: (संस्मरण – पार्ट 1) :आलोक मेहता से भयंकर और सार्वजनिक झगड़ा होने एक बाद मेरा पटना में रहना असंभव सा हो गया. वह मुझे वहां से खदेड़ने की जुगत में लग गए. मुझे नौकरी से निकाल बाहर करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी था, क्योंकि प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर का मुझ पर वरदहस्त था.
उधर आलोक मेहता भी राजेद्र माथुर साहब के निकटस्थ थे. आखिर तय हुआ कि मेरा तबादला अखबार के जयपुर संस्करण में कर दिया जाए. कुछ दिखावटी नानुकुर के बाद मैं १९८९ की वसंत ऋतु में जयपुर पंहुचा. ट्रक पर सामान ढुलान के फर्जी बिल बना कर दफ्तर से दस हज़ार रुपये वसूले. लाइफ मस्त हो गयी.
जयपुर में मैं पीएचडी करने के बहाने दो साल पहले ही गुज़ार चुका था. चिर परिचित शहर था, लेकिन नए सम्पाद्क श्याम सुंदर आचार्य एकदम अपरिचित. वह कोई लेखक पत्रकार भी नहीं थे कि उनका नाम पहले से सुन पाता. घोर संघी थे. उनकी केबिन में गया. दोहरा शरीर. मृदु भाषी, मददगार, जैसा कि संघी प्रायः होते ही हैं.
मैं तब तक नवभारत टाइम्स के एडिट पेज पर छपने लगा था, सो मैंने रोब गांठना चाहा. उन्होंने तुरंत ही चालाकी से समर्पण कर दिया, यह कहते हुए कि मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूँ. तुमने अब तक जो कुछ भी लिखा है वह सब पढ़ चुका हूँ. यद्यपि उनसे पांच मिनट की बातचीत के बाद मैं समझ गया कि वह मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते, और मेरे लेख तो क्या, वह कुछ भी नहीं पढते. यह बात मेरी समझ में आ गयी.
उन जैसा सज्जन, सीधा, झूठा, दिल का साफ़ और कलाकार संघी पत्रकार मुझे और कोई नहीं मिला. उन्होंने मुझसे रहने की दिक्कत के बारे में पूछा, अगले दिन अपने घर पर लंच के लिए आहूत किया, और मैं धन्यवाद देता हुआ बाहर निकल आया.

उत्तराखंड निवासी वरिष्ठ पत्रकार राजीन नयन बहुगुणा के संस्मरण का पहला भाग.
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