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एक बेरोजगार उर्फ आजाद पत्रकार की कविताई

पंडित राजीव शर्मा इन दिनों बेरोजगार हैं. पर कोई फरक नहीं पड़ता उनकी सेहत पर क्योंकि उनकी घर-गहस्थी के तामझाम इतने कम हैं कि वे नौकरी पर रहें या आजाद रहें, जीवन की गति लय पर कोई बेसुरापन नहीं… पिछले दिनों पत्रकारों के एक कार्यक्रम में एक पत्रकार मित्र के साथ गए तो वहां जब उन्होंने पत्रकारों को चंदा मांगते देखा तो अपने पाकेट के आखिरी दस रुपये चंदा स्वरूप दे डाले.

पंडित राजीव शर्मा इन दिनों बेरोजगार हैं. पर कोई फरक नहीं पड़ता उनकी सेहत पर क्योंकि उनकी घर-गहस्थी के तामझाम इतने कम हैं कि वे नौकरी पर रहें या आजाद रहें, जीवन की गति लय पर कोई बेसुरापन नहीं… पिछले दिनों पत्रकारों के एक कार्यक्रम में एक पत्रकार मित्र के साथ गए तो वहां जब उन्होंने पत्रकारों को चंदा मांगते देखा तो अपने पाकेट के आखिरी दस रुपये चंदा स्वरूप दे डाले.

जब पत्रकार साथी के साथ पत्रकार साथी के घर के पास पहुंचे तो भुट्टा वुट्टा खाकर पैदल जाने को हुए तो पत्रकार साथी ने उनके पास पैसा न होने की स्थिति भांपकर उन्हें सौ  रुपये का नोट व दस दस के सात नोट थमा दिए ताकि घर आराम से पहुंच जाएं. उन्हीं मनःस्थिति में राजीव शर्मा ने कुछ कविताई की है, जिसे आपके सामने पेश किया जा रहा है..

हां, यह बताना जरूरी है कि राजीव की गृहस्थी में उनकी कोई पत्नी या बच्चे नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने शादी ही नहीं की, उनकी गृहस्थी में उनके दोस्त मित्र हैं जो अक्सर उनके यहां बिना प्याज लहसुन के व्यंजन खाने पहुंच जाते हैं..

इस कविता को भेजने के साथ-साथ राजीव ने दो लाइन की टिप्पणी भी लिखी है, जो यूं है..  ''मेरी ये पंक्तियां उन सभी के लिए जो ‘समझ रहे हैं’ या ‘नहीं समझ रहे हैं’ या ‘समझ समझ के समझ रहे हैं’ या ‘समझ समझ के भी नहीं समझ रहे हैं’..''


(1)

बुरा न मानिए, तुमने  सुना जो मैंने कहा-

उस दोपहर मेरी मिल्कियत,

कुल जमा दस टका…

सहाफियों की सरपरस्ती का दम

भरने वालों को चंदा दे दिया

गज़ब दौर ये फ़ाकामस्ती का

भला तेरा जो न दिया,

भला उसका जो कुछ तो दिया

गज़ब दौर ये फ़ाकामस्ती का….

(2)

शाम हुई दूधिया दो भुट्टे चबाए

दाम नकद एक सौ सत्तर  पाये

पांच, पन्द्रह-पन्द्रह  बस के चुकाए

तीस इस्त्री, पचास ऑटो  में गंवाए

याद आया बचपन, बच गए पचपन

शाम नौ बजे साथी का सम्मन

मन बड़ा ये घुम्मन-उम्मन

अजब वाकया ये बुद्धू बस्ती  का

गज़ब दौर ये फ़ाकामस्ती का….

(3)

कई दिन बीते, कट गईं कई रातें

घूमता रहा दर-ब-दर शहर-ओ-शहर

मैं आंखों में समेटे  अपना कस्बा

तंग दिली, संग दिली ऐब-ओ-सबाब

कुछ भी नहीं चस्पा उस पर

देखते हैं कब तक चलेगा  दौर

छुपम-छुपाई का बारगाह में

उसकी फक़त ‘बरदस्ती’ का

गज़ब दौर ये फ़ाकामस्ती का…


उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता राजीव शर्मा से संपर्क आप [email protected] के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

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