तीन महीने पहले, 31 अगस्त 2011 को 1977 बैच के बिहार कैडर के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अभयानंद ने सूबे के पुलिस महानिदेशक की कमान संभाली। तब उनके जेहन में यह सवाल उठा था कि विभिन्न थानों के मालखाने में जब्त अवैध अस्लहों का क्या किया जाए? प्रदेश में 824 पुलिस स्टेशन हैं। सन् 2000 से अगस्त 2011 तक पुलिस ने तकरीबन पौने दो लाख हथियार अपराधियों एवं उग्रवादियों से बरामद किए थे।
उनमें एके 47, कारबाइन, स्टेनगन, रायफल, बंदूक, माउजर, पिस्तौल, देसी कट्टा वगैरह थे। वैसे सूत्रों के मुताबिक अभी प्रांत में औसतन 10 आग्नेयास्त्र प्रत्येक माह पुलिस के हाथ लगते हैं। हालांकि राजद राज में, खासकर मार्च 2000 से 4 मार्च, 2005 तक पांच सालों में हजारों-लाखों की संख्या में गैर-आईनी हथियार पुलिस ने बटोरे थे।
बहरहाल, प्रांतीय पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी मिलते ही अभयानंद ने पता लगाया कि मालखानों में कितने ऐसे हथियार हैं जिनके मामले अदालत द्वारा निबटाए जा चुके हैं। इस बाबत उन्हें खबर लगी कि 60 हजार अस्लहों के केस बाकायदा खत्म हो गए हैं। डीजीपी ने अदालत से इजाजत लेकर सामाजिक रूप से इस्तेमाल में आने वाले औजार बनाने का फरमान जारी कर डाला। मसलन, दरभंगा में सरिये, फावड़े, बेलचे, कुदाल आदि के निर्माण धड़ल्ले से जारी है। उन्हें पुलिस की मौजूदगी में लोहार पहले गलाते हैं। तब उपकरण का रूप प्रदान किया जाता है। ज्यादातर कृषि संबंधित उपकरण ही फिलवक्त तैयार करने का जोर पुलिस महानिदेशक का है। उम्मीद है कि बहुत ही कम दाम पर औजार काश्तकारों को उपलब्ध कराये जाएंगे। लोहारों को भी उचित राशि मुहैया कराई जाएगी। मुजफफरपुर में भी औजार ढालने का काम रफतार पकड़ चुका है।
सवाल उठता है कि अस्लहों को नेस्ताबूद कर उनसे उपकरण बनाना क्या न्यायसंगत है? अभयानंद शुक्रवार को बताते हैं- पुलिस मैन्युअल में स्पष्ट प्रावधान है कि डीजीपी उन शस्त्रों को नष्ट कर सकते हैं जिन्हें पुलिस ने जब्त कर रखा है और जिनकी उपयोगिता नहीं है। बेशक इसमें सावधसनी यही बरतनी होती है कि जिस कांड में हथियार पकड़े गए हैं, उस मुकदमे को कोर्ट ने निर्णय दे कर दिया हो। सीआरपीसी की धारा के तहत ही न्यायालय इस प्रकार के आदेश पारित करती है।
आर्थिक अपराध समाज, राज्य एवं देश को दीमक की तरह चाट रहा है, यह टिप्पणी पुलिस महानिदेशक ने की। लिहाजा, इस पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से अभयानंद ने आर्थिक अपराध इकाई बनाने का प्रस्ताव भी सरकार के पास भेजा है। उन्हें इसकी अधिसूचना शीघ्र ही जारी होने की उम्मीद है। बकौल डीजीपी इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक जिले में दो-तीन अफसरों को रखा जाएगा। वे दर्ज आर्थिक अपराधों का ही सिर्फ अनुसंधान करेंगे। इन अधिकारियों को ट्रेनिंग सीबीआइ देगी। गाजियाबाद में उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा। इस सिलसिले में सीबीआइ के निदेशक से गुजारिश की गई है। इसके अलावा यहां एक और आर्थिक अपराध यूनिट संगठित की गई है। इसका लक्ष्य होगा कालेधन पर रोक लगाना, जिस स्रोत से कालेधन का जन्म हो रहा है, उसे ही मटियामेट करना, ध्वस्त करना, जो राजस्व की हानि के लिए जिम्मेदार हैं, विकास कार्यो में घोटाले कर रहे