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एक्जिट पोल और मीडिया : कौव्वा कान लेकर भाग रहा… पीछे दौडो!

ईवीएम के अल्ट्रासाउण्ड का कोई तरीका निकल आया हो, तो नहीं कह सकता, वरना कहीं से मुमकिन नहीं कि गिनती किए बिना कोई नतीजे का पूर्वानुमान कर सके। अल्ट्रासाउण्ड का ईजाद नहीं हुआ था, तो बच्चों के पैदाइश को लेकर अन्त तक भ्रम बना रहता था, लिंग निर्धारण किसी के वश में नहीं था। हां, कुछ ज्योतिषी या पारखी दाई सटीक भविष्यवाणी कर पाती थी। टीवी चैनलों पर 'एक्जिट पोल' का जो शोर चल रहा है, बिल्कुल हास्यास्पद लगता है। पिछले ही विधान सभा चुनाव की बात करें, गिनती के अंतिम तक कोई बता पाने की स्थिति में नहीं था कि बसपा बहुमत की सरकार बनाने जा रही है।

ईवीएम के अल्ट्रासाउण्ड का कोई तरीका निकल आया हो, तो नहीं कह सकता, वरना कहीं से मुमकिन नहीं कि गिनती किए बिना कोई नतीजे का पूर्वानुमान कर सके। अल्ट्रासाउण्ड का ईजाद नहीं हुआ था, तो बच्चों के पैदाइश को लेकर अन्त तक भ्रम बना रहता था, लिंग निर्धारण किसी के वश में नहीं था। हां, कुछ ज्योतिषी या पारखी दाई सटीक भविष्यवाणी कर पाती थी। टीवी चैनलों पर 'एक्जिट पोल' का जो शोर चल रहा है, बिल्कुल हास्यास्पद लगता है। पिछले ही विधान सभा चुनाव की बात करें, गिनती के अंतिम तक कोई बता पाने की स्थिति में नहीं था कि बसपा बहुमत की सरकार बनाने जा रही है।

मैं वाराणसी में रहता हूँ। लगभग दो दशक की पत्रकारिता में राजनीतिक रिपोर्टिंग ही करता रहा। हवा के रूख से कुछ अनुमान लगाना आसान होता था, पर कौन जीत रहा, दावे के साथ कहना मुश्किल होता रहा। हमने इस चुनाव को करीब से देखा जाना और समझा, पर हमारे जैसा कोई शख्स नहीं कह सकता कि फलां सीट फलां के खाते में जा रही है। फिर सर्वे एजेन्सियों के पास कौन सी मशीन है जो सीटों का निर्धारण तक कर देती हैं।

याद है। एक दफा श्री सुन्दर लाल पटवा (मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री) भाजपा के सम्मेलन में आए थे। चुटीले अंदाज में एक्जिट पोल की पोल खोली। बोलें, नतीजे की पूर्व संध्या पर श्री दिग्विजय सिंह ने हमे मुख्यमंत्री पद की बधाई दी, लेकिन नतीजा आया तो मजबूरन हमें दिग्विजय सिंह को बधाई देनी पड़ी। दरअसल एक्जिट पोल का तमाशा कुछ लोगों के नहाने-खाने का धंधा बन गया है। टीवी चैनलों पर बहस करने वाले विशेषज्ञों को देखता हूँ, इनके स्त्रोत हम जैसे गंवई या छोटे शहरी पत्रकार या चुनाव विशेषज्ञ होते हैं। एक भी विधानसभा की भौगोलिक या सामाजिक जानकारी उन्हें नहीं होती, पर टीवी पर बैठ ऐसा भौकाल देते हैं, जैसे ये घर-घर जाकर एक-एक वोटर से मिल चुके हो। पत्रकारिता का यह रूप देखने को मिलेगा, अफसोस होता है।

पत्रकारिता की विधा को हम लोगों ने पराड़कर जी के आदर्श जीवन से सीखा है। विश्वसनीयता जिसकी पहली शर्त होती रही है। तथ्य परक पत्रकारिता से इंच भर भटकने पर बड़े से बड़े पत्रकार अपनी नौकरी गंवा देते थे। आज की पत्रकारिता, खासकर टीवी पत्रकारिता समाज को किस ओर ले जायेगी भगवान ही मालिक हैं। ऐसा लगता है कि पैसा कमाने की होड़ में समाज का बाकी तंत्र, दुनिया का कोई दंद-फंद करने को तैयार है, उससे कई कदम आगे मीडिया जगत बढ़ चुका है। बेनी बाबू ने यह बोल दिया, आजम ने ऐसे जवाब दिया, जयंत ने यह कह दिया, अखिलेश यादव ने यह बयान दे डाला, अरे भाई! यह सब क्या है? जैसे कौव्वा कान लेकर उड़ गया, बस पीछे दौड़ पड़े। दिल्ली में बैठे पत्रकारिता के भीष्म पितामहों से गुजारिश है कि वह 'चिरहरण' पर खामोश न बैठें।

लेखक धर्मेंद्र सिंह बनारस में पत्रकार रहें हैं. इन दिनों कांग्रेस से जुड़े हुए हैं तथा मीडिया समिति के चेयरमैन हैं.

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