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एक था ‘तहलका’ : पोस्टर ब्वाय तरुण तेजपाल और मीडिया का बाजार

Yashwant Singh : तरुण तेजपाल बिजूका की तरह टंगे हुए हैं.. उनके पैर न धरती पर हैं और न ही आसमान में.. वे पोस्टर ब्वाय बन चुके हैं.. अतीत में की गई कुछ सरोकारी पत्रकारिता के लिए अब उन्हें टंगने, पोस्टर पर चिपकने का लायसेंस मिल चुका है… ऐसे पोस्टर ब्वाय पत्रकारिता में कई हैं, कई आए और कई गए… ये पोस्खुटर ब्वाय खुद को पत्रकारिता का बहुत बड़ा नाम बताते हैं… संतोष भारतीय को याद करिए… राहुल देव को याद करिए.. दीपक चौरसिया को याद करिए…

Yashwant Singh : तरुण तेजपाल बिजूका की तरह टंगे हुए हैं.. उनके पैर न धरती पर हैं और न ही आसमान में.. वे पोस्टर ब्वाय बन चुके हैं.. अतीत में की गई कुछ सरोकारी पत्रकारिता के लिए अब उन्हें टंगने, पोस्टर पर चिपकने का लायसेंस मिल चुका है… ऐसे पोस्टर ब्वाय पत्रकारिता में कई हैं, कई आए और कई गए… ये पोस्खुटर ब्वाय खुद को पत्रकारिता का बहुत बड़ा नाम बताते हैं… संतोष भारतीय को याद करिए… राहुल देव को याद करिए.. दीपक चौरसिया को याद करिए…

ढेरों ऐसे कथित पत्रकार हैं जो खुद के पोस्टर छपवाते हैं और खुद को बड़ा ब्रांड बताते हैं.. ऐसे लोगों का सच एक है कि ये बड़े असुरक्षित और बड़े चालाक लोग हैं… ये सरोकार और बाजार की मिक्सिंग के एक्सपर्ट लोग हैं… ये कंटेंट और पूंजी के फ्यूजन से नया सुर बनाने वाले उस्ताद हैं… बाजार ऐसे ही प्रयोगधर्मी लोगों को चाहता है… बाजार आपकी क्रांतिकारिता को खरीदता है.. उसे ब्रांड बनाता है.. उसे बेचता है… उससे पूंजी के खेल, पूंजी के प्रवाह को गतिमान करता है और फिर एक दिन आपको चुका हुआ ब्रांड मानकर साइड में कर देता है, आपका हिस्सा देकर… फिर नए ब्रांड तलाशने गढ़ने में लग जाता है…

पत्रकारिता के इन पोस्टर ब्वाय लोगों को बाजार की तरफ से कई काम दिया जाता है… जैसे, जनता को मूर्ख बनाना, भरमाना, लुभाना, उन जैसा बनने का सपना दिखाना, उनके नाम पर दांव लगाना, उन्हें बड़ा मानना, उन्हें खास मानना, उन्हें भरोसेमंद मानना.. ये पोस्टर ब्वाय लोग जनता की आंखों को भरमाने और अपने आदमकद पोस्टरों को दिखाकर अपना कद बढ़ाने की कोशिश करते हैं.. पर दुर्भाग्य से जब इनके पोस्टर / बैनर / होर्डिंग भूलुंठित होते हैं तो कोई भी आम आदमी उसे ठीक करने, उठाने, सुधारने नहीं जाता क्योंकि आम आदमी जैसे आपकी कथित उंचाई को आंक लेता है और चुप रहता है, आपके खेल को बूझता रहता है, वैसे ही आम आदमी आपके चारों खोने चित्त होने के भी सच को जानता है और दोनों ही अवस्थाओं में आपकी चिरकुटई को मन ही मन नमन करता है, फिर इगनोर करता है…

जनता के हिस्से में हमेशा एक नया अविश्वास आता है.. जनता के हिस्से में हमेशा एक नया छल आता है.. जनता के हिस्से में हमेशा एक नई उदासी आती है.. बाजार अपने ग्राहकों को ललचाता रहता है… बाजार अपने ग्राहकों को ललचाने के लिए भरोसेमंद छलनाओं को आगे करता रहता है… जनता ग्राहक है, कंज्यूमर है.. जनता के बीच से निकलकर पोस्टर ब्वाय लोगों को बाजार पसंद करता है अपना दूत बनाने के लिए .. ताकि जनता के बीच जनता का आदमी होने का संदेशा जाए और बाजार में जनता का भरोसा कायम रहे… बाजार बहुत शातिर होता है और बहुत सरल भी….. वह अपने दमदार आलोचकों, तगड़े विरोधियों को अपने साथ बिठा लेता है.. अपना आदमी बना लेता है..

दीपक चौरसियाओं, संतोष भारतीयों जैसों के पोस्टरों-बातों पर काफी समय से किसी को भरोसा नहीं पर तरुण तेजपालों से उम्मीद थी.. लेकिन उन्हें भी तो अपना मीडिया हाउस चलाना, बढ़ाना और छा जाना है… सो, उनके बढ़ने, फलने-फूलने के अपने तरीके हैं… पर अंततः सबकी मंजिल एक है…. बाजार की लय गति ताल के साथ थिरकना और बाजार से अधिकतम खींच कर अपने साथ जोड़ना…

बाजार से टकराने वाले जब बाजार की गोद में बैठते हैं तो एक शेर याद आता है…


जब तक बिका न था, कोई जानता न था
तुमने खरीद कर अनमोल कर दिया…

पोस्टर देखिए.. लिखा है… तहलका- चरण और रमन के प्रदेश में…

मैसेज साफ है. तहलका को अपना बाजार पता है.. तहलका को अपने क्लाइंट पता हैं.. तहलका को पूंजी और पावर के स्रोत पता हैं.. तहलका को अपने बाजार के टारगेट आडियेंस पता हैं.. ये अलग बात है कि वे इन्हें भुनाएगा उस कंटेंट के दम पर जिन्हें चरण और रमन के प्रदेश के आम आदमियों के बीच से पैदा किया जाएगा… और, वातानूकिलत करके प्रकाशित किया जाएगा… कंटेंट में वैसे तो बहुत तेज ओज दिखेगा, लेकिन जो कंटेंट नहीं दिखेगा वही वो स्पेस होगा जो चरण और रमन अनुकूलित होगा… और इसी स्पेस में बाजार होता है.. जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ रहे आदिवासियों वाले इस प्रदेश का बहुत बड़ा बजट मीडिया अनुकूलन पर खर्च किया जाता है.. पेड न्यूज पर खर्च किया जाता है… और यह सब बड़े सुनियोजित ढंग से करते कराते हैं रमन सिंह… पर रमन सिंह एक्सपोज नहीं होंगे क्योंकि वो तहलका के छत्तीसगढ़ प्रवेश के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं, मुख्य वक्ता हैं..

चलिए, आज शाम फिर थोड़े छले जाने का एहसास करते हैं, फिर थोड़ी उदासी की चादर ओढ़ते हैं, फिर थोड़ा अविश्वास पनपाते हैं…और इन सबको मिक्स कर फिर थोड़ा काकटेल बनाते हैं, हाशिए का काकटेल.. चीयर्स दोस्तों…


लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. फेसबुक पर यशवंत से जुड़ने / लाइक करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं…

https://www.facebook.com/yashwant.bhadas4media


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