सेवा में, हरिवंश जी, प्रधान सम्पादक, प्रभात खबर. शशि शेखरजी, प्रधान संपादक, हिंदुस्तान. आपको नववर्ष की बधाई! बड़े ही दुखी मन से इस पत्र को लिख रहा हूँ. इस पत्र को लिखने से पहले न जाने कितने सवालों और जज्बातों का तूफ़ान मन और दिमाग में उठ रहा था, तो सोचा क्यों न आप लोगों से इस खुले पत्र के माध्यम से पूछ लूं. मुझ जैसे नौसीखिए पत्रकार, जिसने पत्रकारिता की डिग्री किसी पत्रकारिता स्कूल से नहीं ली, जैसे लोग हरिवंश जी को देखते, पढ़ते और सुनते ही खुद को पत्रकार बना बैठे हैं.
हरिवंश जी को पढ़ने वालों को याद होगा कि वे अपनी लेखनी में धर्मवीर भारती, रविवार, जयप्रकाश, गंगा जी जैसे शब्दों में अपनी रचना ढालते है. उनकी लेखनी हमेशा लोगों को प्रेरित करती है. निश्चित ही उनके लेखनी में जादू है, उनके विचार आपको स्तब्ध कर देंगे और आप सोच में पड़ जाएंगे. उनकी लेखनी शायद आपकी नसों में बह रहे खून में भी उबाल ला सकती है. हरिवंश जी जब लिखते हैं तो लिखते चले जाते हैं, ठीक उसी प्रकार जब उनके पाठक उनको पढ़ते हैं तो पढ़ते ही चले जाते हैं. एक मृतप्राय या बंदी के कगार पर पहुँच चुके अखबार को राज्य का नम्बर एक अखबार बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है. उनका जीवन भी किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं है. अपने एक लेख में उन्होंने लिखा है कि मुंबई में धर्मयुग और रविवार की पत्रकारिता छोड़कर जब वो प्रभात खबर की दूसरी नींव रखने रांची (अब झारखण्ड तब बिहार) आ रहे थे तो पूरी रात ट्रेन की खिड़की से रास्तों को ही निहार रहे थे. उनकी इस तरह की लेखनी आपको झकझोर देगी. और आप खुद को आवाम के साथ कनेक्ट महसूस करेंगे. अब बात शशि शेखर जी की भी. पहले अमर उजाला और अब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक बनने के साथ ही इन्होंने अपने नाम का डंका बजा दिया. देश के बड़े अखबार का प्रधान संपादक होना इनकी पत्रकारीय क्षमता को दर्शाता है. निश्चित ही हिंदी पट्टी के हर पत्रकार के अन्दर शशि शेखर बनने का सपना चलता रहता है.
अब मुद्दे की बात : नए वर्ष के उपलक्ष्य में प्रभात खबर और हिंदुस्तान (झारखण्ड के सभी संस्करणों में) इन दोनों अखबार के साथ एक पंचांग (हिन्दू कलैंडर) भी दिया गया था. यदि या सिर्फ पंचांग या कैलंडर होता तो कोई बात नहीं थी, मगर यह पंचांग या कैलंडर न होकर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का पम्पलेट था. पंचांग के सभी पन्नों पर शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन (शिबू के बेटे एवं झारखण्ड के उप-मुख्यमंत्री) की बड़ी सी तस्वीर एवं झामुमो के कैलंडर जैसे दिख रहे थे. तीन रुपये में बिकने वाले अखबार की कीमत भी पांच रुपये रखी गयी थी. ऐसे में झारखण्ड का पाठक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था. वो ये नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर इन अख़बारों की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि उन्हें इस तरह का प्रयोग करना पड़ा. पेड न्यूज़ की मुखालफत करने वालों में सबसे पहले हरिवंश जी का ही नाम आता है, और हरिवंश जी जैसे लोगों का ही प्रभाव है कि अभी पांच राज्यों में चल रहे चुनाव में निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक संस्थाओं को पेड न्यूज़ में सख्ती दिखानी पड़ रही है.
निर्वाचन आयोग की सख्ती का यह आलम है कि कुछ एक मामले छोड़ दिए जाय तो बहुत हद तक इन राज्यों में आयोग ने पेड न्यूज़ पर नियंत्रण करने में कामयाबी पा ली है. अब ऐसी में सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या पेड न्यूज़ सिर्फ किसी चुनाव तक ही सीमित रहता है? क्या इस मुद्दे को पेड न्यूज़ की श्रेणी में नहीं लाना चाहिए? सबसे आश्चर्यजनक बात यह कि आखिर इन अख़बारों का यह रूप क्यों? अभी कुछ दिन पहले हिंदुस्तान अख़बार ने पेड न्यूज़ नहीं छापने का अपना संकल्प अपने अख़बार में छापा था, बड़े-बड़े शब्दों में पेड न्यूज़ की निंदा करते हुए लिखा गया था कि हिंदुस्तान पेड न्यूज़ का विरोध करता है.
जवाब का रहेगा इन्तजार : अब बस लोगों का धैर्य जवाब दे चुका है. कथनी और करनी में अंतर क्यों? बतौर पाठक हमें भी इस बात का हक़ है कि हम क्या पढ़े और क्या नहीं. अब इस सच की जानकारी हमें दी ही जानी चाहिए कि आखिर आप पेड न्यूज़ के पक्ष में हैं या विरोध में?
आपका शुभेच्छु
अनंत झा