हैं, कानून के दायरे में उनकी चल-अचल संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। भारत सरकार की एजेंसियों से भी अभयानंद ने अनुरोध किया है कि वे उनकी सहायता करें। वह खुलासा करते हैं कि आर्थिक अपराध के लिए पुलिस पहली मर्तबा तफतीश करेगी। उनके अनुसार आर्थिक अपराध का सीधा रिश्ता माओवादियों, नक्सलियों के बढ़ने से है। साथ ही नक्सलवादी इलाकों में तरक्की के कार्य होने भी आवश्यक हैं। नक्सली भी तो हमारी तरह ही इस मुल्क के नागरिक हैं।
खेल के क्षेत्र में अभयानंद ने चक दे बिहार का जुमला उछाल रखा है। बीएमपी मैदान, पटना में उन्होंने बास्केटबॉल के अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का निर्माण शुरू करवा दिया है। एक कोर्ट की स्थापना पर करीब 35 लाख की रकम खर्च होगी। कबड्डी चूंकि अब मिट्टी में नहीं खेली जाती, बल्कि मैट पर उसकी उठापटक होती है, इसलिए अभयानंद की पहल पर विभाग मैट की खरीदारी करने वाला है। अभयानंद का ज्ड्रीम प्रोजेक्ट है बीएमपी ग्राउंड पटना को खेल गांव में तब्दील करना। चक दे बिहार का नारा अभयानंद ने 2008 में उस वक्त दिया था जब वे बीएमपी के एडीजी थे। इसे अमलीजामा पहनाने वास्ते उन्होंने डेढ़ सौ गरीब बच्चों का चयन किया। फिर उनमें से 75 लोगों को बास्केटबॉल, हैंडबॉल, एथलीट एवं हॉकी के खेल में कोच ने तीन सालों तक ट्रेंड करने में अपना तन-मन लगाया। नतीजतन, पूर्वी क्षेत्र एथलीट चैंपियनशिप प्रतियोगिता में चार लड़कों ने स्वर्ण तथा रजत पदक जीता। यह एथलीट प्रतियोगिता कोलकाता में हुई थी। जूनियर नेशनल बास्केटबॉल चैंपियन (19 वर्ष के अंदर के लड़के), स्कूल गेम फेडरेशन ऑफ इंडिया, नेशनल यूथ बास्केटबॉल चैंपियनशिप (17 साल तक के नौजवान) में नीतीश कुमार, रूपेश कुमार, सोनू कुमार, विकास गुप्ता चुने गए। आज की तारीख में सभी के सभी बिहार बास्केटबॉल टीम के अंग हैं। हैंडबॉल के लिए पांच लड़के-लड़कियां इधर चेन्नई के लिए रवाना हुए हैं। वहां राष्ट्रीय हैंडबॉल चैंपियनशिप होने जा रही है। हिंदुस्तान के कई प्रदेशों में 23 बच्चों ने जूनियर एवं सीनियर हॉकी चैंपियनशिप में अपना शानदार प्रदर्शन दिखाया है। सन् 2010 और 2011 में उन्हें मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप खेलने का भी मौका मिला है। जाहिर है चक दे बिहार ने देश में अपना परचम लहराया है। कुश्ती में अभयानंद ने कामेश्वर को बतौर कोच बहाल किया था। वही कामेश्वर कुश्ती कोच बनकर लंदन जा रहे हैं। डीजीपी के समक्ष बड़े-बड़े वेकों को लेकर छिड़ी गैंगवार एवं छोटी-सी घटना होने पर लोगों द्वारा कानून अपने हाथ में लेना अभी सबसे बड़ी चुनौती है। इस पर सख्ती से अंकुश नहीं लगाया गया तो सारे नुस्खे धरे के धरे रह जाएंगे।
जरदारी का अमेरिका को संदेश- कयानी और पाशा को हटवाने के बदले पाक में घुसकर
पड़ोस
बलि के बकरे अभी और भी हैं
प्रदीप कुमार
