झारखंड सरकार में एक से बढ़कर एक फैसले लिये जाते हैं। अजब-गजब कारनामे होते रहते हैं यहाँ। कोई भी, कभी कुछ बन सकता है अथवा बनाया जा सकता है। इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ने को तैयार है, बल्कि जुड़ भी गया है (सूचना-पत्र संलग्न किया जा रहा है)। यह नाम है आलोक कुमार का। आलोक कुमार राँची के रेडियम रोड स्थित आलोका होटल के मालिक बताये जाते हैं। आलोक कुमार सीसीएल में प्रबंधक (कार्मिकद्ध)/(कल्याण एवं सामुदायिक विकास) के पद पर थे, आज की सूचना से उन्हें झारखंड सरकार के महत्वपूर्ण विभाग-सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का निदेशक बनाया गया है। और 4 मई को पदभार ग्रहण के लिए शुभ मुहूर्त निकाल लिया गया है।
यह विदित हो कि 31 जनवरी 2012 को श्री गन्दुरा मुण्डा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत हो गये थे, तब से यह पद खाली पड़ा हुआ था, जिसके चलते विभाग के काम-काज में तकनीकी तौर पर दिक्कतें आ रही थीं। यहाँ उल्लेखनीय बात है यह है कि जब से झारखंड सरकार का गठन हुआ है, तब से आज तक इस विभाग का अपना स्वतंत्र रूप से कोई विभागीय सचिव नहीं हुआ। जिसके चलते यह विभाग हमेशा उपेक्षित रहा है। जिसके परिणास्वरूप यहाँ के कनीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों को काम-काज निपटाने में परेशानी उठानी पड़ रही है। साथ ही कोई भी महत्वपूर्ण फैसले यह विभाग नहीं ले पा रहा है। अपना विभागीय सचिव नहीं होने के कारण इस विभाग का काम जैसे-तैसे चल रहा है। विभाग में कर्मचारियों का घोर अभाव बना हुआ, जिसके कारण कई नीतिगत फैसले नही हो पा रहे हैं। अब तक विज्ञापन नीति नही बन पाने के कारण जाली अखबारों का पौ बारह हो रहा है। वहीं कारापोरेट मीडिया ऊपर ही ऊपर लाखों का विज्ञापन हड़प ले रहे हैं। जबकि राज्य में लघु पत्र-पत्रिकाओं की दशा दयनीय बनी हुई है और विभाग की उपेक्षा का दंश झेल रही है। दूसरी ओर विभाग के कनीय अधिकारियों का मनोबल काफी गिरा हुआ दिखता है। ऐसा लगता है मानो यह ऐरे-गैरे विभाग के सचिव का रखैल बन कर रह रहा हो।
अब आलोक कुमार के निदेशक पद पर आ जाने से इस विभाग के कनीय अधिकारियों के मान-मर्दन का दौर शुरू होने वाला है। क्योंकि आलोक कुमार किसी भी तकनीकी दृष्टि से जनसंपर्क विभाग के योग्य फीट नही बैठते। उनकी उम्र कम है साथ ही उन्हें जनसंपर्क क्षेत्र का कोई अनुभव भी नहीं है। और न ही वे राजपत्रित अधिकारी रहे हैं। लेकिन उनके निदेशक पद पर आ जाने से अन्य कनीय पदाधिकारी जो राजपत्रित हैं, उनके मानसिकता पर विपरीत प्रभाव डालेगा। इसका ख्याल सरकार को रखना चाहिए था, लेकिन बताया जाता है कि कुछ नेताओं और बड़े प्रबंधक-पत्रकारों के दबाव में अर्जुन मुण्डा ने यह फैसला लेने पर बाध्य हुआ है। सच्चाई इसमें कितनी है, यह आने वाला कल को पता चल ही जायेगा। लेकिन यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि आलोक कुमार से वरिष्ठ अधिकारी, जिनका इस विभाग में काम करने का 30 साल का अनुभव है, और उन्होंने विभाग को काफी प्रतिष्ठा और गरिमा भी दिलाई है, वह हैं श्री अवदेश पाण्डेय। इस पद के लिए सुयोग्य पात्रता रखने वाले विभाग के वरिष्टतम अधिकारी अवदेश पाण्डेय की नियुक्ति इस पद, न कर सरकार ने जो फैसला लिया है, वह आउटसोर्सिंग का मामला तो लगता ही है, इससे सरकार के सेहत पर दुरगामी प्रभाव भी पड़ेगा।
जानकार बताते हैं कि आलोक कुमार सीसीएल से पीआरडी में क्यों आना चाहते थे। नाम नहीं बताने की शर्त पर उन्होंने बताया कि एक बार आलोक कुमार उन से कह रहे थे कि यार झारखंड सरकार के इस विभाग में मलाई ही मलाई है। इस विभाग में कुछ साल रह जाऊँ तो चाँदी ही चाँदी काट लूँगा साथ ही मीडिया में मेरी धाक भी बन जायेगी। सीसीएल में तो सीधे-सीधे कुछ उपाय भी नहीं है। यहाँ तो लोगों का कल्याण ही करना है। अपना कल्याण तो झारखंड सरकार में ही संभव है। यदि यह बात सही है, तो निश्चित रूप से आलोक कुमार गफलत में हैं। और जैसा कि आलोक कुमार जी के बैकग्राउण्ड बताता है, वे कुछ भी कर सकते हैं। जब बिना योग्यता के वे इस पद पर पहुँच गये, तो उनके लिए यह कोई बड़ी बात भी नहीं होगी।
एक दूर्भाग्यपूर्ण बात झारखण्ड सरकार के लिए है कि जिस प्रकार से मुण्डा सरकार के इस प्रकार के अदूरदर्शितापूर्ण फैसले से इस आशंका को बल मिला कि अब आने वाले समय में झारखंड सरकार के अधिकरियों की नियुक्ति जिन्दल, मित्तल, टाटा, रिलायंस ग्रुप जैसे कारपोरेट जगत से हो सकती है। फिर सरकार और कारपोरेट जगत में क्या अंतर रह जायेगा? पीआआरडी के निदेशकर पद पर आलोक कुमार की नियुक्ति को लेकर जब झारखंड सरकार के कार्मिक सचिव श्री आदित्य स्वरूप से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि मैं इस पर कुछ भी नहीं बता पाऊँगा सिवाय इसके कि मेरे पास उनकी नियुक्ति से संबंधित काजगात आये थे, जिस पर मैंने हस्ताक्षर किये हैं। विस्तृत जानकारी आप विभागीय अधिकारी से प्राप्त कर सकते हैं। जब विभाग के सचिव मस्त राम मीणा से फोन पर संपर्क किया गया तो, उनका फोन व्यस्त पाया गया।

अरूण कुमार झा





