Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

उन्‍हें सैकड़ों इंसानों की मौत पर गर्व है?

 

6 दिसंबर 1992 भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय है जिसे धोने के लिये वहां पर फिर से बाबरी मस्जिद का निर्माण करना होगा, मगर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते ऐसा करना असंभव सा है. (सर मार्क टूली 7 दिसंबर 1992 के दिन बीबीसी संवाददाता की रपट से). जलते हुऐ रोजमर्रा के साधन, लाशों पर राम मंदिर बनाने का सपना बुनते वीएचपी, आरएसएस, बजरंग दल शिवसेना, के नेता. स्कूल कॉलेज बंद लोगों के चेहरों पर कभी न मिटने वाला खौफ. 

 

6 दिसंबर 1992 भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय है जिसे धोने के लिये वहां पर फिर से बाबरी मस्जिद का निर्माण करना होगा, मगर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते ऐसा करना असंभव सा है. (सर मार्क टूली 7 दिसंबर 1992 के दिन बीबीसी संवाददाता की रपट से). जलते हुऐ रोजमर्रा के साधन, लाशों पर राम मंदिर बनाने का सपना बुनते वीएचपी, आरएसएस, बजरंग दल शिवसेना, के नेता. स्कूल कॉलेज बंद लोगों के चेहरों पर कभी न मिटने वाला खौफ. 
 
आसमां में उठते धुऐं के बादल. गिरती हुईं सदभवाना और कौमी यकजहती की दीवारें. हिंदू मुस्लिम के बीच चौड़ी होती खाई. राजघाट से चीखती शांति के पुजारी की कब्र. देश में चारों और से गूंजते रामलला हम आयेंग, मंदिर वहीं बनायेंगे के नारे. देश में आपातकाल की सी स्थिती. दो वक्त की रोजी रोटी कमाने वालों को रोटी के लाले. मुंबई समेत देश में विभिन्न स्थानों पर होते सांप्रदायिक दंगे बिखरी हुई इंसानों की लाशें. गली गली हर कूचे में मृत और अधजले पड़े इंसान टूटे हुऐ धार्मिक स्थल, कई बच्चे एसे भी जिनके माता पिता की जिंदगी को दंगाईयों ने लील लिया. आखिर किसलिये? सिर्फ और सिर्फ राम के नाम पर उस राम के नाम जो कण – कण में मौजूद है उस राम के मंदिर के नाम जो मर्यादा पुरोषत्तम राम है. उस राम के नाम पर जिसे शायर ऐ मशरिक अल्लामा इकबाल ने कहा था कि ….है राम के वजूद पर हिंदोस्तां को नाज. एहले नज़र समझते हैं उनको इमाम ऐ हिंद.
 
उसी के बरअक्स खुद जनसंघ के लीडर जैसे रामजेठमलनी वगैरा राम के किरदार पर छींटाकशी करते रहे हैं मगर किसी मुसलमान ने राम के किरदार पर अशोभनीय टिप्पणी नहीं की फिर राम के नाम पर उनका कत्ल क्यों किया गया? और जो इन सबके लिये जिम्मेदार थे जो देश में दंगा कराने के लिये जिम्मेदार थे. मिस्टर लालकृष्ण आडवाणी वे इस वहशीयाना कदम पर बड़े जोश के साथ कह रहे हैं कि उनहें गर्व है. उन्हें गर्व है लाखों लोगों के बेघर करने पर, उन्हें गर्व है मासूमों के कत्ल पर, उन्हें गर्व है हैवानियत के नंगे नाच पर…. कितने शर्म की बात है कि बुढ़ापे में इंसान अपने पापों का प्रायश्चित करता है मोक्ष की प्राप्ति के लिये तीर्थ यात्रा पर जाता है. मगर अपने राजनीतिक लाभ के लिये उस पर ढिठाई से गर्व किया जाता है. अब कहां है न्यायपालिका? क्यों खुले घूम रहे हैं लाखों लोगों को बेघर और हजारों को मौत की घाट उतारने वाले आज 25 साल बाद भी उस पर गर्व जाहिर कर रहे हैं। जिन्हें सलाखों के पीछे होना चाहिये था वे खुले घूम रहे हैं, उन्हें देश का गृहमंत्री तक बनाया जाता है. 
 
जबकि एक स्टेशन मास्टर अगर लापरवाही करता है, जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों की जानें चली जाती हैं, दो ट्रेन आपस में भिड़ जाती हैं, उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया जाता है, उसकी नौकरी छीन ली जाती है. उसके खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दायर करके कार्रवाई की जाती है. तो करोड़ों लोगों की भावनाओं से खेलने वाली उमा भारती, प्रवीण तोगड़िया, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और इन सबके आका एलके आडवाणी जेल में क्यों नहीं गये। उल्टे वो न्यायपालिका का मजाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि उन्हें अयोध्या कराने पर गर्व है मगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती. क्या ये देश की अस्मिता का अपमान नहीं है? क्या ये लोकतंत्र का अपमान नहीं है? ये तो किसी राष्ट्रवाद की परिभाषा नहीं है. जिसकी दुहाई देते देते इन इस देश के मुसलमानों को गद्दार कहना शुरु कर दिया है. 
 
लोकतंत्र में लाशों की सौदागिरी से कोई प्रधानमंत्री नहीं बनता तो फिर लाशों की सौदागिरी करने वाले ये दो नाम ही क्यों प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिये पेश किये जा रहे हैं? जिसकी वजह सिर्फ यह है कि मोदी ने गुजरात में नरसंहार किया इसलिये वे देश (हिंदुत्तवादियों) के हीरो हो गये. एसे में आडवाणी को लगा वे भी तो इससे पहले इस कार्य को अंजाम दे चुके हैं उन्हें नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है, जबकि वे तो इस तरह की अमानवीय घटनाओं के संस्थापक रहे हैं, इसलिये उन्हें यह कहना पड़ा कि अयोध्‍या की घटना के लिये उन्हें कोई पछतावा नहीं है बल्कि उनके लिये ये गर्व की बात है कि इससे हिंदू समाज में नई जागृति आयी. इन्हें जलती हुई लाशों से मतलब नहीं है. न्यायपालिका, डेमोक्रेसी की आये दिन बखिया उधेड़ते रहते हैं. इन्हें इसमें गद्दारी नजर नहीं आती. इनकी इस बेशर्मी को देखकर एक बहुत पुराना और कई सौ बार सुना हुआ डायलॉग याद आता है ,,,,,,,,, कि शर्म है ….मगर इनको आती नहीं …
 
लेखक वसीम अकरम त्यागी पत्रकार हैं. 
Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...