Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

उम्र के साथ मुलायम की हनक और धमक कम हो गई है

: परिवार में समाया ‘नेताजी का समाजवाद' : उत्तर प्रदेश में बसपा के बाद सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार समाजवादी पार्टी को माना जा रहा है। सपा और खासकर 73 वर्षीय मुलायम सिंह के लिए यह विधान सभा और 2014 में होने वाले आम चुनाव उम्र के हिसाब से काफी मायने रखते हैं। कुछ राजनैतिक पंडित तो यहां तक भविष्यवाणी कर रहें हैं कि उक्त चुनाव मुलायम के नेतृत्व में लड़े जाने वाले आखिरी चुनाव हो सकते हैं। इसके बाद सपा को कोई न कोई नया कर्णधार चाहिए ही होगा। यह नया कर्णधार कौन होगा, यह प्रश्न भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन उम्मीद यही जताई जा रही है कि मुलायम अपने बाद भी सपा की बागडोर अपने परिवार में ही रखना चाहेंगे।

: परिवार में समाया ‘नेताजी का समाजवाद' : उत्तर प्रदेश में बसपा के बाद सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार समाजवादी पार्टी को माना जा रहा है। सपा और खासकर 73 वर्षीय मुलायम सिंह के लिए यह विधान सभा और 2014 में होने वाले आम चुनाव उम्र के हिसाब से काफी मायने रखते हैं। कुछ राजनैतिक पंडित तो यहां तक भविष्यवाणी कर रहें हैं कि उक्त चुनाव मुलायम के नेतृत्व में लड़े जाने वाले आखिरी चुनाव हो सकते हैं। इसके बाद सपा को कोई न कोई नया कर्णधार चाहिए ही होगा। यह नया कर्णधार कौन होगा, यह प्रश्न भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन उम्मीद यही जताई जा रही है कि मुलायम अपने बाद भी सपा की बागडोर अपने परिवार में ही रखना चाहेंगे।

सपा का नया कर्णधार मुलायम का बड़ा बेटा अखिलेश यादव भी हो सकता है, छोटा बेटा प्रतीक भी। कर्णधार के रूप में प्रतीक का नाम लिए जाने पर काफी लोगों को अटपटा लग सकता है, क्योंकि वह अभी राजनीति से दूर हैं। उसने राजनीति का कखहरा भी नहीं पढ़ा है, लेकिन कम लोग ही जानते होंगे कि प्रतीक मैनेजमैंट में मास्टर है तो पत्नी अपर्णा राजनीति शास्त्र में मास्टर। दोनों ने ही लंदन से मास्टर की डिग्री हासिल की है। कहा जा सकता है कि प्रतीक भले ही राजनीति से दूर हो लेकिन राजनीतिक दांव-पेंचों से वह अंजान नहीं होगा। वह यही सब देखते हुए पला-बड़ा है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। अखिलेश यादव भी मुलायम के लिए चिंता का विषय बने हैं। अखिलेश सपा को आगे ले जाने में पूरी ताकत लगाए हैं लेकिन उनमें नेताजी वाली बात नहीं आ रही है।

प्रतीक राजनीति में आएगा? यह प्रश्न किसी को अबूझ पहेली लगे, लेकिन यह हकीकत है। पिता मुलायम सिंह को उसके लिए भी ठीक वैसे ही रास्ता बनाना होगा, जैसा उन्होंने अखिलेश के लिए तैयार किया है। संभावना इस बात की जताई जा रही है कि प्रतीक 2014 के आम चुनाव (लोकसभा) में समाजवादी पार्टी की ओर से साइिकल की सवारी कर सकते हैं। उन्हें मुलायम अपने वर्चस्व वाली किसी संसदीय सीट से अपना प्रत्याशी बना सकते हैं। यह सीट संभल, बदायूं या बेहद उम्मीद है कि इटावा की भी हो सकती है।

खैर, बात मुलायम पर ही केन्द्रित की जाए तो इस बार मुलायम में काफी बदलाव नजर आ रहा है। सपा सुप्रीमों मुलायम जो पिछले चुनावों तक अपने दम पर दबंगई से फैसले लेकर और चुनौतियां स्वीकार करके चुनावी संग्राम फतेह कर देते थे, अबकी उनको दबाव में काम करना पड़ रहा है। पूरे राजनैतिक जीवन में अपने फैसलों और निणर्यों पर अटल रहने वाले मुलायम अबकी बार किसी भी फैसले पर ‘अटल’ नहीं दिख रहे हैं। मुलायम में जुझारूपन, दृढ़ इच्छाशक्ति, तत्काल अटूट निर्णय लेने की क्षमता घटी है। अब वह सबके साथ सामान्य रूप से व्यवहार करने वाले, जमीन से जुड़े नेताओं / पदाधिकारियों को स्नेह देने वाले नेता नहीं रहे।