अमेरिका में पाकिस्तान के ताकतवर राजदूत- इतने ज्यादा ताकतवर कि विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री को भी किनारे कर सीधे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ही से वास्ता रखते थे – हुसैन हक्कानी को मेमोगेट में बलि का बकरा बनना पड़ गया। जरदारी चाहते हुए भी उन्हें बचा नहीं पाए। फौज के दबाव में हक्कानी को इस्तीफा देना पड़ गया। मेमोगेट का पर्दाफाश होने के बाद जोरआजमाइश में फौज का पलड़ा भारी पड़ा। जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी की सत्ता बच तो गई है लेकिन सैनिक मुख्यालय रावलपिंडी से इस्लामाबाद में ऐवान-ए-सदर तक कंपन अभी महसूस किए जा रहे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेता, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मेमोगेट के बहाने जरदारी की बेदखली के लिए कमर कस ली है। सनसनीखेज मेमोगेट पर रोशनी पड़ी पिछले 10 अक्तूबर को, जब लंदन के फाइनेंशियल टाइम्स में एक अमेरिकी नागरिक मंसूर एजाज का लेख छपा। एजाज ने रहस्य खोला कि मई में एबटाबाद में अमेरिकी कार्रवाई में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद उसने हक्कानी की तरफ से अमेरिका के पूर्व सेनाध्यक्ष एडमिरल माइक मुलेन तक एक मेमो (स्मरण पत्र) पहुंचाया था। इसमें जरदारी की ओर से अनुरोध किया गया था कि अमेरिकी प्रशासन सेनाध्यक्ष जनरल कयानी और आइएसआइ प्रमुख ल़े जनरल शुजा पाशा को हटाने में मदद करे। लेख छपने के बाद ऐवान-ए-सदर और मुलेन दोनों ने ऐसे किसी मेमो को निराधार बता दिया। इस पर एजाज ने एक और चाल चल दी। उसने अपने ब्लैकबेरी पर हक्कानी के साथ हुए 35 एसएमएस के आदान-प्रदान को सार्वजनिक कर दिया।
एजाज का खेल यहीं नहीं खत्म हुआ। उसने मेमो को भी उजागर कर दिया। असली हड़कंप इसके बाद मचा। मेमो में वादा किया गया था कि कयानी और पाशा को हटाने में सहयोग के बदले पाकिस्तान की जमीन पर अल कायदा के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिका को छूट दी जाएगी, अमेरिका के हक में काम करने वाली, नई राष्ट्रीय सुरक्षा टीम का गठन होगा, पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को अनुशासन के दायरे में रखने के लिए स्वीकार्य नीति बनेगी और तालिबान व हक्कानी गुट के खतरनाक आतंकवादियों से संपर्क में रहने वाले आइएसआइ के सेक्शन एस को खत्म कर दिया जाएगा। मानो सेना और आइएसआइ को नाराज करने के लिए इतना काफी न हो, मेमो में यह आश्वासन भी दे दिया गया था कि 26/11 की जांच में भारत के साथ पूरा सहयोग किया जाएगा।
इसके बाद हक्कानी के सामने बचाव का रास्ता नहीं रहा। उन्हें इस्लामाबाद में पेश होने का हुक्म दिया गया। वह तीन दिन तक टालमटोल करते रहे। इस बीच आइएसआइ प्रमुख जनरल पाशा एजाज से मिलने लंदन पहुंच गए। एजाज ने खुद ही प्रेस को बता दिया कि उसने हक्कानी से हुए सभी वार्तालापों और ईमेल ब्योरों को जनरल पाशा के हवाले कर दिया है। पाशा से मिली सामग्री से लैस कयानी ने जरदारी से खरी-खरी बात की। हक्कानी के खिलाफ सबूत पक्का था। उन्हें अविलंब इस्लामाबाद पहुंचने के लिए कहा गया। सरकारी सूत्रों ने कहा था कि पाकिस्तान पहुंचने के दिन ही हक्कानी जरदारी, गिलानी, कयानी और पाशा के सामने हाजिर होंगे।
