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उन्हें तो मीडिया रूपी आईने पर काफी गुस्सा आने लगा है

लोकसभा के चुनाव में करीब आठ महीने का समय बचा है। ऐसे में, सभी प्रमुख दलों ने चुनावी तैयारियों की जी-तोड़ कोशिशें शुरू कर दी हैं। खास तौर पर भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दल एक-दूसरे के मुकाबले चुनावी राजनीति की बड़ी लकीर खींचने की होड़ में जुट गए हैं। दोनों खेमों में युद्ध स्तर पर रणनीतियां बनाई जा रही हैं। चुनावी रण जीतने के लिए मंत्रणाओं का दौर शुरू हो गया है। कोशिश यही हो रही है कि किसी तरह से विरोधी धड़े की छवि में जितनी कालिख पोती जा सके, वह पोत दी जाए। पलटवार के लिए भी तैयारियां चल रही हैं।

लोकसभा के चुनाव में करीब आठ महीने का समय बचा है। ऐसे में, सभी प्रमुख दलों ने चुनावी तैयारियों की जी-तोड़ कोशिशें शुरू कर दी हैं। खास तौर पर भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दल एक-दूसरे के मुकाबले चुनावी राजनीति की बड़ी लकीर खींचने की होड़ में जुट गए हैं। दोनों खेमों में युद्ध स्तर पर रणनीतियां बनाई जा रही हैं। चुनावी रण जीतने के लिए मंत्रणाओं का दौर शुरू हो गया है। कोशिश यही हो रही है कि किसी तरह से विरोधी धड़े की छवि में जितनी कालिख पोती जा सके, वह पोत दी जाए। पलटवार के लिए भी तैयारियां चल रही हैं।

इन दिनों राजनीतिक सेनापतियों को अपने कामकाज के एजेंडे की ज्यादा चिंता नहीं सता रही है। बल्कि, मंथन यही चल रहा है कि कैसे वोट बैंक में यह संदेश जाए कि पार्टी की छवि प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले ज्यादा पाक-साफ है? ऐसे में, रणनीतिकार अपने चेहरों के दाग-धब्बों की ज्यादा परवाह नहीं कर रहे हैं। उन्हें तो मीडिया रूपी आईने पर काफी गुस्सा आने लगा है। उन्हें गुस्सा आता है कि मुआ! यह आईना उनकी छवि में इतने दाग-धब्बे क्यों दिखा रहा है? एक तरह से उनका ज्यादा गुस्सा इसी आइने पर है। इसी को ठीक करने का प्रबंधन किया जा रहा है।

शायद, इसीलिए राजनीतिक दलों ने अपनी ज्यादा ऊर्जा राजनीतिक छवि को सुधारने और संवारने में झोंक दी है। पिछले दिनों ही राष्ट्रीय राजधानी में कांग्रेस ने देशभर से आए अपने 200 राष्ट्रीय प्रवक्ताओं को खास ट्रेनिंग देने के लिए बुलाया था। यहां दो दिन तक इनकी ‘पाठशाला’ लगाई गई। इस आयोजन के सुपरस्टार रहे कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी। उन्होंने पहले ही दिन पार्टी प्रवक्ताओं को वे हुनर बताए, जिनके जरिए मतदाताओं तक पार्टी की छवि का सकारात्मक संदेश पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने यह भी बता डाला कि पार्टी के नेताओं को सच बोलने से डरना नहीं चाहिए। चाहे प्रेस क्रांफ्रेंस हो या टीवी पैनल की बहस, हर जगह उन्हें आत्म विश्वास से भरा दिखना चाहिए। यह गुरुमंत्र भी दिया गया कि प्रवक्तागण अपनी निजी छवि चमकाने के बजाए अपनी पूरी ऊर्जा पार्टी की छवि संवारने में लगाएं। प्रतिद्वंद्वी दलों के नेताओं को जोरदार तर्कों से निरुत्तर करें। लेकिन, इस होड़ में जुबान संभालकर बात करें। ताकि, जनता के बीच सहजता, शालीनता व शुचिता का ही संदेश दिया जाए।
वाकई में ये बहुत अच्छी सीख है। इसको लेकर किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन, सच बोलने के जुमले पर विरोधियों से लेकर मीडिया के लोगों को भी कुछ हैरानी हुई। कइयों ने सवाल किया कि राहुल बाबा की सीख मानकर यदि पार्टी प्रवक्ताओं ने वाकई में खांटी सच बोलना शुरू कर दिया, तो पार्टी का क्या बनेगा? जब इस आशय का सवाल पार्टी के एक राष्ट्रीय सचिव से किया गया, तो उन्होंने भन्नाकर जवाब दिया कि आप लोग आखिर चाहते क्या हैं? हमारा नेता यदि अपने कार्यकर्ताओं को सच बोलने की हिम्मत करने का हौसला बंधाता है, तो भी आप लोगों को चैन क्यों नहीं मिलता? जाहिर है उनसे बहस करने की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। लेकिन, वे काफी समझदार निकले। चलते-चलते उन्होंने बता दिया कि पार्टी के कार्यकर्ता अच्छी तरह समझ लेते हैं कि उनके नेता के किस सीख का राजनीतिक निहितार्थ क्या है? ऐसे में, आप लोगों को इन मामलों में ज्यादा माथापच्ची करने की जरूरत नहीं है।

