एक आश्चर्यजनक घटना हुई. के पाठक नामक एक सज्जन अचानक टाइम्स ऑफ़ इंडिया, पटना के दफ्तर में पधारे. वे असम ट्रिब्यून अख़बार के अधिकारी थे. अपनी पत्नी की हड्डी रोग के इलाज के लिए पटना के डाक्टर जॉन मुखोपाध्याय के यहाँ आये थे. उनकी चिंता का विषय था कि उनके अख़बार द असम ट्रिब्यून को अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेतन बोर्ड का वेतनमान अपने कर्मियों को देना था पर उनमें से कई कर्मियों को मणीसाना वेतन बोर्ड के मुताबिक पहले से ही इतना वेतन मिल रहा था, जितना मजीठिया आयोग ने अपनी अधिकतम सीमा निर्धारित क़ी है, अतः ऐसे कर्मियों का वेतन कैसे निर्धारित हो.
कांट्रैक्ट जर्नलिस्ट एसएन झा ने यह कहते हुए उन्हें मेरे पास भेज दिया कि आपकी समस्या का समाधान यूनियन की राजनीति करने वाले पत्रकार अरुण कुमार के पास मिलेगा. मैं उनकी चिंता सुनकर चकित रह गया. मैंने कहा कि आप वेतन घटा तो सकते नहीं तो उनको पुराना वेतन कुछ बढ़ा कर दे दीजिये पर्सनल पे बोल कर. वे बहुत खुश हुए यह कहते हुए कि उनका प्रबंधन इस के पक्ष में है. मुझे याद आया कि द टाइम्स आफ इंडिया जैसे बड़े अख़बारों ने तो यह प्रचार अभियान चलाया कि मजीठिया देने से देश के कई अख़बार बंद हो जायेंगे और सुप्रीम कोर्ट तक जाकर इस अभियान को रोकने में लगे हुए हैं कि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को ही खत्म कर दिया जाए. मैंने के पाठक जी से उनके अख़बार में कार्यरत अपने इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन के मित्र गीतार्थ पाठक के बारे में पूछा और उनको विदा किया. क्या बड़े अख़बार मालिकों का दिल छोटा होता है?
अरुण कुमार






