Viplav Vinod : एक फ्रीलांसर ने कई जगहों से निकलने वाले हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र में लिखने की इच्छा से उसने वहां के फीचर प्रभारी को फोन किया और उस अखबार में लिखने की इच्छा जतायी। फीचर प्रभारी ने जल्द से जल्द मिलने को कहा। जब वह फ्रीलांसर मिलने गयी तो उसकी खूब तारीफ की और नियमित रूप से लिखने और मिलते रहने को कहा। उस दिन के बाद से उस फ्रीलांसर के लिये जीना दुभर हो गया। हर दिन उसके फोन पर अनाप—शनाप मैसेज आते रहते हैं। वह अब तंग आ चुकी है।
वो सलीके से उस फीचर प्रभारी से कह चुकी है कि उसे यह सब पसंद नहीं और आगे से ऐसा करने से बाज आयें, लेकिन उस महानुभाव पर कोई असर नहीं हो रहा है। अब आप बतायें क्या किया जाये ताकि वह खुद ही सुधर जायें। ऐसे घटिया लोगों के कारण न केवल पत्रकारिता बल्कि सभी पुरूषों के बारे में गलत धारणा बनती है।
वरिष्ठ पत्रकार विनोद विप्लव के एफबी वॉल से साभार.






