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उपन्यास ‘पिंजर’ से मिलती है मेरी जिंदगी : साध्वी

: फेसबुक, ईमेल या फोन का सहारा लेने के बाद जाती कहां? : ईश्वर में आस्था होने के कारण सम्मानजनक स्थान की तलाश में थी : बदायूं। पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद महाराज पर मुमुक्षु आश्रम की ही प्रबंधक साध्वी चिदर्पिता गौतम द्वारा लिखाई गयी रिपोर्ट के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं, जिन पर साध्वी ने गंभीरता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि घरेलू हिंसा की शिकार महिलायें इसलिए विद्रोह नहीं कर पातीं कि वह विद्रोह के बाद जायेंगी कहां?

: फेसबुक, ईमेल या फोन का सहारा लेने के बाद जाती कहां? : ईश्वर में आस्था होने के कारण सम्मानजनक स्थान की तलाश में थी : बदायूं। पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद महाराज पर मुमुक्षु आश्रम की ही प्रबंधक साध्वी चिदर्पिता गौतम द्वारा लिखाई गयी रिपोर्ट के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं, जिन पर साध्वी ने गंभीरता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि घरेलू हिंसा की शिकार महिलायें इसलिए विद्रोह नहीं कर पातीं कि वह विद्रोह के बाद जायेंगी कहां?

उन्होंने कहा- गृहस्थ जीवन में रहने वाली महिला के पास तमाम रिश्ते होते हैं, लेकिन उसको विद्रोह के बाद कोई आश्रय नहीं देता, जबकि उनके पास आश्रय पाने को अन्य कोई स्थान था ही नहीं, तभी समाज के हजारों भेडिय़ों से बचे रहने के लिए वह शोषण सहती रहीं और जब ससुराल के रूप में सुरक्षित स्थान व पति के रूप में समान साथी मिल गया, तो उन्होंने शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद कर दी। उन्होंने कहा कि वह फेसबुक, ईमेल या फोन से कह सकती थीं, पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह स्वामी चिन्मयानंद की सच्चाई सार्वजनिक करने के बाद रहती कहां?

साध्वी चिदर्पिता ने कहा कि उनकी जिंदगी प्रसिद्ध उपन्यास पिंजर से मिलती है। उपन्यास में पीड़ित पात्र उस जिंदगी को जैसे स्वीकार कर लेती है, ठीक वैसे ही उसने भी स्वीकार कर ली, पर समय का इंतजार कर रही थी और उसे विश्वास था कि ईश्वर एक दिन वह अवसर अवश्य देगा। शादी के बाद वह अवसर मिला, तो उनके कदम रुके नहीं। शादी के तत्काल बाद उन्होंने एफआईआर क्यूं नहीं कराई के सवाल पर उन्होंने कहा कि आश्रम छोडऩे के बाद श्राद्ध पक्ष शुरू हो गये, जिससे शादी एक महीने के बाद हो पाई, साथ ही शादी के बाद कुछ व्यक्तिगत समस्यायें सुलझाई और जीवन जैसे ही सहज हुआ, वैसे ही उन्होंने न्याय की गुहार लगा दी।

साध्वी ने यह भी बताया कि इस लड़ाई से मुझे या मेरे ससुराल पक्ष को सबसे बड़ा नुकसान है। उनके सामने हजारों सवाल खड़े हैं, जिनका जवाब देना, उनके लिए आसान नहीं है, फिर भी वह सब मेरा लगातार साहस बढ़ा रहे हैं, जिसके सहारे में न्याय न मिलने तक लड़ती रहेंगी।

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