: अमर्त्य सेन झूठ बोल रहे हैं या अखबार : नए साल में पत्रकारिता में गुणात्मक बदलाव लाने की मीडिया के सामने चुनौती : नोबल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इस साल के प्रथम सप्ताह में ही मीडिया की खराब गुणवत्ता की दो घटनाएं झेलीं। लोकपाल से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जवाब दिया। अगले दिन जब उन्होंने देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अख़बार और कई टी.वी चैनलों को देखा तब उसमें शीर्षक पाया “लोकपाल विधेयक सूझ-बूझ से लाया गया बिल– अमर्त्य सेन”। जबकि कुछ अखबारों ने शीर्षक दिया था- “लोकपाल विधेयक बगैर सोचे-समझे लाया गया बिल- सेन”। एक अन्य आर्थिक समाचार पत्र ने एक दिन पहला शीर्षक दिया और दूसरे दिन दूसरा शीर्षक।
एक अन्य बैठक में उसी दिन सेन ने कैंसर पर भाषण दिया। एक अखबार की हेडलाइन थी- “धूम्रपान एक निजी मामला है– सेन” जबकि दूसरे अखबार ने- “धूम्रपान करने वालों की आज़ादी पर रोक लगनी चाहिए- अमर्त्य सेन”। तीसरी घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अखबार ने 15 दिसंबर को एक शीर्षक दिया- “भ्रष्टाचार से जनता सड़क पर नहीं निपट सकती- अमर्त्य सेन”। अमर्त्य सेन का कहना था कि उन्होंने एक भी ऐसा स्टेटमेंट नहीं दिया और ऑडियो-टेप इसके गवाह हैं।
अपनी इस वेदना को व्यक्त करते हुए इस नोबल पुरस्कार विजेता ने हालांकि प्रजातंत्र को मज़बूत करने में भारतीय मीडिया की भूमिका को सराहा भी है लेकिन उनकी यह अपेक्षा कि मीडिया को कम से कम तथ्यों के मामले में सचेत होना चाहिए, हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि पत्रकारिता के पेशे में हमें और बेहतर करने की ज़रूरत है। तथ्य को पेश करने में इतना बड़ा विरोधाभास हमारी व्यावसायिक कुशलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ऐसे समय में जबकि तकनीकि विकास के बाद से हर वक्तव्य रिकॉर्ड पर होता है, ऐसा विरोधाभास विषय को लेकर हमारी समझ पर प्रश्नचिह्न लगाता है और साथ ही साथ यह भी प्रदर्शित करता है कि हम तथ्य देने में कहीं गैरज़िम्मेदार हैं।
दरअसल इस पूरी समस्या के मूल में जाना होगा। पत्रकारिता में कौन सा वर्ग आ रहा है ? उसके प्रशिक्षण के उपादान व संस्थाएं कैसी हैं? पत्रकारों की नियुक्ति में किन चीज़ों पर ध्यान देने की ज़रूरत है? यह भी देखना उतना ही ज़रूरी होगा कि एक बार पत्रकारिता में आने के बाद अखबार या चैनल उन्हे किस तरह से “ऑन-जॉब” ट्रेनिंग देते हैं।
जैसे-जैसे समाज प्रबुद्ध होता है और उसकी तार्किक क्षमता बढ़ती है वैसे-वैसे संस्थाओं से उसकी अपेक्षाएं भी बढ़ती जाती है। अंतर्संस्था-अंतर्क्रियाओं की गुणवत्ता बदलने लगती है। उन सब के प्रति सुग्राह्य होना एक पत्रकार का शाश्वत भाव होना चाहिए। आज रिपोर्टरों का एक बड़ा वर्ग है जो सीधे देश की सर्वोच्च प्रजातांत्रिक संस्था संसद की रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया जाता है जबकि उसे यह नहीं मालूम होता कि अन्य निचली संस्थाएं कैसे काम करती हैं या संविधान में संघीय ढ़ाचे के तहत किन संस्थाओं के क्या कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं ? उदाहरण के तौर पर अगर एक पॉलिटिकल रिपोर्टर को, जो कि संसद की रिपोर्टिंग करता है, ज़िला परिषद नाम की संस्था के कर्तव्य या अधिकार नहीं मालूम हैं तब वह प्रजातांत्रिक पद्धति को पूरी तरह न तो समक्ष पाएगा और न हि उसकी रिपोर्टिंग परिपक्व होगी।