कांग्रेस की दो दिवसीय इस पाठशाला में दूर-दराज से आए कई प्रवक्ताओं ने अपने दिग्गज उस्तादों से जिज्ञासावश कुछ सवाल भी पूछ डाले। मसलन, छत्तीसगढ़ से आए एक युवा प्रवक्ता ने पार्टी के एक चर्चित महासचिव से जानना चाहा कि लोग बढ़ती महंगाई के बारे में सवाल दर सवाल करते हैं। आखिर ऐसे विकट सवालों का सकारात्मक जवाब कैसे दिया जाए? ताकि, झूठ भी न बोलना पड़े और बात बन जाए। इस यक्ष प्रश्न पर पार्टी महासचिव ने मुस्कराते हुए यही जवाब दिया कि ऐेसे सवालों पर झुंझलाने की जगह धैर्य और मुस्कराहट का संबल ज्यादा लेना चाहिए। इसका जवाब वही देना चाहिए, जो हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पिछले कई सालों से देते आ रहे हैं। यही कि पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी की वजह से हालात खराब हैं। इसी वजह से महंगाई पर पूरा नियंत्रण नहीं हो पाया। ऐसे सवालों का जवाब कुछ लंबा दीजिए। साथ में, यह भी बता दीजिए कि यूपीए सरकार की बेहतर आर्थिक नीतियां नहीं होती, तो देश की आर्थिक स्थिति कई और देशों की तरह चरमरा जाती।

पूर्वोत्तर से आए प्रवक्ताओं ने समस्या सुनाई कि तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी के लिए स्थानीय मीडिया का रुख नकारात्मक हो चला है। ऐसे में, वे प्रवक्ता लोग स्थिति को कैसे संभालें? उस्तादी के हुनर सिखाने गए एक युवा केंद्रीय मंत्री ने जवाब यही दिया कि इसके लिए आप लोगों को ‘होमवर्क’ करना पड़ेगा। पता करना पड़ेगा कि कैसे मीडिया का रुख कुछ बदले? इसके लिए एकदम व्यवहारिक तौर-तरीके अपनाने जरूरी हो जाते हैं। एक युवा मंत्री ने यह दीक्षा भी दे डाली कि टीवी न्यूज चैनलों के इस जमाने में कैसे प्रवक्तागण 30 सेकेंड के भीतर अपना मुकम्मल पक्ष रखने में दक्ष हों? यह अलग बात है कि मंत्री महोदय ने 30 सेकेंड वाला हुनर सिखाने के लिए कई मिनटों का भाषण कर डाला। सवाल यह आया कि यूपीए-2 की पारी में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से लेकर कोयला घोटाले तक कई ऐसे मामलों की   चर्चा होती है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से लेकर मीडिया तक रोज इनसे जुड़े सवाल उछालता है। आखिर इनसे कारगर बचाव कैसे किया जाए? उस्तादों ने इस तरह की समस्याओं का भी रेडीमेड किस्म का निदान बता दिया। यही बताया गया कि ऐसे सवालों पर बात घुमाने की कला आनी चाहिए।

यह भी बताया गया कि घोटालों के ज्यादातर मामले अदालतों में लंबित हैं। ऐसे में, लंबी-चौड़ी सफाई देने के बजाए एक लाइन का जवाब ज्यादा माकूल होता है। ऐसे सवालों पर यही कहना उचित रहेगा कि मामला अदालत में है, ऐसे में टिप्पणी करना उचित नहीं है। इसमें एक तीर से दो निशाने साधे जा सकते हैं। यही कि साफ-सफाई में ज्यादा झूठ भी नहीं बोलना पड़ेगा और यह भी संदेश जाएगा कि कांग्रेस के लोग अदालतों का बहुत सम्मान करते हैं। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें नहीं हैं, वहां के प्रवक्ताओं को यही सलाह दी गई कि वे ज्यादा आक्रामक तेवरों में रहें। राज्य सरकारों की ऐसे मामलों में ज्यादा खिंचाई करें, जिनसे आमतौर पर जनता को ज्यादा दो-चार होना पड़ता है। रणनीतिकारों ने इस आशय की भी सीख दी कि इस दौर में पार्टी कार्यकर्ताओं को जनसमस्याओं से जुड़े मामलों में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। ताकि, ‘आईना’ को दिखाई पड़े कि कांग्रेस के बंदे किस तरह से आम जनता की समस्याओं को लेकर अपना खून-पसीना सड़कों पर बहा रहे हैं? इन प्रवक्ताओं को यह विश्वास दिलाया गया कि सब लोग मिलजुलकर आत्म विश्वास से काम में जुट जाएं, तो महज चार महीने के अंदर ‘आईना’ भी वही दिखाने लगेगा, जिसकी हमें दरकार है।

इस तरह की चिंता केवल कांग्रेस खेमों को ही नहीं है। भाजपा नेतृत्व को भी अपनी छवि की खास चिंता सता रही है। खास तौर पर नरेंद्र मोदी के चेहरे को लेकर। यूं तो मोदी को पार्टी ने अभी औपचारिक तौर पर अपना ‘पीएम इन वेटिंग’ घोषित नहीं किया, लेकिन संकेत साफ हैं कि अगले चुनाव के लिए मोदी ही पार्टी का चेहरा होंगे। यह अलग बात है कि गुजरात में हुए 2002 के दंगों का भूत उनका पिंड नहीं छोड़ रहा। इस छवि को लेकर भाजपा नेतृत्व खासा हलकान है। कोशिश हो रही है कि दंगों का भूत कुछ थम जाए, तो कांग्रेस की अच्छी तरह खबर ली जा सके।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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