इस हाजिरी में भी दो दिन निकल गए। पहले हक्कानी और जरदारी में गुफ्तगू के दो दौर चले। हक्कानी इस कदर डरे हुए थे कि पाकिस्तानी प्रेस के मुताबिक वह ऐवान-ए-सदर में ही वहरे। तब तक जरदारी को एजाज के इस बयान ने कठघरे में खड़ा कर दिया कि मेमो की शब्दावली राष्ट्रपति के संज्ञान में भले न हो, उन्होंने हक्कानी को मेमो तैयार करने की पूरी छूट दे रखी थी। शायद इसीलिए जरदारी को अपने ओहदे की शान के खिलाफ प्रधानमंत्री गिलानी के आवास पर बैठक के लिए जाना पड़ा। इस बैठक में जरदारी, गिलानी, कयानी और पाशा ने भाग लिया। सेना के नजदीकी अखबारों ने खबर दी कि हक्कानी ने अपने बचाव में जोरदार तर्क दिए और एजाज से पाशा की भेंट को गैरमुनासिब बताया, लेकिन पाशा के पास मौजूद सबूतों से हक्कानी कसूरवार साबित हो रहे थे। उनकी दुर्गति यह हो गई कि जब उन्होंने ट्वीटर पर यह संदेश दिया कि मैंने प्रधानमंत्री से अपना इस्तीफा स्वीकार करने का अनुरोध किया है तो प्रधानमंत्री कार्यालय से स्पष्ट किया गया कि हक्कानी को इस्तीफा देने का हुक्म दिया गया है। यहां जरदारी की बेबसी भी दिखाई पड़ी, क्योंकि बैवक से पहले तक उनका खेमा यह कह रहा था कि हक्कानी से इस्तीफा नहीं लिया जाएगा क्योंकि उस हालात में दोषी खुद राष्ट्रपति साबित होंगे।
बहरहाल, हक्कानी को जाना पड़ा और जरदारी की इच्छा के विरुद्घ उनकी कुर्सी शेरी रहमान को मिल गई। शेरी नाटक की नई पात्र हैं, इसलिए इस कहानी को आगे बढ़ाने के पहले दो पुराने पात्रों, मंसूर एजाज और हुसैन हक्कानी पर नजर डालते हैं। एजाज का जन्म अमेरिका में हुआ मगर उनके पिता डा़ अहमद एजाज पाकिस्तान से आए थे। वह सैद्घांतिक भौतिक शास्त्र के विशेषज्ञ हैं। अमेरिका के परमाणु कार्यक्रम से भी उनका संबंध बताया गया है। मंसूर एजाज परमाणु भौतिकी में स्नातक हैं। उनकी इन्वेस्टमेंट फर्म क्रीसेंट फाइनेंशियल मैनेजमेंट सर्विसेज के बोर्ड में सीआइए के कई पूर्व अधिकारी भी हैं। एडमिरल मुलेन तक मेमो पहुंचने वाले जनरल जोन्स भी बोर्ड में हैं। सीआइए और आइएसआइ दोनों के लिए काम करने की उनकी छवि रही है।
हक्कानी गिरगिट की तरह रंग बदलने के लिए मशहूर हैं। उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन, इस्लामी जमात-ए-तुलबा से शुरुआत की थी। बेनजीर भुट्टो, जिया-उल-हक, मुशर्रफ और जरदारी सबके वह खास रहे हैं। अपनी किताब पाकिस्तान : बिटविन मास्क ऐंड मिलिटरी में सेना की आलोचना करने के बाद रावलपिंडी वाले उनसे ऐसे नाराज हुए कि आज तक नाराजगी चल रही है। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वाशिंगटन में सत्ता के गलियारे में एजाज जैसे दलालों को पटाने में वह माहिर हैं। जरदारी पर उनके असर का हाल यह है कि वह अपनी बीवी, फारा इस्फानी को राष्ट्रपति की मीडिया सलाहकार बनवाने में कामयाब हो गए।
शेरी को 2009 में जरदारी से तकरार के बाद सूचना मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था क्योंकि वह मीडिया को नियंत्रित करने पर सहमत नहीं थीं। जरदारी उन्हें राजदूत नहीं बनाना चाहते थे। एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार गिलानी और सेना की बदौलत वह यह कुर्सी हासिल कर पाईं। उनके एनजीओ जिन्ना इंस्टीट्यूट ने हाल में एक रिपोर्ट जारी की जिसमें अफगानिस्तान पर सेना की नीति का समर्थन किया गया है। डॉन अखबार ने एक सरकारी सूत्र को कहते बताया कि सेना उनकी नियुक्ति के प्रति सकारात्मक भाव रखती है। पाकिस्तानी सेना की विशेषज्ञ आयशा सिद्दीकी ने फेसबुक पर लिखा कि शेरी ने फौज को समर्थन देने वाले एजाज हैदर को जिन्ना इंस्टीट्यूट का प्रमुख बना दिया है। लगता है कि इन लोगों को पांच दिन पहले मालूम था कि क्या होने जा रहा है। यहां दो सवाल पैदा होते हैं। एक, मंसूर एजाज ने करीब पांच महीने बाद मेमो