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एक एसडीएम, जो कानून, डीएम और न्‍यायालय के आदेशों पर भी भारी है!

गोरखपुर में एक तहसील है बांसगांव। इस के एसडीएम हैं अमरनाथ राय। बांसगांव में वह अमर होने की ठान कर बैठे हैं। प्रमोटी हैं। बरास्ता तहसीलदार एसडीएम हुए हैं। लेकिन दिमाग सातवें आसमान पर। पैसा मिल जाए तो कानून क्या किसी भी को भी बेंच खाएं। किस्से तो इन के कई हैं पर यहां बानगी के तौर पर बांसगांव तहसील के एक गांव बैदौली के एक वाकए का जायजा लें। रामधारी पांडेय अपनी ही ज़मीन पर 6 महीने से दीवार बना कर बैठे हैं पर अमरनाथ राय उन्हें लिंटर नहीं लगाने दे रहे हैं। रामधारी पांडेय के पक्ष में दीवानी न्यायालय की डिक्री उन्हों ने कूड़ेदान में डाल दी है। ज़िलाधकारी का आदेश उन के लिए कोई मायने नहीं रखता। जैसे कानून उन की जागीर हो। यह सब दो लाख रुपए रिश्वत और बसपा के एक माफ़िया नेता की सिफ़ारिश का नतीज़ा है।

गोरखपुर में एक तहसील है बांसगांव। इस के एसडीएम हैं अमरनाथ राय। बांसगांव में वह अमर होने की ठान कर बैठे हैं। प्रमोटी हैं। बरास्ता तहसीलदार एसडीएम हुए हैं। लेकिन दिमाग सातवें आसमान पर। पैसा मिल जाए तो कानून क्या किसी भी को भी बेंच खाएं। किस्से तो इन के कई हैं पर यहां बानगी के तौर पर बांसगांव तहसील के एक गांव बैदौली के एक वाकए का जायजा लें। रामधारी पांडेय अपनी ही ज़मीन पर 6 महीने से दीवार बना कर बैठे हैं पर अमरनाथ राय उन्हें लिंटर नहीं लगाने दे रहे हैं। रामधारी पांडेय के पक्ष में दीवानी न्यायालय की डिक्री उन्हों ने कूड़ेदान में डाल दी है। ज़िलाधकारी का आदेश उन के लिए कोई मायने नहीं रखता। जैसे कानून उन की जागीर हो। यह सब दो लाख रुपए रिश्वत और बसपा के एक माफ़िया नेता की सिफ़ारिश का नतीज़ा है।

बांसगांव तहसील में गगहा थानांतर्गत बैदौली गांव में सड़क किनारे पर आबादी की एक ज़मीन है रामधारी पांडेय की। उन के पट्टीदार राम अवध पांडेय विलेज बैरिस्टर थे। गांव में सारे जवार की सब की खसरा-खतियौनी उन की जुबान पर। जब चाहें जिस को लड़ा दें और अपनी विलेज बैरिस्टरी के दांव से उसे चित्त कर दें। लोग कांपते थे एक समय उन से। जब गांव में चकबंदी हुई तो विलेज बैरिस्ट्री के दांव पर उन्हों ने आबादी में स्थित रामधारी पांडेय की उक्त ज़मीन की भी चकबंदी करवा दी। और अपनी पत्नी और बच्चों का नाम दर्ज करवा दिया। यह कोई १९७१ की बात है। लेकिन तब रामधारी पांडेय के पिता सत्यराम पांडेय जीवित थे। सो उस ज़मीन पर राम अवध पांडेय तुरंत कब्ज़ा लेने नहीं आए। सब कुछ गुपचुप किए रहे। इस लिए भी कि उक्त ज़मीन पर तब मकान था। बाद के दिनों में जब उक्त ज़मीन पर बना मकान गिर गया और रामधारी पांडेय के पिता का निधन हो गया १९८३ में तब राम अवध पांडेय उस ज़मीन पर कब्ज़ा लेने आए। लेकिन गांव के लोगों ने उन्हें डांट-डपट कर, समझा-बुझा कर उस वक्त शांत कर दिया। पर जब वह फिर कुछ दिन बाद कब्जा लेने आए उस ज़मीन पर तो रामधारी पांडेय और उन के बड़े भाई धनुषधारी पांडेय हार कर दीवानी न्यायालय में जा कर इस बारे में मुकदमा कर दिया। वाद संख्या १९४/ १९८५ । न्यायालय ने रामधारी पांडेय और उन के बड़े भाई धनुषधारी पांडेय के पक्ष में स्थगनादेश दे दिया। यह १९८५ की बात है। लंबे समय तक मुकदमा चला और जब राम अवध पांडेय को लगा कि अब वह चार सौ बीसी में भी फंस सकते हैं तो उन्हों ने उक्त मुकदमे में सुलहनामा कर के रामधारी पांडेय और उन के बड़े भाई धनुषधारी पांडेय के पक्ष में उक्त ज़मीन सौंप दी। इस बारे मे दीवानी न्यायालय की कोर्ट नंबर तेरह ने डिक्री भी जारी कर दी।

