अब लौं नसानी अब ना नसिहौं / राम कृपा भव निशा सिरानी जागे फिर ना डसैहौं।। मेरे एक शुभचिंतक का कल मुंबई से फोन आया- क्या कर रहे हैं सर? कुछ पढ़ाने वगैरह का काम शुरू कर दीजिए, देखिए अमुक सज्जन करते हैं और मजे में हैं। एक संपादक ने अपने यहां सलाहकार बनाने का न्यौता भेजा और एक ने तो नौकरी ही ऑफर कर दी।
हमारे एक और मित्र हैं जो रोज मुझसे पूछते हैं कि कहीं बात बनी सर? मैं कहता हूं कि जल्दी ही बन जाएगी। मेरे रिश्तेदार सब परेशान रहते हैं कि मैं कहीं कुछ करता क्यों नहीं? आफिस क्यों नहीं जाता? ये सब वे लोग हैं जो वाकई मेरे शुभचिंतक हैं। कोई परेशानी या दिक्कत हो तो साथ खड़े रहेंगे। लेकिन मुझे लगता है कि पूरे ३३ साल तो मैने नौकरी बचाए रखने के लिए डर-डर के जिंदगी जी ली। अब तो कुछ निर्भय होकर अपना काम करने दो। मुझे महसूस होता है कि मेरी अब तक की यानी ५८ साल की जिंदगी तो मैने नष्ट ही कर दी। अब जबकि वह काली रात बीत गई है तो मुझे अपने तरीके से जीने दो।
मैं अब इस नई जिंदगी में कोशिश करूंगा कि किसी का तनिक भी अहित मुझसे नहीं हो। किसी का दिल मेरे कारण नहीं दुखे। किसी की नौकरी कम से कम मेरे कारण नहीं जाए। फालतू में मैं किसी कमजोर पर रंगबाजी न दिखाऊं। हर एक का उसके गुणों के मुताबिक सम्मान करूं। अभी तक मैं कितना कम जानता था अपने उन अधीनस्थों के बारे में जिनमें तमाम वे गुण भरे पड़े हैं जिन्हें हम अपने गुरूर के कारण नहीं समझ पाते।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के एफबी वॉल से साभार.