का राज क्यों खोला? दो, जरदारी की दयनीय हालत के बावजूद फौज संयम क्यों बनाए रही? पहले सवाल के जवाब में एक पाकिस्तानी अखबार ने लिखा है कि मेमो को अमेरिकी प्रशासन तक पहुंचाने के लिए एजाज ने जो फीस मांगी होगी, वह शायद हक्कानी से उसे नहीं मिली होगी। उसने चार महीने तक इंतजार करने के बाद खुन्नस में भंडाफोड़ कर दिया। यह भी हो सकता है कि आइएसआइ ने उसे खरीद लिया हो। जरदारी और हक्कानी की हरकतों की भनक आइएसआइ को जरूर मिल गई होगी। एजाज से सबूत मिलने के बाद उसने हक्कानी को फौरन हलाक कर दिया। जानलेवा न सही, यह चोट है जरदारी पर भी। शायद ऐसी चोट, जिसका असर देर में होता है।
सेना ने संयम इसलिए रखा कि फोड़ा ऑपरेशन के लायक अभी हुआ नहीं था। बीच-बीच में सेना पर चोट करने वाले नवाज शरीफ और आए दिन यह ऐलान करने वाले कि मेरी सरकार बनी तो फौज को अपने काबू में रखूंगा, तेजी से उभर रही पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान ने बयान दिया कि जरदारी ने फौज और आइएसआइ के खिलाफ बाहरी मदद मांग कर गद्दारी की है । इसके बावजूद वे हालात नहीं पैदा हुए हैं, जिनमें अयूब, याह्या, जिया और मुशर्रफ ने सत्ता अपने हाथों में ले ली थी। पाकिस्तान की सेना कच्ची गोली नहीं खेलती है। अमेरिका से परस्पर विरोधी बयान आए। गिलानी के घर पर फैसलाकुन बैठक के वीक पहले अमेरिकी राजदूत कैमरन मुनटेर ने रावलपिंडी में कहा, हम पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया, संविधान और विधि के शासन का दृढ़ता से समर्थन करते हैं। हम देखेंगे कि यह कैसे काम करता है लेकिन पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध राजनीतिक संबंधों से अधिक महत्व रखते हैं। कयानी और उनके कोर कमांडर चाहे जितने तीसमार खां हों, अमेरिका से हरी झंडी मिले बगैर वे फौजी हुकूमत नहीं कायम करने वाले।
सेना के संयम की दो और वजहें हैं। संविधान के तहत फौजी बगावत देशद्रोह है, जिसमें मौत की सजा हो सकती है। प्रमुख न्यायाधीश इफ्तिखार अली चौधरी के फैसले के बारे में कयास लगाने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान इस समय भयानक आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। उत्तरी वजीरिस्तान में और पूरी पाक-अफगान सीमा पर पाकिस्तान की सेना फंसी हुई है। सेना अगर आतंकवादियों के खिलाफ गंभीरता से कार्रवाई का निश्चय कर ले तो भी इसे अंजाम देने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। सीधे हुकूमत संभालना मौजूदा हालात में घाटे का सौदा होगा।
इन कारणों से जरदारी की कुर्सी बच तो गई है लेकिन वे कमजोर हो चुके हैं। कमजोर जिस्म को तरह-तरह की बीमारियां पकड़ती हैं, इसलिए भरोसे से नहीं कहा जा सकता कि वे कब तक सही-सलामत रहेंगे। पाकिस्तान में बांग्लादेशी प्रयोग की आवाजें उठने लगी हैं। जैसे शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के पहले जनरल मोईनुद्दीन ने एक टेक्नोक्रेट को प्रधानमंत्री बना कर राज किया था, उसी तरह पाकिस्तान में भी हो। यानी सॉफ्ट मिलिटरी रूल हो। इतना तय है कि मेमोगेट ड्रामे का अभी पटाक्षेप नहीं हुआ है।
लेखक रतीन्द्र नाथ की यह रिपोर्ट 'शुक्रवार' मैग्जीन में प्रकाशित हो चुकी है. रतीन्द्र से 09810994447 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.





