधी अपनी बेटी को राजनीति से दूर ही रखना चाहती हैं। राजनीति इतनी ही गंदी है तो वह खुद क्यों राजनीति में हैं या अपने बेटे को राजनीति में क्यों आगे बढ़ा रही हैं। कुछ लोग कह सकते हैं प्रियंका को भी राजनीति में लाने से परिवारवाद का आरोप लगेगा। सो तो अभी भी लगता ही है। यह भी कहा जा सकता है कि प्रियंका गांधी ही राजनीति नहीं करना चाहती। भई, प्रचार के लिए जी-जान लगाना भी राजनीति ही है। यह तो गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज वाली बात हो गई। एक जिताऊ प्रत्याशी को टिकट नहीं देना गहरी राजनीति की बात है।

लेखक लोकेंद्र सिंह राजपूत पत्रिका में सब एडिटर हैं.

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