यह सब बदलाव उनमें तबसे दिखाई दे रहे थे जबसे अमर सिंह सपा में आए थे, लेकिन अब अमर को सपा से बाहर गए जमाना हो गया है, लेकिन मुलायम ने एक बार जो ढर्रा पकड़ लिया उसे फिर नहीं बदला। बढ़ती उम्र ने इसे और बढ़ावा दिया। उनका धोबी पाट अब नहीं दिखता, जिससे सामने वाला चारो खाने चित हो जाया करता था। परिवार को छोड़कर करीब-करीब सभी पुराने समाजवादी उनसे किनारा करके चले गए हैं। राज बब्बर, अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, रशीद मसूद काफी लम्बी लिस्ट है। मोहन सिंह को भी डीपी यादव प्रकरण के बाद किनारे कर दिया गया है। अब पार्टी में नेताओं के नाम पर आजम खां को छोड़कर परिवार वाले ही बचे हैं।

उम्र के साथ मुलायम की हनक और धमक भी कम हो गई है। अब नेता जी पर दबाव डालकर उनका निर्णय बदलवा लिया जाता है। सपा प्रमुख को करीब से जानने वालो का कहना है कि नेताजी बात के धनी हुआ करते थे, उनकी बात पत्थर की लकीर होती थी, इसकी वजह से उन्हें कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी इसकी चिंता नहीं की। यह बात अब नेताजी में नहीं रही। इसी का फायदा उनका परिवार उठा रहा है। मुलायम को कुछ फैसले परिवार के दबाव में लेने पड़ रहे हैं तो कई फैसले पारिवारिक दवाब में बदलने पड़ रहे हैं। पत्नी साधना सिंह की चचेरी बहन मधु गुप्ता को मुलायम लखनऊ का मेयर बनाने और सांसद बनाने की कोशिश भी कर चुके हैं।

मधु गुप्ता के डाक्टर पति अशोक कुमार गुप्ता भी मुलायम की मेहरबानी से सूचना आयुक्त के पद पर विराजमान रह चुके हैं। परिवार वालों की महत्वाकांक्षा ने उन्हें बुरी तरह बेबस कर रखा है, इसकी ताजा मिसाल है उनको अपने साढ़ू प्रमोद गुप्ता (पत्नी साधना के बहनोई) को टिकट देना पड़ा। कालांतर में उन्हें दूसरे बेटे प्रतीक को भी पहले बेटे की ही तरह सांसद बनाने की जिम्मेदारी है। प्रमोद को औरेया जिले की विधुना सीट से कई नेताओं की दावेदारी खारिज करके सपा प्रत्याशी बनाया गया है। इसी के बाद यह उम्मीद जताई जाने लगी है कि अब वह प्रतीक और अपनी दूसरी बहू अर्पणा के लिए राजनीति में कोई न कोई राह जरूर तैयार करेंगे।

मुलायम के तौर-तरीकों में बदलाव ने ही उन्हें तन्हा कर दिया है। सपा के खांटी (समर्पित) नेता उनसे अलग हो चुके हैं। बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर जैसे नेताओं की बेरुखी ने मुलायम को कहीं का नहीं छोड़ा। जो नेता गए उसमें से आजम को छोड़कर किसी ने दोबारा पार्टी की तरफ रुख करने की नहीं सोची। आजम की दूसरी पारी भी कोई खास कमाल नहीं कर पा रही है। उनके विवादस्पद बयानों से मुसलमान खुश तो नहीं हो रहा है, लेकिन हिन्दू वोटर सपा से नाराज जरूर होता जा रहा है। आजम सपा के लिए कितने अहम हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी विधान सभा चुनाव प्रचार के लिए कहीं से मांग नहीं हो रही है। लोग मुलायम और अखिलेश के अलावा किसी नेता को प्रचार के लिए ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे।

मुलायम चौतरफा परेशानियों से घिर रहे हैं। कल्याण के कारण मुसलमान उनसे नाराज हैं तो छोटे भाई अमर सिंह की ‘बेवफाई’ के बाद पार्टी धन संकट से भी जूझ रही है। पैसे की कमी के कारण प्रचार-प्रसार का काम ठप पड़ा है। आर्थिक तंगी से जूझ रही समाजवादी पार्टी को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है। बसपा के विज्ञापन प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक में छाए हुए हैं, लेकिन सपा के पास विज्ञापन के लिए पैसा ही नहीं है। अमर के रहते सपा को कभी आर्थिक मोर्चे पर परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था। आजम के चलते ही रामपुर की सांसद जया प्रदा भी मुलायम से दूर हो गई हैं। कन्नौज के छोटे सिंह यादव, गुन्नौर (बदायूं) उर्मिला यादव, विनोद उर्फ कक्का, महाराज सिंह यादव जैसे दबंग नेता भी पार्टी से दूर चले गए हैं। यही नहीं अखिलेश और प्रतीक के आगे आने से शिवपाल यादव का राजनैतिक रूप से पीछे जाना भी कई प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट.  अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...