यह वर्ष १९९४ की बात है। बात खत्म हो गई। बताना ज़रुरी है कि बाद के दिनों में राम अवध पांडेय और रामधारी पांडेय के बड़े भाई धनुषधारी पांडेय का भी निधन हो गया। अब बीते 9 नवंबर, २०११ में रामधारी पांडेय ने उक्त ज़मीन पर एक कमरा बनवाना शुरु किया। दीवार तैयार थी, बस लिंटर पडना बाकी था। राम अवध पांडेय के एक बेटे शैलेश पांडेय ने अपने पिता की राह पकड़ी। पहले तो राम धारी पांडेय से शराब के लिए जब-तब पैसा मांगने लगे। और अंतत: एसडीएम अमरनाथ राय की शरण में गए। एक माफ़िया अंबिका सिंह से सिफ़ारिश करवाई और कि जैसा शैलेश पांडेय गांव में कहते फिर रहे हैं कि एसडीएम अमरनाथ राय को दो लाख रुपए भी दिए बतौर रिश्वत। सो आनन फानन रामधारी पांडेय का बन रहा मकान एसडीएम ने बिना रामधारी पांडेय का पक्ष सुने दिसंबर, २०११ में लिखित आदेश कर पुलिस फ़ोर्स भेज कर रुकवा दिया। और खुद ट्रेनिंग पर चले गए। अमरनाथ राय के ट्रेनिंग के समय बांसगांव का चार्ज गोला के तहसीलदार मोती सिंह के पास चला गया। रामधारी पांडेय की उम्र अब अस्सी वर्ष की है पर उस शीतलहरी में भी वह दौड़-भाग करते रहे। गोला एसडीएम मोती सिंह से वह मिले अपने डिक्री के कागजात ले कर। मोती सिंह ने तहसीलदार को आदेश दिया कि पुलिस बल ले कर रामधारी पांडेय द्वारा उक्त ज़मीन पर निर्माण कार्य करवाने दिया जाए। पर तहसीलदार बांसगांव लालता प्रसाद भी अमरनाथ राय को मिले दो लाख रुपए में हिस्सेदार थे सो वह कानूनगो और पटवारी को मार्क कर चुप लगा गए।

पटवारी लोग भी तब हड़ताल पर थे। तब तक अमरनाथ राय ट्रेनिंग से वापस आ गए। रामधारी पांडेय उस सर्दी में अमरनाथ राय से भी मिले, न्यायालय की डिक्री दिखाई। पर अमरनाथ राय ने उन की एक न सुनी। कहा कि इंतखाब में शैलेश का नाम है। रामधारी पांडेय ने सारे कागजात दिखाए और बताया कि इंतखाब में फर्जी ढंग से इंद्राज करवाया गया है और कि बैदौली गांव तकसीमी नहीं है। पूरा गांव एक ही नंबर पर है। यह आबादी की ज़मीन है जिस पर फर्जी ढंग से दूसरा नंबर डलवाया गया है। इस फर्जीपने के खिलाफ सारे सुबूत भी रामधारी पांडेय ने दिखाया और कि बताया कि दीवानी की डिक्री में हमारी ज़मीन की चौहद्दी भी लिखी है आप उसी से देख लीजिए। उस चौहद्दी के हिसाब से ही हमारी ज़मीन पर हमें मकान बनाने दीजिए। बरसों से, पुरखों से हमारा इस पर कब्ज़ा है, ऐसा पटवारी ने अपनी रिपोर्ट में भी लिखा है। हमारी दीवार खडी है, बस लिंटर लगना बाकी है। पर अमरनाथ पर तब दो लाख रुपए कमाने की गर्मी थी और माफ़िया और बसपा के एक पूर्व विधायक का आदेश था। सो उन्हों ने रामधारी पांडेय की एक बात न सुनी।

