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दिल्ली

एक संगत गुलज़ार के साथ

हिंदी सिनेमा के सौ बरस के मौके पर हिंदी विभाग हिन्दू कॉलेज में प्रख्यात गीतकार गुलज़ार ने सिनेमा के कई पहलुओं पर रौशनी डाला। उनके मुताबिक  किस्सागोई की परंपरा को तकनीक के सहारे सिनेमा ने नया विस्तार दिया है और गीत संगीत भारतीय सिनेमा की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है बशर्ते उसका इस्तेमाल कथानक को गति देने के लिए हो। श्रोताओं की इस शिकायत पर कि इस दौर की गीतों और धुनों में पहले वाली मिठास नहीं रही वो कहते है कि आपाधापी भरे इस दौर में जब जिन्दगी में सुकून कम हो रहा है तो इसका असर तो सिनेमा समेत तमाम कलाओं पर पड़ना लाजमी ही है।

हिंदी सिनेमा के सौ बरस के मौके पर हिंदी विभाग हिन्दू कॉलेज में प्रख्यात गीतकार गुलज़ार ने सिनेमा के कई पहलुओं पर रौशनी डाला। उनके मुताबिक  किस्सागोई की परंपरा को तकनीक के सहारे सिनेमा ने नया विस्तार दिया है और गीत संगीत भारतीय सिनेमा की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है बशर्ते उसका इस्तेमाल कथानक को गति देने के लिए हो। श्रोताओं की इस शिकायत पर कि इस दौर की गीतों और धुनों में पहले वाली मिठास नहीं रही वो कहते है कि आपाधापी भरे इस दौर में जब जिन्दगी में सुकून कम हो रहा है तो इसका असर तो सिनेमा समेत तमाम कलाओं पर पड़ना लाजमी ही है।

साथ ही श्रोताओं की पसंद भी बदल रही है। फिल्म ओमकारा के '' बीड़ी जलइले '' के लिए शिकायत करने वालों को वे याद दिलाते हैं की इसी फिल्म में  ''ओ साथी रे '' और '' नैना ठग लेंगे '' जैसे गाने भी थे जिसकी चर्चा कम होती है। बिल्लो , लंगड़ा त्यागी जैसे किरदार  'बीड़ी जलइले' सरीखे गीत ही गायेंगे ग़ज़ल नहीं। गीत लिखते वक़्त फिल्म की कहानी , गाने की सिचुवेंशन और किरदारों का ख्याल तो रखना ही पड़ता है। ' मोरा गोरा रंग लै ले ' से शुरुआत करने वाले गुलज़ार ने बताया कि वो बदलते वक़्त के साथ कदम मिलाने की कोशिश करते हैं ' गोली मार भेजे में ' या 'कजरारे' सरीखे गीत इसी का नतीजा हैं। लेकिन ऐसे गीतों की उम्र कम होती है इसके जवाब में  दूसरे पहलू की तरफ भी ध्यान दिलाते है। वो कहते हैं कि पहले आल इंडिया रेडियो पर केवल ४ घंटे गीत के कार्यक्रम होते थे लोग अपने नाम के साथ फरमाइश भेजते थे लेकिन अब रेडियो पर ही २४ घंटे गीत बजते हैं इस ओवरडोज़ ने भी हमारी यादास्त को कमजोर किया है और गीतों की उम्र घटी है। गुलज़ार को इस बात का मलाल भी है कि भारत में विभाजन पर कम फिल्मे बनी हैं लेकिन ' तमस ' को इस विषय पर बनी संवेदनशील फिल्म मानते हैं।

गुलज़ार के रचनात्मकता पर बात करते हुए हिंदी विभाग के डॉ रामेश्वर राय ने लोक को उनकी गीतों का प्राण तत्त्व बताते हुए कहा कि दिल्ली और मुंबई में जिन्दगी का ज्यादातर वक़्त बिताने के बावजूद गीतों में, उनका ग्रामीण मन झांकता है।  विभाग की अध्यापिका डॉ रचना सिंह के मुताबिक गुलज़ार की कलम का स्पर्श पाते शब्द संस्कारित हो जाते हैं इसलिए उनके बिलकुल भदेश गीतों में भी एक गरिमा है।  कॉलेज के प्राचार्य प्रदुम्न कुमार ने खुद को उनका फैन बताते हुए कहा कि यह कॉलेज का सौभाग्य है की आज गुलजार साब हमारे बीच हैं।  हिंदी विभाग की वरिष्ठ शिक्षिका डॉ विजया सती  ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए इस उल्लेखनीय गीतकार ,फ़िल्मकार के प्रति आभार जताया।    


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