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एक्‍सप्रेस टावर : भव्‍य इतिहास लौटने का झूठा इंतजार

आज लंबे समय बाद या यूं कह लीजिए कई साल बाद अपने एक पत्रकार मित्र से मिलने मुंबई के नरीमन पाइंट इलाके में गया। मित्रवर का कहना था कि शाम को मेरे दफ्तर ही आ जाइए। यही चर्चा कर लेंगे। उनके अखबार में पहुंचते ही पानी-चाय से स्‍वागत हुआ। इसके बाद जरुरी चर्चा….चर्चा चल ही रही थी कि मित्र ने आग्रह किया कमल जी कुछ खाने का मन हो तो बताएगा। नरीमन पाइंट की कई चीजें फैम्‍स है, जिनमें से आपकी पसंद की चीज आपको खिलाई जाएगी। इस बात ने बरसों पहले की याद ताजा दिला दी।

आज लंबे समय बाद या यूं कह लीजिए कई साल बाद अपने एक पत्रकार मित्र से मिलने मुंबई के नरीमन पाइंट इलाके में गया। मित्रवर का कहना था कि शाम को मेरे दफ्तर ही आ जाइए। यही चर्चा कर लेंगे। उनके अखबार में पहुंचते ही पानी-चाय से स्‍वागत हुआ। इसके बाद जरुरी चर्चा….चर्चा चल ही रही थी कि मित्र ने आग्रह किया कमल जी कुछ खाने का मन हो तो बताएगा। नरीमन पाइंट की कई चीजें फैम्‍स है, जिनमें से आपकी पसंद की चीज आपको खिलाई जाएगी। इस बात ने बरसों पहले की याद ताजा दिला दी।

जब नरीमन पाइंट स्थित एक्‍सप्रेस टावर में शाम को जबरदस्‍त गहमागहमी रहती थी। रामनाथ गोयनका जी के अलग-अलग अखबारों और पत्रिकाओं में काम करने वाले पत्रकारों के अलावा अन्‍य समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो और दूरदर्शन के ढ़ेरों पत्रकारों से लेकर जनसम्‍पर्क अधिकारियों की फौज तक यहां हर शाम जुटती थी। मुंबई महानगर में किसी भी पत्रकार से मिलना हो तो बस यह कह दीजिए, शाम को मिलते हैं एक्‍सप्रेस टावर में। या आपने सामने वाले पत्रकार अथवा जनसम्‍पर्क अधिकारी से पूछ भी लिया कि आज शाम कहां मुलाकात हो सकती है तो उसका भी यही जबाव होता था, आ जाइए एक्‍सप्रेस टावर। मुलाकात भी हो जाएगी, चौपटी का आनंद भी ले लेंगे और एक्‍सप्रेस की कैंटिन में चाय-कॉफी या नाशता अथवा खाना।

मैं मुंबई पहुंचा था जून 1989 में और दो चार महीनों में ही जनसत्ता के अनेक पत्रकारों से दोस्‍ती हो गई। इसके अलावा वरिष्‍ठ पत्रकारों से भी परिचय हुआ। उस समय शादी हुई नहीं थी और जन्‍मभूमि के अखबार व्‍यापार जहां मैं नौकरी करता था, शाम को फ्री होने के बाद महीने में 15 बार पैदल या बस से एक्‍सप्रेस टावर पहुंच जाता था। गुजरात के शहर राजकोट में पढ़े होने एवं गुजराती समाचार पत्र समूह जन्‍मभूमि में काम करने की वजह से गुजराती पत्रकारों से भी खूब दोस्‍ती थी जिसकी वजह से एक्‍सप्रेस टावर में जाने पर सारा माहौल घरेलूनुमा लगता था। एक्‍सप्रेस टावर जाने के साथ जनसत्ता, समकालीन (दैनिक गुजराती अखबार), लोकसत्ता (दैनिक मराठी अखबार) संझा जनसत्ता, हिंदी स्‍क्रीन, स्‍क्रीन इंडिया, फाइनेंशियल एक्‍सप्रेस में खूब परिचय बढ़ा। इनमें वहां काम करने वाले पत्रकार एवं मिलने जुलने आने वाले पत्रकार थे। लेकिन ज्‍यादा समय जनसत्ता, संझा जनसत्ता में ही बीतता था।

जनसत्ता के संपादक राहुल जी एवं बाद में प्रदीप सिंह जी से यही पहचान हुई। इन दोनों संपादकों के दिए कई स्‍टोरी एसाइनमेंट किए। सतीश पेडणेकर, संजय निरुपम,  दीपक पाचपोरे, द्धिजेद्र तिवारी, ओम प्रकाश सिंह, प्राण धाबर्डे, भृगुनाथ चौहान, सुधांशु शेखर, सदानंद गोडबोले, गणेश झा, आलोक गुप्‍ता, बसंत मौर्य, विजय शंकर चतुर्वेदी, अनुज अलंकार आदि-आदि से गपशप होती, काफी कुछ सीखने को मिलता एवं कोई स्‍टोरी करनी होती तो उस पर जमकर चर्चा। संझा जनसत्ता में तो सतीश पेडणेकर जी ने जनरल और बिजनैस स्‍टोरी से लेकर अनेक इंटरव्‍यू तक लिखवाएं। या यूं भी कह सकते हैं कि संझा जनसत्ता में खूब छपा। एक्‍सप्रेस टावर की कैंटिन में चाय पानी के अलावा लेट हो जाने पर खाना भी हो जाता। खाना अक्‍सर गणेश झा के साथ खाता था।

एक समय पत्रकारों की जोरदार चहल पहल से गुंजने वाला यह एक्‍सप्रेस टावर शायद आज अपने भव्‍य इतिहास के साथ खड़ा है। मैं मिला नहीं लेकिन सुन रखा था कि स्‍वयं रामनाथ गोयनका जी भी यही सबसे ऊपरी मंजिल पर पेंट हाउस में रहते थे। लेकिन अब यहां न तो पत्रकार है और न ही वह चहल पहल। बस है तो इतिहास, एक भव्‍य इतिहास जिसमें दर्ज है कि इंडियन एक्‍सप्रेस समूह के अखबारों ने कई सरकारों और मंत्रियों की नींद उड़ाकर ही नहीं रख दी, उखाड़ भी दिया था। महाराष्‍ट्र के एक समय मुख्‍यमंत्री रहे अंतुले तो इस टावर की परछाई से भी भय खाने लगे थे जिसने सीमेंट घोटाले को उजागर कर उनका कैरियर चौपट कर दिया था।

एक्‍सप्रेस का सारा कामकाज अब मुंबई के उपनगर परेल से हो रहा है लेकिन पत्रकारों का लगने वाला मेला वहां देखने को नहीं मिलता। जबकि यह एक्‍सप्रेस टावर अपने भव्‍य इतिहास के साथ अपने दिन लौटने का झूठा इंतजार कर रहा है। आज इंडियन एक्‍सप्रेस के अखबार कई स्‍टॉल पर तो मिलते ही नहीं या हॉकर ही लाकर देने से मना कर देता है कि साब बिकता ही नहीं। आपके लिए एक कॉपी खरीदने का झंझट कौन मोल ले।

लेखक कमल शर्मा, आईआईएमसी, नई दिल्‍ली के पूर्व छात्र हैं एवं इन दिनों मुंबई में एक मीडिया हाउस में कार्य कर रहे हैं. संपर्क- [email protected]


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