चूंकि सामाजिक विकास एक सतत प्रक्रिया है लिहाज़ा बेहतर यह होगा कि पत्रकारों को सबसे निचली संस्थाओं व प्रक्रियाओं से गुज़ारा जाए। जैसे- थाना, शव-विच्छेदन गृह, नगरपालिका, विकासखण्ड, निचली अदालतें आदि। इसके बाद इन्हे राज्य के बड़े शहरों या राजधानी में बड़ी समस्याओं की रिपोर्टिंग के लिए एक नए रिफ्रेशर कोर्स के बाद भेजा जाए। यहां कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि निचली संस्थाओं की रिपोर्टिंग कोई निम्न किस्म की पत्रकारिता है बल्कि यह कि इन संस्थाओं के कार्यकलापों व उपादेयता को जाने बगैर पूरी प्रजातांत्रिक व्यवस्था या संसदीय प्रणाली को समझना मुश्किल होता है। ऐसे तमाम वरिष्ठ पत्रकार मिलते हैं जो बगैर उत्तरप्रदेश गए पूरे चुनाव का विश्लेषण कर देते हैं जबकि उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि उत्तरप्रदेश में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत कितना है, या बुंदेलखण्ड प्रदेश के पश्चिम में है या पूर्व में या मानव विकास सूचकांक क्या होता है और किन आधार पर बनाया जाता है।
अभी हाल ही में चंडीगढ़ हाईवे के पास दो सांड़ों की जबर्दस्त लड़ाई हुयी। कई गाड़ियां क्षतिग्रस्त हुयी। ऑन जॉब ट्रेनिंग न होने की वजह से ही एंकर ने स्पॉट पर पहुंचे रिपोर्टर से लाइव चैट में पूछा– दोनों सांड़ किस बात पर लड़े थे? जाहिर है कि एंकर को समुचित ट्रेनिंग नहीं दी गयी है।
यहां यह भी बताना ज़रूरी है कि भारतीय पत्रकारिता की बुराई करने वालों का एक बड़ा वर्ग है जो स्वयं सुविधाभोगी रहा है और पत्रकारिता की बुराई वह “ इंटलेक्चुअल जिमनास्टिक्स ”(बुद्धि-विलास) के रूप में करता है। पी.सांईनाथ के लेखों से कुछ आंकड़े निकालकर पत्रकारिता पर आरोप लगाता है कि इन्हे गरीबों की चिंता नहीं है। यूरोप का थोड़ा-बहुत इतिहास जानकर वह यह बताना चाहता है कि भारत का पत्रकार अशिक्षित है और ग़ालिब के कुछ शेर उद्धृत करके वह अपने को धर्मनिरपेक्ष बताना चाहता है। भारतीय पत्रकारिता की ऐसे लोगों को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन जब समाज का एक वर्ग या अमर्त्य सेन जैसे लोग पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लगाएं तब यह सोचना पड़ता है कि गलती कहां हुयी है।
गरीबी के प्रति संवेदनशील होने के लिए हमें गरीबी जीना होगा। दिल्ली से उड़कर पटना के फाइव-स्टार होटल में पड़ाव डालकर स्कॉर्पियो से बिहार की गरीबी देखकर कोई पत्रकार गरीबी की विभीषिका पर लिखना चाहता है तब उसके समझ में नहीं आएगा। एक किस्सा याद आता है। किसी धनी व्यक्ति की बेटी से एक गरीब पर निबंध लिखने को कहा गया। उसने लिखा- गरीब आदमी इतना गरीब होता है कि उसका बंगला भी गरीब होता है, उसकी गाड़ी भी गरीब होती है, उसका ड्राइवर भी गरीब होता है, उसका माली भी गरीब होता है, सब कुछ गरीब होता है।
पत्रकारों की संस्थाओं को और वरिष्ठ संपादकों को इस ओर ध्यान देना होगा। एक सामूहिक फैसले के तहत पत्रकारिता के पेशे में गुणात्मक सुधार एक सतत प्रक्रिया है। लोकपाल बिल की सूक्ष्मताओं से लेकर यूरिया खाद की अनुपलब्धता तक सभी पक्षों पर एक सम्यक ज्ञान के
बिना पत्रकारिता की पूरी उपादेयता नहीं बन पाएगी।
वरिष्ठ पत्रकार और साधना न्यूज के एडिटर इन चीफ एनके सिंह का विश्लेषण. यह दैनिक भास्कर में आज प्रकाशित हो चुका है.