अंतत: रामधारी पांडेय ने तत्कालीन ज़िलाधिकारी संजय कुमार से संपर्क साधा। संजय कुमार ने पूरी बात सुनी। औए एसडीएम अमरनाथ राय को इस बाबत निर्देश दिया। अमरनाथ राय ने रामधारी पांडेय से कहा कि जाइए अपना मकान बनाइए, हमें कुछ लेना देना नहीं है। दूसरे दिन उन्हों ने मकान बनाना शुरु ही किया कि अमरनाथ राय ने फिर से पुलिस भेज कर काम रुकवा दिया। रामधारी पांडेय ने फिर ज़िलाधिकारी से संपर्क किया। तो अमरनाथ राय ने तहसीलदार लालता प्रसाद को मौके पर भेजा। अब तहसीलदार लालता प्रसाद रामधारी पांडेय से कहने लगे कि विपक्षी शैलेश पांडेय का खर्चा बहुत हो गया है इसे चार लाख रुपया दे दीजिए। अपना मकान बनवाइए। रामधारी पांडेय फिर ज़िलाधिकारी से मिले। ज़िलाधिकारी ने अमरनाथ राय को फिर डांट पिलाई। पर अमरनाथ राय ने इस मसले पर सांस नहीं ली तो नहीं ली। बाद में वह चुनाव के बहाने मामला टाल गए। अब चुनाव खत्म हुए भी काफी दिन हो गए। लेकिन एसडीएम अमरनाथ राय ने इस बाबत रामधारी पांडेय की बात नहीं सुनी। सो रामधारी पांडेय ज़िलाधिकारी संजय कुमार से फिर मिले। अब की संजय कुमार ने पूरी फ़ाइल मंगवा ली और एक वरिष्ठ अधिकारी से उस की जांच करवाई। फिर एसडीएम अमरनाथ राय को लिखित आदेश भेजा कि इस मसले पर कार्रवाई कर मुझे अवगत करवाएं। पर अमरनाथ राय के कान पर जूं नहीं रेंगी तो नहीं रेंगी। और अब तो ज़िलाधिकारी संजय कुमार का भी स्थानांतरण हो गया है।

हालत यह है कि एसडीएम अमरनाथ राय और तहसीलदार लालता प्रसाद की यह जोड़ी ज़मीन के झगड़े खोज-खोज कर पैसे उगाहने में दिन-रात लगी है। फिर वह चाहे दीवानी न्यायालय का आदेश हो या किसी वरिष्ठ अधिकारी का अमरनाथ राय और तहसीलदार लालता प्रसाद को इस से फ़र्क नहीं पड़ता। वह तो एक माफ़िया और पैसे के बंदर हैं। वह चाहे जैसे नचाएं, वह तो नाचेंगे। न्यायालय या डीएम के आदेश उन के ठेंगे पर! अब अलग बात है कि जब यह आज़मगढ की तहसील लालगंज में तहसीलदार थे तब ऐसे ही जब कई मामले हो गए तो जनता ने इन की सरे-आम तब खूब खातिरदारी की थी। पर यह पैसे और माफ़िया की धुन पर नाचने की उन की जो आदत पड़ गई वह गई नहीं। रामधारी पांडेय ने अमरनाथ राय की इन शिकायतों का पुलिंदा लिख कर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश लोकायुक्त उत्तर प्रदेश, तथा उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव और नियुक्ति सचिव को भी भेजा है। रामधारी पांडेय ने पूछा है कि अगर अमरनाथ राय जैसे प्रशासनिक अधिकारी ही न्यायालय और न्याय की बात को दरकिनार कर देंगे और अगर ऐसे अधिकारियों की संख्या बढ़ती गई, और जो इन जैसे अधिकारियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई नहीं की गई तो सभ्य समाज अराजक समाज बन जाएगा। समाज में खून खराबा बढ़ जाएगा। न्याय और कानून का राज समाप्त हो जाएगा। इस लिए ऐसी प्रवृत्ति वाले अधिकारियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई बेहद ज़रुरी है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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