मीडिया घराने के मालिकानों की कठपुतली बने एवं बेचारगी के मारे पत्रकारों को अपनी भड़ास निकालने के लिये नया तेवर, नई आवाज, जोश व मजबूत प्लेटफार्म देने वाले भाई यशवंत सिंह पर आये अप्रत्याशित मुसीबत की घड़ी में हम बागी बलिया के ग्रामीण पत्रकार भी साथ हैं और हर तरह से निपटने के लिये सदैव साथ देने का वादा करते हैं। इस वादे व भरोसे को कोरा या खोखला न समझें। आपसी पैर खिंचाऊ मानसिकता से ग्रसित हम पत्रकार भले ही आपस में कब्बड्डी-कब्बड्डी खेले किंतु कलमकारों के वजूद को चैलेंज करने वाली ऐसी हरकत पर हम चुप भी नहीं रहने वाले।
यशवंत सिंह ने हर कलमकार को जो आवाज का प्लेटफार्म दिया है, वह कलमकारों का अब एक अंतराष्ट्रीय जंक्शन सा हो गया है. भले ही हमारा बैनर खाकी का ईंट से ईंट बजाने से रोके किंतु लोकतांत्रिक व गांधीवादी तरीके से सड़क पर उतर कर विरोध करने से भी नहीं रोक सकते. ऐसे झंझावातों से कलमकार टूटने, झुकने व रूकने वाले भी नहीं है, बल्कि अब तो और मजबूती, हिम्मत व पक्के इरादे के साथ रफ्तार बढ़ेगी और बदमिजाजों के लिये एक ही संदेश हो कि ऐ ‘बुरे वक्त’ जरा ‘अदब’ से पेश आ, क्योंकि ‘वक्त’ नहीं लगता ‘वक्त’ गुजर जाने में…
धन्यवाद
विजय मद्धेशिया
पत्रकार
बलिया
(पत्रकार विजय मद्धेशिया ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास 4 जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास [email protected] के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)
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