Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

एक और प्रभाष जोशी की जरूरत है

प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता जगत के वह अनमोल स्तंभ हैं, जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। इस समय का कोई भी संपादक उनके आसन के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है। प्रभाष जोशी ने अपने समय में हिंदी पत्रकारिता जगत के बौद्धिक समाज का नेतृत्व किया है। वह ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे जिनके बोलने और लिखने की शैली में कोई अंतर नहीं था। उनकी तरह के व्यक्तित्व का व्यक्ति मिलना आजकल के समाज में असंभव है।

प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता जगत के वह अनमोल स्तंभ हैं, जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। इस समय का कोई भी संपादक उनके आसन के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है। प्रभाष जोशी ने अपने समय में हिंदी पत्रकारिता जगत के बौद्धिक समाज का नेतृत्व किया है। वह ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे जिनके बोलने और लिखने की शैली में कोई अंतर नहीं था। उनकी तरह के व्यक्तित्व का व्यक्ति मिलना आजकल के समाज में असंभव है।

संपादक के रूप में उन्होंने अपने साथ काम करने वाले साथी सहयोगियों को हमेशा लिखने की आजादी दी। वहीँ आजकल के संपादक जहां अंकुश में ज्यादा विश्वास रखते हैं। प्रभाष जोशी हमेशा सामाजिक सरकारों और जनपक्षधरता से जुड़े मुद्दों के पत्रकारिता पर विश्वास रखते थे। वैचारिक मुद्दों की पत्रकारिता में वह हमेशा अपने साथी सहयोगियों से विचार विमर्श किया करते थे। अपने साथी सहयोगियों के दुःख सुख हमेशा शामिल रहते थे। यही कारण था कि जो भी उनसे जुड़ा था उसका उनके साथ दिल से जुड़ाव था। जो कि आजकल के संपादकों में नजर नहीं आता। प्रभाष जोशी के समय हिंदी पत्रकारिता जगत के पत्रकारों को अंग्रेजी अख़बार के पत्रकारों के समतुल्य माने जाते थे। जनसत्ता अख़बार निकलने से पहले और बाद के अख़बारों का अध्ययन करें तो आपको साफ़ पता चल जाएगा प्रभाष जोशी के संपादक काल में हिंदी पत्रकारिता में प्रेस विज्ञप्ति की सीमा को लांघ कर एक प्रभावशाली वृद्धि हुई थी। आज हिंदी पत्रकारिता  को एक और प्रभाष जोशी की जरुरत है।

हिंदी पत्रकारिता को जो भाषा और तेवर प्रभाष जी ने दिया उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। आज प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की ज्यादा जरुरत महसूस की जाती है क्योंकि संकट भी पहले से कही ज्यादा है। उदारीकरण के जिन खतरों को प्रभाष जोशी ने तब पहचाना और जमकर लिखा वह पत्रकारिता के छात्रों के लिए अध्ययन का विषय हो सकता है। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को अंग्रेजी के बराबर लाकर खड़ा कर दिया था यह माद्दा आज कितने पत्रकारों में है।

जनसत्ता का मशहूर जुमला 'सबकी खबर ले, सबकी खबर दे' गढ़ने वाले कुमार आनंद प्रभाष जोशी की टीम के सबसे तेज तर्रार पत्रकार रहे हैं और इंडियन एक्सप्रेस के यूनियन के चुनाव में अम्बरीश कुमार की जीत के साथ ही जब विरोधी पक्ष ने प्रभाष जोशी के खिलाफ नारा लगाया तो हिंसा हुई और प्रबंधन व संपादक के विवाद के चलते कुमार आनंद ने सबके मना करने के बावजूद खुद्दारी में एक्सप्रेस से इस्तीफा दे दिया था। वे फिलहाल भाषा के संपादक है. साभार : डेटलाइन

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...